Saṃhāra-krama (The Sequence of Cosmic Dissolution) — Yājñavalkya’s Discourse
योगमार्ग तथा55साद्य यः वक्रिद् व्रजते द्विज: । क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद् बहुदोषो हि स स्मृतः,जैसे कोई-कोई बिरला नवयुवक ही अनेकानेक सर्पों तथा विच्छू आदिसे भरे हुए गड़्ढ़ों और बहुत-से काँटोंवाले, जलशून्य, दुर्गम एवं घोर वनमें सकुशल यात्रा कर सकता है तथा जहाँ भोजन मिलना असम्भव है, जिसमें प्रायः जंगल-ही-जंगल पड़ता है, जहाँके वृक्ष दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं तथा जो चोर-डाकुओंसे भरा हुआ है, ऐसे मार्गको सकुशल तै कर सकता है; उसी प्रकार योगमार्गका आश्रय लेकर कोई बिरला ही द्विज उसपर कुशलपूर्वक चल पाता है, क्योंकि वह बहुत-से दोषों (कठिनाइयों)-से भरा हुआ बताया गया है
yogamārgaṃ tathā sādya yaḥ kaścid vrajate dvijaḥ | kṣemeṇoparamet mārgād bahudoṣo hi sa smṛtaḥ ||
قال بيشما: «من اتخذ طريق اليوغا ولاذ به، فلا يمضي فيه إلا نادرٌ من ذوي الميلادين؛ وحتى إن مضى، فقد ينسحب من ذلك الطريق سالمًا. لأن هذا الطريق مذكورٌ في المأثور بأنه مملوءٌ بكثير من العلل—بكثير من المشاق والمخاطر.»
भीष्म उवाच