कामद्रुम-रूपकः तथा शरीर-पुर-रूपकः
The Desire-Tree and the Body-as-City Metaphors
यद्यप्यस्य महीं दद्याद् रत्नपूर्णामिमां नर: । इदमेव ततः श्रेय इति मन्येत तत्त्ववित्,यदि कोई मनुष्य रत्नोंसे भरी हुई यह सम्पूर्ण पृथ्वी देने लगे तो भी तत्त्ववेत्ता पुरुष यही समझे कि इस सारे धनकी अपेक्षा यह ज्ञान ही श्रेष्ठ है तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं किंचिदात्मनि लक्षयेत् । प्रशान्तमिव संशुद्ध॑ सत्त्वं तदुपधारयेत् जब अपनेमें कुछ प्रसन्नतायुक्त विशुद्ध और शान्त-सा भाव दिखायी दे, तब यह निश्चय करे कि सत्वगुण प्रवृत्त हुआ है
vyāsa uvāca |
yady apy asya mahīṁ dadyād ratnapūrṇām imāṁ naraḥ |
idam eva tataḥ śreya iti manyeta tattvavit |
tatra yat prītisaṁyuktaṁ kiñcid ātmani lakṣayet |
praśāntam iva saṁśuddhaṁ sattvaṁ tad upadhārayet |
قال فياسا: ولو أن رجلاً وهب هذه الأرض كلّها مملوءة بالجواهر، لَحَكَمَ العارف بالحقيقة أن الخير الأعلى إنما هو هذا وحده: المعرفة. وفي هذا الشأن، إذا لاحظ المرء في نفسه سرورًا مقرونًا بالمودّة—شيئًا مُنقّى كأنه ساكن—فليعلم أن صفة السَتْفَة (sattva) قد نهضت وصارت تعمل.
व्यास उवाच