अक्रुध्यन्तमहृष्यन्तमप्रियेषु प्रियेषु च । काज्चने वाथ लोष्टे वा उभयो: समदर्शनम्,प्रह्नादजीके मनमें किसी विषयके प्रति आसक्ति नहीं थी। उनके सारे पाप धुल गये थे। वे कुलीन और बहुश्रुत विद्वान् थे। वे गर्व और अहंकारसे रहित थे। वे धर्मकी मर्यादाके पालनमें तत्पर और शुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित रहते थे। निन्दा और स्तुतिको समान समझते, मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखते और एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशका ज्ञान था। अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त तथा प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षयुक्त नहीं होते थे। मिट्टीके ढेले और सुवर्ण दोनोंमें उनकी समानदृष्टि थी। वे ज्ञानस्वरूप कल्याणमय परमात्माके ध्यानमें स्थित और धीर थे। उन्हें परमात्मतत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया था। उन्हें परावरस्वरूप ब्रह्मका पूर्ण ज्ञान था। वे सर्वज्ञ, सम्पूर्णभूत- प्राणियोंमें समदर्शी एवं जितेन्द्रिय थे। वे भगवान् नारायणके प्रिय भक्त और सदा उन्हींके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले थे। हिरण्यकशिपुनन्दन प्रह्नादजीको एकान्तमें बैठकर परमात्मा श्रीहरिका ध्यान करते देख इन्द्र उनकी बुद्धि और विचारको जाननेकी इच्छासे उनके निकट जाकर इस प्रकार बोले--
akrudhyantam ahṛṣyantam apriyeṣu priyeṣu ca | kāñcane vātha loṣṭe vā ubhayoḥ samadarśanam ||
قال بهيشما: لم يكن يغضب إذا لقي ما يكره، ولا يطرب إذا لقي ما يحب. سواء كان ذهبًا أو كتلةً من تراب، نظر إلى كليهما بعينٍ واحدةٍ من التسوية. وهكذا، ثابتَ القلب، منزَّهًا عن التعلّق، ظلّ راسخًا في اتزانٍ باطني—وهي سِمةٌ أخلاقية لمن قهر دوافع النفور والشهوة.
भीष्म उवाच
The verse teaches equanimity: a disciplined person is neither provoked by the unpleasant nor intoxicated by the pleasant, and regards wealth and worthlessness (gold and a clod) with the same steady, impartial vision.
In Bhīṣma’s discourse in the Śānti Parva, he describes the qualities of an exemplary, spiritually mature person—highlighting emotional steadiness and equal regard toward opposites such as pleasure/pain and gold/clod.