Adhyāya 287 — Janaka’s Inquiry on Śreyas, Abhayadāna, and Asaṅga
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यत्र राजा धर्मनित्यो राज्यं धर्मेण पालयेत् । अपास्य कामान् कामेशो वसेत् तत्राविचारयन्,जहाँका राजा सदा धर्मपरायण रहकर धर्मानुसार ही राज्यका पालन करता हो और सम्पूर्ण कामनाओंका स्वामी होकर भी विषयभोगसे विमुख रहता हो, वहाँ बिना कुछ सोचे- विचारे निवास करना चाहिये
حيث يكون الملك ملازماً للدارما دائماً، يحكم مملكته بالدارما، نابذاً الشهوات؛ وإن كان سيد الرغبات كلّها فإنه معرضٌ عن لذّات الحسّ—ففي ذلك الموضع ينبغي الإقامة بلا تردّد ولا تكلّف نظر.
नारद उवाच