(युधिष्ठिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रयाणकाले कि जप्य॑ मोक्षिभिस्तत्त्वचिन्तकै: ।। युधिष्ठिरने पूछा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले तत्त्व-चिन्तकोंको मृत्युकालमें किस मन्त्रका जप करना चाहिये ।। किमनुस्मरन् कुरुश्रेष्ठ मरणे पर्युपस्थिते । प्राप्रुयात् परमां सिद्धि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। कुरुश्रेष्ठ! मृत्युका समय उपस्थित होनेपर किसका चिन्तन करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त हो सकता है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच सद्युक्तिसहित: सूक्ष्म उक्त: प्रश्नस्त्वयानघ । शृणुष्वावहितो राजन् नारदेन पुरा श्रुतम् ।। भीष्मजीने कहा--राजन्! निष्पाप नरेश! तुमने जो प्रश्न उपस्थित किया है, वह उत्तम युक्तियुक्त और सूक्ष्म है। उसे सावधान होकर सुनो। जो पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे सुना था, वहीं मैं तुमसे कहता हूँ ।। श्रीवत्साड़कं जगद्बीजमनन्तं लोकसाक्षिणम् | पुरा नारायण देवं नारद: परिपृष्टवान् ।। जिनका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित है, जो इस जगत्के बीज (मूल कारण) हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है तथा जो इस जगतके साक्षी हैं, उन्हीं भगवान् नारायणसे पूर्वकालमें नारदजीने इस प्रकार प्रश्न किया ।। नारद उवाच त्वामक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमस: परम् । आहहुर्वेद्य॑ परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम् ।। भगवन् भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितिन्द्रियै: । कथं भक्तिविंचिन्त्योडसि योगिभिमोक्षकांक्षिभि: ।। नारदजीने पूछा--भगवन्! महर्षिगण कहते हैं, आप अविनाशी (नित्य), परब्रह्म, निर्मुण, अज्ञानान्धकार एवं तमोगुणसे अतीत, विद्याके अधिपति, परम धामस्वरूप, ब्रह्मा तथा उनकी प्राकट्यभूमि--आदिकमलके उत्पत्ति-स्थान हैं। भूत और भविष्यके स्वामी परमेश्वर! श्रद्धालु और जितेन्द्रिय भक्तों तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले योगियोंको आपके स्वरूपका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? ।। किं च जप्यं जपेन्नित्यं कल्यमुत्थाय मानव: । कथं युञ्जन् सदा ध्यायेद् ब्रूहि तत्त्वं सनातनम् ।। मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर किस जपनीय मन्त्रका जप करे और योगी पुरुष किस प्रकार निरन्तर ध्यान करे? आप इस सनातन तत्त्वका वर्णन कीजिये ।। श्रुत्वा तस्य तु देवर्षेर्वाक्यं वाचस्पति: स्वयम् | प्रोवाच भगवान् विष्णु्नररिदं वरद: प्रभु: ।। देवर्षि नारदका यह वचन सुनकर वाणीके अधिपति वरदायक भगवान् विष्णुने नारदजीसे इस प्रकार कहा ।। श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि इमां दिव्यामनुस्मृतिम् । यामधीत्य प्रयाणे तु मद्भावायोपपद्यते ।। श्रीभगवान् बोले--देवर्षे! मैं हर्षपूर्वक तुम्हारे सामने इस दिव्य अनुस्मृतिका वर्णन करता हूँ। मृत्युकालमें जिसका अध्ययन और श्रवण करके मनुष्य मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।। ओड्कारमग्रत: कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद । एकाग्र: प्रयतो भूत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ।। ओ नमो भगवते वासुदेवायेति । नारद! आदिमें ओंकारका उच्चारण करके मुझे नमस्कार करे। अर्थात् एकाग्र एवं पवित्रचित्त होकर इस मन्त्रका उच्चारण करे--*३०» नमो भगवते वासुदेवाय” इति ।। इत्युक्तो नारद: प्राह प्राउजलि: प्रणत: स्थित: ।। सर्वदेवेश्वरं विष्णुं सर्वात्मानं हरिं प्रभुम् | भगवानके ऐसा कहनेपर नारदजी हाथ जोड़ प्रणाम करके खड़े हो गये और उन सर्वदेवेश्वर सर्वात्मा एवं पापहारी प्रभु श्रीविष्णुसे बोले ।। नारद उवाच अव्यक्तं शाश्तं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ।। प्रपद्ये प्राउजलिररविंष्णुमक्षरं परमं पदम् | नारदजीने कहा--प्रभो! जो अव्यक्त सनातन देवता, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुरुषोत्तम, अविनाशी और परम पदस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं हाथ जोड़कर शरण लेता हूँ ।। पुराणं प्रभवं नित्यमक्षयं लोकसाक्षिणम् |। प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् । जो पुराणपुरुष, सबकी उत्पत्तिके कारण, नित्य, अक्षय और सम्पूर्ण जगतके साक्षी हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, उन भक्तवत्सल भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ।। लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परमं पदम् ।। भगवन्तं प्रपन्नो5स्मि भूतभव्य भवत्प्रभुम् । जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी तथा संरक्षक हैं, जिनके सहस्ौरों नेत्र हैं; तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन अद्भुत परमपदरूप भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ।। स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं विश्वतोमुखम् ।। पद्मनाथं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् । समस्त लोकोंके स्रष्टा और सब ओर मुखवाले, अनन्त, सत्य, अच्युत एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंक स्वामी भगवान् पद्मनाभकी मैं शरण लेता हूँ ।। हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भ परत: परम् ।। प्रभो: प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् । जो हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वीको गर्भमें धारण करनेवाले, परात्पर तथा प्रभुओंके भी प्रभु हैं, उन अनादि, अनन्त तथा सूर्यके समान कान्तिवाले भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ ।। सहस्रशीर्ष पुरुषं महर्षि तत्त्वदभावनम् ।। प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यम भयप्रदम् | जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी आत्मा हैं, तत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले महर्षि कपिलस्वरूप हैं, उन सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयप्रद भगवान् श्रीहरिकी शरण लेता हूँ ।। नारायणं पुराणर्षि योगात्मानं सनातनम् ।। संस्थान सर्वतत्त्वानां प्रपद्ये ध्रुवमी श्वरम् । जो पुरातन ऋषि नारायण हैं, योगात्मा हैं, सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण तत्त्वोंके अधिष्ठान एवं अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ ।। यः प्रभु: सर्वभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।। चराचरगुरुरविंष्णु: स मे देव: प्रसीदतु । जो सम्पूर्ण भूतोंके प्रभु हैं, जिन्होंने इस समस्त संसारको व्याप्त कर रखा है; तथा जो चर और अचर प्राणियोंके गुरु हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। यस्मादुत्पद्यते ब्रह्मा पच्ययोनि: पितामहः ।। ब्रह्मयोनिर्हि विश्वात्मा स मे विष्णु: प्रसीदतु । जिनसे पदमयोनि पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति होती है; तथा जो वेद और ब्राह्मणोंकी योनि हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजजड़मे । ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके परावरे ।। आभूतसम्प्लवे चैव प्रलीने प्रकृती महान् । एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णु: प्रसीदतु ।। प्राचीन कालमें महाप्रलय प्राप्त होनेपर जब सभी चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, ब्रह्मा आदि देवताओंका भी लय हो जाता है और संसारकी छोटी-बड़ी सभी वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं; तथा सम्पूर्ण भूतोंका क्रमश: लय होकर जब प्रकृतिमें महत्तत््व भी विलीन हो जाता है, उस समय जो एकमात्र शेष रह जाते हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। चतुर्भिश्न चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पज्चभिरेव च । हयते च पुनर्द्धाभ्यां स मे विष्णु: प्रसीदतु ।। चार, चारः, दो5, पाँच तथा दोः--इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंद्वारा जिन्हें आहुति दी जाती है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। पर्जन्य: पृथिवी सस्य॑ कालो धर्म: क्रियाक्रिये । गुणाकर: स मे बश्रुर्वासुदेव: प्रसीदतु ।। मेघ, पृथ्वी, सस्य, काल, धर्म, कर्म और कर्मका अभाव--ये सब जिनके स्वरूप हैं, गुणोंके भण्डाररूप वे श्यामवर्ण भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों ।। अग्नीषोमार्कताराणां ब्रह्मरद्रेन्द्रयोगिनाम् । यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णु: प्रसीदतु ।। जो अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, तारागण, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके भी तेजको जीत लेते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद । यज्ञगर्भ हिरण्याड़ पठ्चयज्ञ नमो>स्तु ते ।। योगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है। सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पजचयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है ।। चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित । सर्वावास नमस्ते<स्तु वासुदेव प्रधानकृत् ।। आप श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्यम्म और अनिरुद्ध--इन चार रूपोंवाले, परमधामस्वरूप, लक्ष्मीनिवास, परमपूजित, सबके आवासस्थान और प्रकृतिके भी प्रवर्तक हैं। वासुदेव! आपको नमस्कार है ।। अजस्त्वमगम: पन्था हामूर्तिविश्विमूर्तिधृक् । विकर्त: पठचकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ।। आप अजन्मा हैं, अगम्य मार्ग हैं, निराकार हैं अथवा जगत्के सम्पूर्ण आकार आप ही धारण करते हैं, आप ही संहारकारी रुद्र हैं। आप प्रातः, सद्भव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न--इन पाँच कालोंको जाननेवाले हैं। ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है ।। अव्यक्ताद व्यक्तमुत्पन्नं व्यक्ताद् यस्तु परो$क्षर: । यस्मात् परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गत: ।। जिन अव्यक्त परमात्मासे इस व्यक्त जगतकी उत्पत्ति हुई है, जो व्यक्तसे परे और अविनाशी हैं, जिनसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरणमें आया हूँ ।। न प्रधानो न च महान् पुरुषश्लेतनो हाज: । अनयोर्य: परतर: तमस्मि शरणं गत: ।। प्रकृति और महत्तत्त्व--ये दोनों जड हैं। पुरुष चेतन और अजन्मा है। इन दोनों क्षर और अक्षर पुरुषोंसे जो उत्कृष्ट और विलक्षण हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी मैं शरण लेता हूँ ।। चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्देशानादय: प्रभुम् निशक्षयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गत: ।। ब्रद्मया और शिव आदि देवता जिन भगवानका सदा चिन्तन करते रहनेपर भी उनके स्वरूपके सम्बन्धमें किसी निश्चयतक नहीं पहुँच पाते, उन परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ ।। जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणा: । य॑ प्राप्प न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ।। ज्ञानी और ध्यानपरायण जितेन्द्रिय महात्मा जिन्हें पाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।। एकांशेन जगत् सर्वमवष्ट भ्य विभु: स्थित: । अग्राह्मो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गत: ।। जो सर्वव्यापी परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशसे धारण करके स्थित हैं, जो किसी इन्द्रियविशेषके द्वारा ग्रहण नहीं किये जाते तथा जो निर्गुण एवं नित्य हैं, उन परमात्माकी मैं शरणमें जाता हूँ ।। सोमाकॉम्निमयं तेजो या च तारामयी टद्युति: । दिवि संजायते यो<यं स महात्मा प्रसीदतु ।। आकाशमें जो सूर्य और चन्द्रमाका तेज प्रकाशित होता है तथा तारगणोंकी जो ज्योति जगमगाती रहती है, वह सब जिनका ही स्वरूप है, वे परमात्मा मुझपर प्रसन्न हों ।। गुणादिर्निर्गुणश्वाद्यो लक्ष्मीवांश्वेतनो हज: । सूक्ष्म: सर्वगतो योगी स महात्मा प्रसीदतु ।। जो समस्त गुणोंके आदि कारण और स्वयं निर्गुण हैं, आदि पुरुष, लक्ष्मीवान्ू, चेतन, अजन्मा, सूक्ष्म, सर्वव्यापी तथा योगी हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। सांख्ययोगाश्षु ये चान्ये सिद्धाश्ष परमर्षय: । यं विदित्वा विमुच्यन्ते स महात्मा प्रसीदतु ।। ज्ञानयोगी, कर्मयोगी तथा जो दूसरे-दूसरे सिद्ध और महर्षि हैं, वे जिन्हें जानकर इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। अव्यक्त: समधिष्ठाता हुचिन्त्य: सदसत्पर: । आस्थिति: प्रकृतिश्रेष्ठ: स महात्मा प्रसीदतु ।। जो अव्यक्त, सबके अधिष्ठाता, अचिन्त्य और सत्-असतसे विलक्षण हैं, आधाररहित एवं प्रकृतिसे श्रेष्ठ हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। क्षेत्रज्ञ: पञ्चधा भुझुक्ते प्रकृतिं प्चभिर्मुखै: । महान् गुणांश्व यो भुड्क्ते स महात्मा प्रसीदतु ।। जो जीवात्मारूपसे पाँच ज्ञानेन्द्रियरूपी मुखोंद्वारा शब्द आदि पाँच विषयोंका उपभोग करते हैं तथा स्वयं महान् होकर भी जो गुणोंका अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। सूर्यमध्ये स्थित: सोमस्तस्य मध्ये च या स्थिता । भूतबाह्या च या दीप्ति: स महात्मा प्रसीदतु ।। जो सूर्यमण्डलमें सोमरूपसे स्थित होते हैं, उस सोमके भीतर जो अलौकिक दीप्ति है, वह जिनका स्वरूप है, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। नमस्ते सर्वतः सर्व सर्वतो$क्षिशिरोमुख । निर्विकार नमस्ते3स्तु साक्षी क्षेत्रे व्यवस्थित: ।। सर्वस्वरूप परमेश्वर! आपको सब ओरसे नमस्कार है, आपके सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं। निर्विकार परमात्मन! आपको नमस्कार है। आप प्रत्येक क्षेत्र (शरीर)-में साक्षीरूपसे स्थित हैं ।। अतीन्द्रिय नमस्तुभ्यं लिज्ैव्यक्तैर्न मीयसे । ये च त्वां नाभिजानन्ति संसारे संसरन्ति ते ।। इन्द्रियातीत परमेश्वर! आपको नमस्कार है। व्यक्त लिंगोंद्वारा आपका ज्ञान होना असम्भव है। संसारमें जो आपको नहीं जानते, वे जन्म-मृत्युके चक््करमें पड़े रहते हैं ।। कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषविवर्जिता: । नान्यभक्ता विजानन्ति न पुनर्नरका द्विजा: ।। जो काम और क्रोधसे मुक्त, राग-द्वेषसे रहित तथा आपके अनन्य भक्त हैं, वे ही आपको जान पाते हैं। जो विषयोंके नरकमें पड़े हुए द्विज हैं, वे आपको नहीं जानते हैं ।। एकान्तिनो हि निर्दधन्द्धा निराशी:कर्मकारिण: । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशन्ति विनिश्चिता: ।। जो आपके अनन्य भक्त, द्वद्धोंसे रहित तथा निष्काम कर्म करनेवाले हैं, जिन्होंने ज्ञानममयी अग्निसे अपने समस्त कर्मोंको दग्ध कर दिया है, वे आपके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाले पुरुष आपमें ही प्रवेश करते हैं ।। अशरीरं शरीरस्थं सम॑ सर्वेषु देहिषु । पुण्यपापविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां प्रविशन्त्युत ।। आप शरीरमें रहते हुए भी उससे रहित हैं तथा सम्पूर्ण देहधारियोंमें समभावसे स्थित हैं। जो पुण्य और पापसे मुक्त हैं, वे भक्तजन आपमें ही प्रवेश करते हैं ।। अव्यक्त बुद्धाहड्कारमनोभूतेन्द्रियाणि च । त्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न ते त्वयि ।। अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार, मन, पञ्च महाभूत तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सभी आपमें हैं और उन सबमें आप हैं, किंतु वास्तवमें न उनमें आप हैं, न आपमें वे हैं ।। एकत्वान्यत्वनानात्वं ये विदुर्यान्ति ते परम् । समो<सि सर्वभूतेषु न ते द्वेष्यो5स्ति न प्रिय: ।। समत्वमभिकांक्षे5हं भक््त्या वै नान्यचेतसा | एकत्व, अन्यत्व और नानात्वका रहस्य जो लोग अच्छी तरह जानते हैं, वे आप परमात्माको प्राप्त होते हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंमें सम हैं। आपका न कोई द्वेषपात्र है और न प्रिय। मैं अनन्य चित्तसे आपकी भक्तिके द्वारा समत्व पाना चाहता हूँ ।। चराचरमिदं सर्व भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। त्वया त्वय्येव तत् प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । चार प्रकारका जो यह चराचर प्राणिसमुदाय है, वह सब आपसे व्याप्त है। जैसे सूतमें मणियाँ पिरोये होते हैं, उसी प्रकार यह सारा जगत् आपमें ही ओत-प्रोत है ।। सत्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्ाुतत्त्वस्तत्त्वसंज्ञित: ।। अकर्महेतुरचल: पृथगात्मन्यवस्थित: । आप जगतृके स्रष्टा, भोक्ता और कूटस्थ हैं। तत्त्वरूप होकर भी उससे सर्वथा विलक्षण हैं। आप कर्मके हेतु नहीं हैं। अविचल परमात्मा हैं। प्रत्येक शरीरमें पृथक्ू-पृथक् जीवात्मारूपसे आप ही विद्यमान हैं ।। न ते भूतेषु संयोगो भूततत्त्वगुणातिग: ।। अहड्कारेण बुद्धा वा न ते योगस्त्रिभिग्ुणै: । वास्तवमें प्राणियोंसे आपका संयोग नहीं है। आप भूत, तत्त्व और गुणोंसे परे हैं। अहंकार, बुद्धि और तीनों गुणोंसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं है ।। न ते धर्मोउस्त्यधर्मो वा नारम्भो जन्म वा पुनः ।। जरामरणमोक्षार्थ त्वां प्रपन्नो5स्मि सर्वश: । न आपका कोई धर्म है और न कोई अधर्म। न कोई आरम्भ है न जन्म। मैं जरा-मृत्युसे छुटकारा पानेके लिये सब प्रकारसे आपकी शरणमें आया हूँ ।। ईश्वरो5सि जगन्नाथ तत: परम उच्यसे ।। भक्तानां यद्धितं देव तद् ध्याहि त्रिदशेश्वर । जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं, इसीलिये परमात्मा कहलाते हैं। देव! सुरेश्वर! भक्तोंके लिये जो हितकी बात हो, उसका मेरे लिये चिन्तन कीजिये ।। विषयैरिन्द्रियै्वापि न मे भूय: समागम: ।। पृथिवीं यातु मे प्राणं यातु मे रसना जलम् | रूप॑ हुताशनं यातु स्पर्शो यातु च मारुतम् ।। श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनो वैकारिकं पुन: । विषयों और इन्द्रियोंके साथ फिर मेरा कभी समागम न हो। मेरी प्राणेन्द्रिय पृथ्वी- तत्त्वमें मिल जाय और रसना जलमें, रूप (नेत्र) अग्निमें, स्पर्श (त्वचा) वायुमें, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें और मन वैकारिक अहंकारमें मिल जाय ।। इन्द्रियाण्यपि संयान्तु स्वासु स्वासु च योनिषु ।। पृथिवी यातु सलिलमापोडग्निमनलो5निलम् । वायुराकाशमप्येतु मनश्वाकाश एव च ।। अहड्कारं मनो यातु मोहन सर्वदेहिनाम् अहड्कारस्ततो बुद्धि बुद्धिरव्यक्तमच्युत ।। अच्युत! इन्द्रियाँ अपनी-अपनी योनियोंमें मिल जाय, पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश मनमें, मन समस्त प्राणियोंको मोहनेवाले अहंकारमें, अहंकार बुद्धि (महत्तत्त्व)-में और बुद्धि अव्यक्त प्रकृतिमें मिल जाय ।। प्रधाने प्रकृतिं याते गुणसाम्ये व्यवस्थिते । वियोग: सर्वकरणैर्गुणभूतैश्व मे भवेत् ।। जब प्रधान प्रकृतिको प्राप्त हो जाय और गुणोंकी साम्यावस्थारूप महाप्रलय उपस्थित हो जाय, तब मेरा समस्त इन्द्रियों और उनके विषयोंसे वियोग हो जाय ।। निष्कैवल्यपदं तात काड्क्षेडहं परमं तव । एकीभावस्त्वया मे<स्तु न मे जन्म भवेत् पुनः ।। तात! मैं तुम्हारे लिये परम मोक्षकी आकांक्षा रखता हूँ। आपके साथ मेरा एकीभाव हो जाय। इस संसारमें फिर मेरा जन्म न हो ।। त्वदबुद्धिस्त्वदगतप्राणस्त्वद्धक्तस्त्वत्पररायण: । त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ।। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे। मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें। मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ। इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ ।। पूर्वदेहकृता ये मे व्याधय: प्रविशन्तु माम् । अर्दयन्तु च दुःखानि ऋण मे प्रतिमुऊ्चतु ।। पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके फलस्वरूप रोग-व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दुःख मुझे आकर सतावें। इन सबका जो मेरे ऊपर ऋण है, वह उतर जाय ।। अनुध्यातो5सि देवेश न मे जन्म भवेत् पुनः । तस्माद् ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ।। देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय ।। उपतिष्ठ न्तु मां सर्वे व्याधय: पूर्वसंचिता: । अनृणो गन्तुमिच्छामि तद् विष्णो: परमं पदम् ।। पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायँ। मैं सबसे उकऋ्रण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ ।। श्रीभगवानुवाच अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातन: । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ।। श्रीभगवान् बोले--नारद! मैं उस सौभाग्यशाली भक्तका हूँ और वह भक्त भी मेरा सनातन सखा है। मैं उसके लिये कभी अदृश्य नहीं होता और न वही कभी मेरी दृष्टिसे ओझल होता है ।। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पज्च बुद्धीन्द्रियाणि च । दशेन्द्रियाणि मनसि अहड्कारे तथा मन: ।। अहड्कारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । साधक पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर उन दसों इन्द्रियोंको मनमें विलीन करे। मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको आत्मामें लगावे ।। यतबुद्धीन्द्रिय: पश्यन् बुद्धा बुद्धोत् परात्परम् | ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर बुद्धिके द्वारा परात्पर परमात्माका अनुभव करे कि यह परमेश्वर मेरा है और मैं इसका हूँ, तथा इसीने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ।। आत्मना55त्मनि संयोज्य परमात्मन्यनुस्मरेत् ।। ततो बुद्धेः परं बुद्ूध्वा लभते न पुनर्भवम् | मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् ।। अपि पापसमाचार: स याति परमां गतिम् | स्वयं ही अपने-आपको परमात्माके ध्यानमें लगाकर निरन्तर उनका स्मरण करे, तदनन्तर बुद्धिसे भी परे परमात्माको जानकर मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मृत्युकाल आनेपर इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पुरुष पहलेका पापाचारी रहा हो तो भी परम गतिको प्राप्त होता है ।। ओ नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने ।। नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्रते । समस्त देहधारियोंके परमात्मा तथा भक्तोंके प्रति एकमात्र निष्ठा रखनेवाले उन सनातन भगवान् नारायणको नमस्कार है ।। इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहित: ।। स्वपन् विबुध्यंश्व पठन् यत्र तत्र समभ्यसेत् । यह दिव्य वैष्णवी-अनुस्मृति विद्या है। मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सोते, जागते और स्वाध्याय करते समय जहाँ कहीं भी इसका जप करता रहे ।। पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च विशेषत: ।। श्रावयेच्छुद्धानांश्व मद्भक्तांश्ष विशेषत: | पूर्णिमा, अमावास्या तथा विशेषत:ः द्वादशी तिथिको मेरे श्रद्धालु भक्तोंको इसका श्रवण करावे ।। यद्यहड्कारमाश्रित्य यज्ञदानतप:क्रिया: ।। कुर्वस्तत्फलमाप्रोति पुनरावर्तनं तु तत् यदि कोई अहंकारका आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करे तो उसका फल उसे मिलता है। परंतु वह आवागमनके चक््करमें डालनेवाला होता है ।। अभ्यर्चयन् पितृन् देवान् पठन् जुद्दन् बलिं ददत् ।। ज्वलन्नग्निं स्मरेद् यो मां स याति परमां गतिम् | जो देवताओं और पितरोंकी पूजा, पाठ, होम और बलिवैश्वदेव करते तथा अग्निमें आहुति देते समय मेरा स्मरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।। यज्ञं दानं तपस्तस्मात् कुर्यादाशीर्विवर्जित: । यज्ञ, दान और तप--ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं; अतः यज्ञ, दान और तपका निष्कामभावसे अनुष्ठान करे ।। नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्धक्त: श्रद्धयान्वित: ।। तस्याक्षयो भवेल्लोक: श्वपाकस्यापि नारद । नारद! जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक मेरे लिये केवल नमस्कारमात्र बोल देता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षयलोककी प्राप्ति होती है ।। कि पुनर्ये यजन्ते मां साधका विधिपूर्वकम् ।। श्रद्धावन्तो यतात्मानस्ते मां यान्ति मदाश्रिता: । फिर जो साधक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मेरे आश्रित हो श्रद्धा और विधिके साथ मेरी आराधना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ।। कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्धक्तो नान्तमश्लुते ।। मामेव तस्माद् देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रित: । अवाप्स्यसि ततः सिद्ध) द्रक्ष्यस्येव पद॑ मम ।। देवर्ष! सारे कर्म और उनके फल आदि-अन्तवाले हैं; परंतु मेरा भक्त अन्तवान् (विनाशशील) फलका उपभोग नहीं करता; अतः तुम सदा आलस्यरहित होकर मेरा ही ध्यान करो। इससे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परमधामका दर्शन कर लोगे ।। अज्ञानाय च यो ज्ञानं दद्याद् धर्मोपदेशत: । कृत्स्नां वा पृथिवीं दद्यात् तेन तुल्यं च तत्फलम् ।। जो धर्मोपदेशके द्वारा अज्ञानी पुरुषको ज्ञान प्रदान करता है अथवा जो किसीको समूची पृथ्वीका दान कर देता है तो उस ज्ञानदानका फल इस पृथ्वीदानके बराबर ही माना जाता है ।। तस्मात् प्रदेयं साधुभ्यो जन्मबन्धभयापहम् | एवं दत्त्वा नरश्रेष्ठ श्रेयो वीर्य च विन्दति ।। नरश्रेष्ठ नारद! इसलिये साधु पुरुषोंको जन्म और बन्धनके भयको दूर करनेवाला ज्ञान ही देना चाहिये। इस प्रकार ज्ञान देकर मनुष्य कल्याण और बल प्राप्त करता है ।। अश्वमेधसहस्राणां सहस्नं यः समाचरेत् । नासौ पदमवाप्रोति मद्धभक्तैर्यदवाप्यते ।। जो दस लाख अभश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान कर ले, वह भी उस पदको नहीं पा सकता, जो मेरे भक्तोंको प्राप्त हो जाता है ।। भीष्म उवाच एवं पृष्ट: पुरा तेन नारदेन सुर्िणा । यदुवाच तदा शम्भुस्तदुक्तं तव सुवत्रत ।। भीष्मजी कहते हैं--सुव्रत! इस प्रकार पूर्वकालमें देवर्षि नारदके पूछनेपर कल्याणमय भगवान् विष्णुने उस समय जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें बता दिया ।। त्वमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ध्येयं गुणातिगम् । भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ।। तुम भी एकचित्त होकर उन गुणातीत परमात्माका ध्यान करो और सम्पूर्ण भक्तिभावसे उन्हीं अविनाशी परमात्माका भजन करो ।। श्रुत्वैतन्नारदो वाक््यं दिव्यं नारायणेरितम् । अत्यन्तभक्तिमान् देव एकान्तत्वमुपेयिवान् ।। भगवान् नारायणका कहा हुआ यह दिव्य वचन सुनकर अत्यन्त भक्तिमान् देवर्षि नारद भगवानके प्रति एकाग्रचित्त हो गये ।। नारायणमृषिं देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् । इदं जपन वै प्राप्नोति तद् विष्णो: परमं पदम् ।। जो पुरुष अनन्यभावसे दस वर्षोतक ऋषि-प्रवर नारायणदेवका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ।। कि तस्य बहुभिमम॑न्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने । नमो नारायणायेति मन्त्र: सर्वार्थलाधक: ।। जिसकी भगवान् जनार्दनमें भक्ति है, उसे बहुत-से मन्त्रोंद्वारा क्या लेना है? '३० नमो नारायणाय” यह एकमात्र मन्त्र ही सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला है ।। इमां रहस्यां परमामनुस्मृति- मधीत्य बुद्धि लभते च नैछ्िकीम् । विहाय दुःखान्यवमुच्य सड्कटात् स वीतरागो विचरेन्महीमिमाम् ।।) इस परम गोपनीय अनुस्मृति विद्याका स्वाध्याय करके मनुष्य भगवानके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाली बुद्धि प्राप्त कर लेता है। वह सारे दुःखोंको दूर करके संकटसे मुक्त एवं वीतराग हो इस पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करता है ।। इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अन्तर्भूमिविक्रीडनं नाम नवाधिकद्धिशततमो< ध्याय:
bhīṣma uvāca |
sadyuktisahitaḥ sūkṣma uktaḥ praśnas tvayānagha |
śṛṇuṣvāvahito rājan nāradena purā śrutam ||
śrīvatsāṅkaṃ jagadbījam anantaṃ lokasākṣiṇam |
purā nārāyaṇaṃ devaṃ nāradaḥ paripṛṣṭavān ||
nārada uvāca |
tvām akṣaraṃ paraṃ brahma nirguṇaṃ tamasaḥ param |
āhuḥ vedyam paraṃ dhāma brahmādikam alodbhavam ||
bhagavan bhūtabhavyeśa śraddadhānaiḥ jitendriyaiḥ |
kathaṃ bhaktibhiś cintyo ’si yogibhir mokṣakāṅkṣibhiḥ ||
kiṃ ca japyaṃ japen nityaṃ kalyam utthāya mānavaḥ |
kathaṃ yuñjan sadā dhyāyed brūhi tattvaṃ sanātanam ||
śrībhagavān uvāca |
hanta te kathayiṣyāmi imāṃ divyām anusmṛtim |
yām adhītya prayāṇe tu madbhāvāyopapadyate ||
oṃkāram agrataḥ kṛtvā māṃ namaskṛtya nārada |
ekāgraḥ prayato bhūtvā imaṃ mantram udīrayet |
"oṃ namo bhagavate vāsudevāya" iti ||
… (tataḥ nāradena viṣṇoḥ stutir-anusmṛtiḥ; indriyasaṃhāraḥ; maraṇakāle smaraṇavidhiḥ; bhaktiphalaśrutiḥ) …
bhīṣma uvāca |
evaṃ pṛṣṭaḥ purā tena nāradena surarṣiṇā |
yad uvāca tadā viṣṇus tad uktaṃ tava suvrata ||
tvam apy ekamanā bhūtvā dhyāhi dhyeyaṃ guṇātigam |
bhajasva sarvabhāvena paramātmānam avyayam ||
…
"namo nārāyaṇāya" iti mantraḥ sarvārthalādhakaḥ ||
Bhishma said: Your question, O sinless king, is subtle, well-reasoned, and rightly framed. Listen attentively; I will repeat what I once heard from Narada. In former times Narada approached Narayana—marked with the Śrīvatsa, the seed of the universe, endless, and the witness of all worlds—and asked: “You are called the imperishable Supreme Brahman, beyond the darkness of ignorance, without limiting qualities, the highest knowable reality and the supreme abode, the source even of Brahmā and the lotus of origin. How should the faithful, self-controlled devotees and the yogins who long for liberation contemplate you? What should a person regularly recite upon rising at dawn, and how should a yogin maintain unbroken meditation? Teach me the eternal truth.” The Lord replied that he would teach a divine ‘anusmṛti’—a sacred recollection—by which, especially at the time of departure, one attains the Lord’s own state. He instructed Narada to begin with Oṃ, bow in reverence, become one-pointed and purified, and recite the mantra: “Oṃ, homage to the Blessed Lord Vāsudeva.” What follows is a long hymn of surrender and remembrance: Narada praises Vishnu as the ancient, unborn, all-pervading ruler; the inner witness in every body; the support of all principles; beyond prakṛti, intellect, ego, and the three guṇas; the light within sun, moon, and stars; the refuge of those freed from desire, anger, and duality. He prays that at death his mind and breath may rest in the Lord alone, that the senses dissolve back into their cosmic sources, and that he may go debtless—freed from karmic residue—to Vishnu’s highest abode. The Lord then teaches the inner discipline of withdrawal: restrain the ten senses, merge them into mind, mind into ego, ego into intellect, and intellect into the Self; know the Supreme beyond even intellect; and at the moment of death remember him in this way. Such remembrance, he declares, carries even a former wrongdoer to the highest goal. He praises the power of simple devotion—uttering ‘namaḥ’ with faith—and urges constant, unwearied meditation on Narayana rather than prideful ritualism. Bhishma concludes by urging Yudhishthira to become single-minded, worship the imperishable Supreme Self, and take up this remembrance as the sure support at life’s end.
भीष्म उवाच
At the time of death, liberation is secured by single-pointed remembrance of Narayana/Vishnu, supported by disciplined withdrawal of the senses and ego, and by devotional japa—especially the mantra “oṃ namo bhagavate vāsudevāya” (and the essence ‘namo nārāyaṇāya’). The passage emphasizes humility and surrender over ego-driven ritual merit.
Yudhishthira asks Bhishma what a seeker should recite and remember at death to attain the highest perfection. Bhishma answers by recounting an older dialogue: Narada questions Narayana about contemplation and japa for moksha; Vishnu teaches a divine ‘anusmṛti’ and the Vasudeva mantra, followed by Narada’s extensive hymn and the Lord’s instructions on meditative dissolution and deathbed remembrance.