अध्याय १५२: लोभः पापस्य मूलम् — Greed as the Root of Wrongdoing
केचिदेव महाप्राज्ञा: प्रतिज्ञास्यन्ति तत्त्वतः: | जानीहि मत्कृतं तात ब्राह्मणान् प्रति भारत,तात! भारत! कोई-कोई महाज्ञानी पुरुष ही मेरे अभिप्रायको यथार्थरूपसे समझ सकेंगे। ब्राह्मणोंके प्रति भलाई करनेके लिये ही मेरी यह सारी चेष्टा है। यह तुम अच्छी तरह जान लो
«لن يفهم قصدي على حقيقته إلا نفرٌ قليل من ذوي الحكمة العظمى. فاعلم يا بُنيّ، يا من نسلُ بهاراتا: إن كل سعيي هذا إنما هو لعمل الخير تجاه البراهمة.»
शौनक उवाच