तृष्णाक्षय-उपदेशः
Instruction on the Cessation of Craving
उन्हें वे सनातन लोक प्राप्त होते हैं, जहाँ शोक और दुःखका सर्वथा अभाव है तथा जहाँ रजोगुण (काम-क्रोध आदि) का दर्शन नहीं होता। उस परम गतिको पाकर उन्हें गाहस्थ्य-आश्रममें रहने और यहाँके धर्मोके पालन करनेकी क्या आवश्यकता रह जाती है? ।। स्यूमरश्मिर्वाच यद्येषा परमा काष्ठा यद्येषा परमा गति: । गृहस्थानव्यपश्रित्य नाश्रमो<न्यः प्रवर्तते,स्यूमरश्मिने कहा--ज्ञान प्राप्त करके परब्रह्ममें स्थित हो जाना ही यदि पुरुषार्थकी चरम सीमा है, यदि वही उत्तम गति है, तब तो गृहस्थ-धर्मका महत्त्व और भी बढ़ जाता है; क्योंकि गृहस्थोंका सहारा लिये बिना कोई भी आश्रम न तो चल सकता है और न तो ज्ञानकी निष्ठा ही प्रदान कर सकता है
syūmarśmir uvāca | yady eṣā paramā kāṣṭhā yady eṣā paramā gatiḥ | gṛhasthān vyapāśritya nāśramo 'nyaḥ pravartate ||
قال سْيُومَرَشْمِي: إن كانت هذه حقًّا هي الغاية القصوى والمنتهى الأعلى—أن يثبت المرء في العليّ الأسمى بالمعرفة—فإن شأن طريق ربّ البيت (غِرْهَسْثا-آشرَما) يزداد وضوحًا وعظمة. إذ من غير الاعتماد على أرباب البيوت لا يستطيع أي طورٍ آخر من أطوار الحياة أن يقوم على وجهه أو يثبت؛ فالأشرمات الأخرى إنما تقوم على ما يمدّه الغِرْهَسْثا من عونٍ ونفقةٍ ورعاية.
कपिल उवाच