इस प्रकार श्रीमह्या भारत सभापव॑के अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासन नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मतत् तव वाचमतीयते “हंस! तुम्हारी अन्तरात्मा रागादि दोषोंसे दूषित है, तुम्हारा यह अण्डभक्षणरूप अपवित्र कर्म तुम्हारी इस धर्मोपदेशमयी वाणीके सर्वथा विरुद्ध है”
«يا بجعة! إن باطنك قد تلوّث بالراغا وسائر العيوب؛ وإن فعلَك الدنسَ، أكلَ البيض، يناقض تمامًا كلامك الذي تتخذه موعظةً في الدharma.»
वैशम्पायन उवाच