Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
- कोयलका श्रेष्ठ गुण है कण्ठकी मधुरता, सूअरके आक्रमणको रोकना कठिन है, यही उसकी विशेषता है; मेरुका गुण है सबसे अधिक उन्नत होना, सूने घरकी विशेषता है अनेकको आश्रय देना, नटका गुण है दूसरोंको अपने क्रिया- कौशलद्दारा संतुष्ट करना तथा अनुरक्त सुहृदकी विशेषता है हितपरायणता। ये सारे गुण राजाको अपनाने चाहिये। एकचत्वारिंशर्दाधिकशततमो< ध्याय: 'ब्राह्ण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे” इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद युधिछिर उवाच हीने परमके धर्मे सर्वतोकाभिलड्घिते । अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
yudhiṣṭhira uvāca | hīne parame dharme sarvato'bhilaṅghite | adharme dharmatāṁ nīte dharme cādharmatāṁ gate ||
قال يودهيشثيرا: إذا انحطّ الدَّرْم الأعلى وصار منتهكًا من كل جانب؛ وإذا عُدَّ الأدهَرما دَرْمًا، وحُكم على الدَّرْم نفسه بأنه أدهَرما—ففي مثل هذا الانهيار المروّع لنظام الأخلاق، بأيّ وسيلةٍ ينبغي للبرهميّ أن يقيم حياته؟
युधिछिर उवाच
The verse frames a classic dharma-śāstra problem: when society’s moral compass collapses and values invert, ethical life becomes difficult. It introduces the need for guidance on how a brāhmaṇa should preserve life and integrity amid systemic adharma.
In Śānti Parva, Yudhiṣṭhira raises a question about conduct during extreme social breakdown—when dharma is widely violated and adharma is normalized. This sets up the ensuing discussion (not yet in this verse) on survival and right action in a time of calamity.