Yudhiṣṭhira’s Lament and Kṛṣṇa’s Rudra-Cosmogony Explanation (सौप्तिक पर्व, अध्याय १७)
विह्तितान्ना: प्रजास्तास्तु जग्मु: सृष्टा यथागतम् | ततो ववृधिरे राजन् प्रीतिमत्य: स्वयोनिषु,जिनकी सृष्टि हुई थी, उनके लिये जब भोजनकी व्यवस्था कर दी गयी, तब वे प्रजावर्गके लोग जैसे आये थे, वैसे लौट गये। राजन्! तदनन्तर सारी प्रजा अपनी ही योनियोंमें प्रसन्नतापूर्वक रहती हुई उत्तरोत्तर बढ़ने लगी
vihitānnāḥ prajāstāstu jagmuḥ sṛṣṭā yathāgatam | tato vavṛdhire rājan prītimatyaḥ svayoniṣu ||
قال فَيْشَمْبَايَنَة: لمّا رُتِّبَ القوتُ لتلك الكائنات التي خُلِقَت، انصرفوا راجعين كما أتوا. ثم، أيها الملك، أخذت الخليقةُ كلُّها—راضيةً في أجناسها وأرحامها—تزدهر وتتكاثر على توالٍ.
वैशम्पायन उवाच