कामद्रुम-रूपकः तथा शरीर-पुर-रूपकः
The Desire-Tree and the Body-as-City Metaphors
महत: परमव्यक्तमव्यक्तात् परतो$मृतम् | अमृतान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गति:,जीवात्मासे बलवान् है अव्यक्त (मूल प्रकृति) और अव्यक्तसे बलवान् और श्रेष्ठ है अमृतस्वरूप परमात्मा। उस परमात्मासे बढ़कर श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। वही श्रेष्ठताकी चरम सीमा और परम गति है प्रसार्येह यथाड्रानि कूर्म: संहरते पुनः । तद्धन्महान्ति भूतानि यवीय:सु विकुर्वते जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको सब ओर फैलाकर फिर समेट लेता है, इसी प्रकार ये सारे महाभूत छोटे-छोटे शरीरोंमें विकृत होते--उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं
vyāsa uvāca |
mahataḥ param avyaktam avyaktāt parato 'mṛtam |
amṛtān na paraṃ kiñcit sā kāṣṭhā sā parā gatiḥ |
prasāryeha yathāṅgāni kūrmaḥ saṃharate punaḥ |
tadvan mahānti bhūtāni yavīyaḥsu vikurvate |
قال فياسا: «فوق المبدأ العظيم (mahat) يقوم غيرُ المتجلّي (avyakta)؛ وفوق غير المتجلّي يقوم الخالد—الذات العليا. لا شيء البتّة أسمى من تلك الحقيقة الخالدة؛ فهي الغاية القصوى والملاذ الأخير. وكما تبسط السلحفاة أطرافها إلى كل جهة ثم تضمّها من جديد، كذلك تتسع العناصر العظمى فتدخل في صورٍ جسدية أصغر ثم تنسحب ثانية—تتجلّى وتذوب على الدوام.»
व्यास उवाच