Adhyāya 290: Sāṃkhya-vidhi, Deha-doṣa, Guṇa-vicāra, and Mokṣa-gati
Bhīṣma–Yudhiṣṭhira Dialogue
सुकृतासुकृतं कर्म निषेव्य विविधै: क्रमै: । दशार्धप्रविभक्तानां भूतानां बहुधा गति:,जो प्राणी नाना प्रकारके क्रमसे पुण्य और पापकर्मका सेवन करके पज्चत्वको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् स्थूल शरीरका त्याग कर देते हैं, उनको मिलनेवाली गति नाना प्रकारकी बतायी गयी है
إن الكائنات، إذ تلبّست بأعمال البرّ وأعمال الإثم على طرائق ومراتب شتّى، تكون لها مسالك ومصائر متعددة؛ وللأحياء المقسّمين إلى خمسة عشر قِسمًا (بحسب عناصر تكوينهم) ذُكرت وجوهٌ كثيرة للسير إلى المآلات.
पराशर उवाच