Adhyāya 8: Saṃprahāra-varṇana and Bhīma–Kṣemadhūrti Dvipa-Yuddha
Combat Description and Elephant Duel
दिव: प्रपतनं भानोरुव्यामिव महाद्युते: | संशोषणमिवाचिन्त्यं समुद्रस्याक्षयाम्भस:,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! कर्णका मारा जाना अद्भुत और अविश्वसनीय-सा लग रहा था। वह भयंकर कर्म उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला था, जैसे मेरु पर्वतवका अपने स्थानसे हटकर अन्यत्र चला जाना। परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन परशुरामजीके चित्तमें मोह उत्पन्न होना जैसे सम्भव नहीं है, जैसे भयंकर कर्म करनेवाले देवराज इन्द्रका अपने शत्रुओंसे पराजित होना असम्भव है, जैसे महातेजस्वी सूर्यके आकाशसे पृथ्वीपर गिरने और अक्षय जलवाले समुद्रके सूख जानेकी बात मनमें सोचीतक नहीं जा सकती; पृथ्वी, आकाश, दिशा और जलका सर्वनाश होना एवं पाप तथा पुण्य-- दोनों प्रकारके कर्मोका निष्फल हो जाना जैसे आश्वर्यजनक घटना है; उसी प्रकार समरमें कर्ण-वधरूपी असम्भव कर्मको भी सम्भव हुआ सुनकर और उसपर बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करके राजा धृतराष्ट्र यह सोचने लगे कि “अब यह कौरवदल बच नहीं सकता। कर्णकी ही भाँति अन्य प्राणियोंका भी विनाश हो सकता है।” यह सब सोचते ही उनके हृदयमें शोककी आग प्रज्वलित हो उठी और वे उससे तपने एवं दग्ध-से होने लगे। उनके सारे अंग शिथिल हो गये। महाराज! वे अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र दीनभावसे लंबी साँस खींचने और अत्यन्त दुःखी हो “हाय! हाय!” कहकर विलाप करने लगे
divaḥ prapatanaṃ bhānor urvyām iva mahādyuteḥ | saṃśoṣaṇam ivācintyaṃ samudrasyākṣayāmbhasaḥ ||
قال فَيْشَمْبايَنَة: «أيها الملك، إن هذا الحدث يشبه المستحيلات: كأن الشمس المتألقة تهوي من السماء إلى الأرض، وكأن المحيط الذي يُظَنّ أن مياهه لا تنفد يجفّ جفافًا لا يُتصوَّر». وبقوته الأخلاقية وسياقه الملحمي، يصوّر البيتُ مقتلَ كَرْنَة انقلابًا يهزّ العالم، ويُشدِّد الإحساس بأن نظام الحرب الأخلاقي قد بلغ منعطفًا حاسمًا لا رجعة فيه.
वैशम्पायन उवाच
The verse uses cosmic impossibilities (the Sun falling, the ocean drying) to convey how utterly shocking and order-shaking certain outcomes can be; it underscores the Mahābhārata theme that in war even what seems ‘fixed’ can be overturned, prompting reflection on impermanence and the limits of human expectation.
Vaiśaṃpāyana is describing the news of Karṇa’s fall as something almost unimaginable, comparing it to impossible natural catastrophes; the similes heighten Dhṛtarāṣṭra’s sense that the Kaurava cause is collapsing beyond recovery.