Virūpākṣa’s Dāna and Gautama’s Burden — the approach of Rājadharma
भीष्म उवाच स्पृहा स्याद् गर्हिता चैव विधित्सा चैव कर्मणाम् | आक्रोष्टा क्रुश्यते चैव वज्चितो बुद्धयते स च,भीष्मजीने कहा--राजन्! जिसके मनमें बड़ी घृणित इच्छाएँ रहती हैं, जो हिंसाप्रधान कुत्सित कर्मोको आरम्भ करना चाहता है, स्वयं दूसरोंकी निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन््दा करते हैं, जो अपनेको दैवसे वज्चित समझता और पापमें प्रवृत्त होता है, दिये हुए दानका बारंबार बखान करता है, जिसके मनमें विषमता भरी रहती है, जो नीच कर्म करनेवाला, दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला और शठ है, भोग्य वस्तुओंको दूसरोंको दिये बिना ही अकेले भोगता है, जिसके भीतर अभिमान भरा हुआ है, जो विषयोंमें आसक्त और अपनी प्रशंसाके लिये व्यर्थ ही बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाला है, जिसके मनमें सबके प्रति संदेह बना रहता है, जो कौएकी तरह वंचक दृष्टि रखनेवाला है, जिसमें कृपणता कूट- कूटकर भरी है, जो अपने ही वर्गके लोगोंकी प्रशंसा करता, सदा आश्रमोंसे द्वेष रखता और वर्णसंकरता फैलाता है, सदा हिंसाके लिये ही जिसका घूमना-फिरना होता है, जो गुणको भी अवगुणके समान समझता और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मनमें उदारता नहीं है और जो अत्यन्त लोभी है, ऐसा मनुष्य ही नृशंस कर्म करनेवाला कहा गया है
bhīṣma uvāca spṛhā syād garhitā caiva vidhitsā caiva karmaṇām | ākroṣṭā kruśyate caiva vañcito budhyate sa ca ||
قال بهيشما: «أيها الملك، يُعرَف الرجلُ بشهوةٍ مذمومة وبنزوعٍ إلى الشروع في أفعالٍ غير لائقة. يسبّ الناس ويُسبّ بدوره؛ ثم إذ يظنّ أن القدر خدعه أو حرمه، يستحكم في قلبه المرار ويُوجّه ذهنه إلى الإثم.»
भीष्म उवाच
Bhishma identifies a moral downward spiral: blameworthy craving leads to intent for improper action; habitual abuse invites abuse; and a sense of being wronged or deprived fosters resentment that inclines one toward unethical conduct.
In the Shanti Parva’s instruction to the king, Bhishma continues a diagnostic description of ignoble dispositions and behaviors, outlining traits by which a person inclined to cruelty and wrongdoing can be recognized.