मनुरुवाच — इन्द्रिय-मनः-ज्ञान-क्रमः
Manu on the hierarchy of senses, mind, and knowledge
संहिताके जपसे जो बल प्राप्त होता है, उसका आश्रय लेकर साधक अपने ध्यानको सिद्ध कर लेता है। वह शुद्धचित्त होकर तपके द्वारा मन और इन्द्रियोंको जीत लेता है तथा द्वेष और कामनासे रहित एवं आसक्ति और मोहसे रहित हुआ शीत और उष्ण आदि समस्त दन्द्ोंसे अतीत हो जाता है। अतः वह न तो कभी शोक करता है और न कहीं भी आसक्त होता है। वह कर्मोंका कारण और कार्यका कर्ता नहीं होता (अर्थात् अपनेमें कर्तापनका अभिमान नहीं लाता है) ।। न चाहड्कारयोगेन मनः प्रस्थापयेत् क्वचित् | नचार्थग्रहणे युक्तो नावमानी न चाक्रिय:,वह अहंकारसे मुक्त होकर कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता है। वह न तो स्वार्थ- साधनमें संलग्न होता है, न किसीका अपमान करता है और न अकर्मण्य होकर ही बैठता है
na cāhaṅkārayogena manaḥ prasthāpayet kvacit | na cārthagrahaṇe yukto nāvamānī na cākriyaḥ ||
قال بهيشما: لا ينبغي للمرء أن يوجّه ذهنه إلى أي موضع بدافع الأنا. ولا ينبغي أن ينغمس في اقتناص الربح والمنفعة؛ ولا أن يزدري الآخرين، ومع ذلك لا يجوز أن يسقط في خمولٍ عاطل. فالمنضبط، المتحرّر من إثبات الذات، يعيش بلا تملّك ولا احتقار، ويعمل بلا غرور ولا إهمال—وهكذا يمضي نحو الثبات الباطني والتحرّر.
भीष्म उवाच