कामद्रुम-रूपकः तथा शरीर-पुर-रूपकः
The Desire-Tree and the Body-as-City Metaphors
ऑपनआक्रात बछ। 2 षट्चत्वारिशंर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय व्यास उवाच प्रकृत्यास्तु विकारा ये क्षेत्रज्ञस्तैरधिष्ठित: । न चैनं ते प्रजानन्ति स तु जानाति तानपि,अफत-४#-कातज सप्तचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन शुक उवाच अध्यात्म विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे । यदशध्यात्मं यथा वेद भगवनृषिसत्तम शुकदेवजीने कहा--भगवन! मुनिश्रेष्ठ) अब पुनः मुझे अध्यात्मज्ञानका विस्तारपूर्वक उपदेश दीजिये। अध्यात्म क्या है और उसे मैं कैसे जानूँगा?
vyāsa uvāca | prakṛtyāstu vikārā ye kṣetrajñastair adhiṣṭhitaḥ | na cainaṃ te prajānanti sa tu jānāti tān api ||
قال فياسا: إن التحوّلات الناشئة من براكريتي (Prakṛti) يتولّاها «عارف الحقل» (Kṣetrajña)، أي الذات الواعية. غير أن تلك التبدّلات نفسها لا تعرفه؛ أمّا هو فيعرفها جميعًا. وهكذا يؤكد التعليم سموّ الذات على حالات الطبيعة المتغيّرة ويدعو إلى التمييز: لا تخلط بين المتحوّل وبين العارف الحق.
व्यास उवाच