Dvaipāyana-hrade Duryodhanasya Māyā — Yudhiṣṭhirasya Dharmoktiḥ (Śalya-parva, Adhyāya 30)
इस प्रकार श्रीमयहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत ह्वदप्रवेशपर्वमें उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २९ ॥/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं।) अपना बक। ] अि्शशा:< (गदापर्व) त्रिशो5थ्याय: अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यका सरोवरपर जाकर दुर्योधनसे युद्ध करनेके विषयमें बातचीत करना, व्याधोंसे दुर्योधनका पता पाकर युधिष्ठिरका सेनासहित सरोवरपर जाना और कृपाचार्य आदिका दूर हट जाना धृतराष्ट्र रवाच हतेषु सर्वसैन्येषु पाण्डुपुत्रै रणाजिरे । मम सैन्यावशिष्टास्ते किमकुर्वत संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब पाण्डुके पुत्रोंने समरांगणमें समस्त सेनाओंका संहार कर डाला, तब मेरी सेनाके शेष वीरोंने क्या किया?
dhṛtarāṣṭra uvāca | hateṣu sarvasainyeṣu pāṇḍuputraiḥ raṇājire | mama sainyāvaśiṣṭās te kim akurvata sañjaya ||
قال دْهريتاراشترا: «يا سنجيا، حينما قتل أبناء باندو جموع الجيوش كلها في ساحة القتال، فماذا صنع أولئك المحاربون من جيشي الذين بقوا أحياء آنذاك؟»
संजय उवाच