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Shloka 34

पुनर्द्यूत-समाह्वानम्

Renewed Summons to the Dice-Game and Exile Wager

दुशासन उवाच रजस्वला वा भव याज्ञसेनि एकाम्बरा वाप्यथवा विवस्त्रा । द्यूते जिता चासि कृतासि दासी दासीषु वासश्न॒ यथोपजोषम्‌,दुःशासन बोला--द्रौपदी! तू रजस्वला, एकवस्त्रा अथवा नंगी ही क्‍यों न हो, हमने तुझे जूएमें जीता है; अतः तू हमारी दासी हो चुकी है, इसलिये अब तुझे हमारी इच्छाके अनुसार दासियोंमें रहना पड़ेगा

قال دُحشاسَنَة: «يا ياجناسيني! سواء كنتِ في أيام حيضك، أو عليكِ ثوبٌ واحد، أو كنتِ عارية—فقد غُلِبتِ في لعبة النرد. لذا فقد صرتِ أَمَةً؛ فلتقيمي بين الإماء على ما أشتهي.»

दुशासन उवाच