Ātma-saṃyama-dharma: One-pointedness of Mind and Senses (शुक–व्यास संवादः)
- पाँच इन्द्रियाँ, पाँच इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव (शीतोष्णादि धर्म), चेतना (ज्ञानशक्ति), मन, प्राण, अपान और जीव-- ये सोलह तत्त्व पूर्वमें २३९ वें अध्यायके १३ वें श्लोकमें बतला चुके हैं। द्विचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन शुक उवाच क्षरात्प्रभृति यः सर्ग: सगुणानीन्द्रियाणि च । बुद्ध्यैश्वर्यातिसगों<5यं प्रधानश्वात्मन: श्रुतम्,शुकदेवजीने पूछा--पिताजी! क्षर अर्थात् प्रधानसे जो चौबीस तत्त्वोंवाली सामान्य सृष्टि हुई है तथा शब्द आदि विषयोंसहित जो इन्द्रियाँ हैं, उनकी सृष्टि बुद्धिके सामर्थ्यसे हुई है, अत: यह अतिसर्ग--असाधारण सृष्टि है। बन्धनकारी होनेके कारण इसे प्रमुख या प्रबल माना गया है, यह दोनों प्रकारकी सृष्टि पुरुषके संनिधानसे, प्रकृतिसे उत्पन्न हुई है; यह सब मैंने पहले सुन लिया है
śuka uvāca | kṣarāt prabhṛti yaḥ sargaḥ sa-guṇānīndriyāṇi ca | buddhy-aiśvaryātisargo 'yaṃ pradhānaś cātmanaḥ śrutam ||
قال شوكا: «يا أبتِ، لقد سمعتُ من قبل عن الفيض الذي يبدأ من المبدأ الفاني—برادهانا (Pradhāna)—أي الخلق العام المؤلف من الأربعة والعشرين تَتْفَة، وسمعتُ أيضاً عن الحواس مع موضوعاتها وصفاتها. ولأن هذا الخلق اللاحق الاستثنائي يجري بقوة البُدّهي (العقل المميِّز)، سُمّي أَتِسَرْغا (atisarga: فيضاً خاصاً). ولأنه يصير سبباً للوثاق، عُدَّ غالباً شديد الأثر. وكلا نوعي الخلق ينشآن من براكريتي (Prakṛti) بحضور بوروشا (Puruṣa)؛ وهذا القدر قد تعلمته.»
शुक उवाच