Adhyāya 283: Varṇa-vṛtti, Nyāya-ārjana, and the Decline-and-Restoration of Dharma (वर्णवृत्तिः न्यायार्जनं च)
तव यज्ञविघातार्थ सम्प्राप्तं विद्धि मामिह । मैं यहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका दर्शन करने या कौतूहलवश इस यज्ञका तमाशा देखनेके लिये नहीं आया हूँ। तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं तुम्हारे इस यज्ञका विनाश करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ।। वीरभद्र इति ख्यातों रुद्रकोपाद् विनि:सृत:,मेरा नाम वीरभद्र है। रुद्रदेवके क्रोधसे मेरा प्राकटय हुआ है। यह नारी भद्रकालीके नामसे विख्यात है और देवी पार्वतीके कोपसे प्रकट हुई है। देवाधिदेव महादेवने हम दोनोंको यहाँ भेजा है। इसलिये हम दोनों इस यज्ञके निकट आये हैं
tava yajñavighātārthaṃ samprāptaṃ viddhi mām iha | vīrabhadra iti khyāto rudrakopād viniḥsṛtaḥ |
قال فيرابهادرا: «اعلمْ أني جئتُ إلى هنا لغايةٍ واحدة: تعطيلُ قربانك (اليَجْنَة) وإفسادُه. ما حضرتُ لأرى البراهمةَ الأجلّاء المجتمعين، ولا بدافعِ الفضول لأتفرّج على هذا الطقس كأنه مشهد. افهمْ بجلاء: جئتُ لأدمّر هذا اليَجْنَة. أنا المشهور باسم فيرابهادرا، المنبثق من غضب رودرا.»
वीरभद्र उवाच