Adhyāya 302: Guṇa-vicāra, Gati-bheda, and the Imperishable State
Yājñavalkya–Janaka
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतो$क्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठतति,राजन! उनकी रात्रि भी इतनी ही बड़ी होती है; जिसके अन्तमें वे जागते हैं। अनन्तकर्मा ब्रह्माजी सबके अग्रज और महान् भूत हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप है। जो अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियोंपर शासन करनेवाले हैं, वे कल्याणस्वरूप निराकार परमेश्वर ही उन मूर्तिमान् ब्रह्माकी सृष्टि करते हैं। परमात्मा ज्योतिःस्वरूप स्वयं प्रकट और अविनाशी हैं। उनके हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक और मुख सब ओर हैं। कान भी सब ओर हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं
sarvataḥ pāṇipādaṃ tat sarvato'kṣiśiromukham | sarvataḥ śrutimalloke sarvam āvṛtya tiṣṭhati ||
قال فاسيشثا: «إن تلك الحقيقةَ العليا لها أيدٍ وأقدامٌ من كل جهة؛ ولها عيونٌ ورؤوسٌ ووجوهٌ من كل جهة؛ ولها سمعٌ من كل جهة في العالم. تُحيط بكل شيء وتثبت—ساريةً في كل شيء.»
वसिष्ठ उवाच