Adhyāya 240: Indriya–Manas–Buddhi–Ātman — The Inner Hierarchy and Restraint (इन्द्रिय-मनस्-बुद्धि-आत्म-क्रमः)
सिध्यन्ति चास्य सर्वार्था विज्ञानं च प्रवर्तते । सम: सर्वेषु भूतेषु लब्धालब्धेन वर्तयन्,सत्त्वसंसेवनाद धीरो निद्रामुच्छेत्तुमरहति । विद्वानोंने योगके जो काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवाँ स्वप्र--ये पाँच दोष बताये हैं उनका पूर्णतया उच्छेद करे। इनमेंसे क्रोधको शम (मनोनिग्रह) के द्वारा जीते, कामको संकल्पके त्यागद्वारा पराजित करे तथा धीर पुरुष सत्वगुणका सेवन करनेसे निद्राका उच्छेद कर सकता है इतना ही नहीं, इनसे साधक के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा उसे विज्ञानकी भी प्राप्ति होती है। योगीको चाहिये कि वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान भाव रक्खे। जो कुछ भी मिले या न मिले, उसीसे संतोषपूर्वक निर्वाह करे। पापोंको धो डाले तथा तेजस्वी, मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करके ब्रह्मपदको पानेकी इच्छा करे
sidhyanti cāsya sarvārthā vijñānaṃ ca pravartate | samaḥ sarveṣu bhūteṣu labdhālabdhena vartayan, sattvasaṃsevanād dhīro nidrām ucchettum arhati |
قال فياسا: بمثل هذا الانضباط تُقضى مقاصد السالك كلها، ويبدأ التمييز الحقّ بالعمل. فإذا استوى قلبه تجاه جميع الكائنات، وعاش بالقناعة سواء نال أو لم ينل، فإنّ الثابت—بملازمة السَّتْفَة—يغدو أهلًا لقطع النوم (الفتور والغفلة). وهكذا تتميّز حياة اليوغا بالمساواة مع الخلائق، وبالتحرر من الاضطراب أمام النتائج، وبالصفاء الباطن الناشئ من الطهارة وضبط النفس.
व्यास उवाच