Aśvatthāman’s Arrow-Screen and the Confrontation with Yudhiṣṭhira (द्रौणि–युधिष्ठिर-संग्रामः)
यथा ब्रद्वाद्विषो नित्यं गच्छन्तीह पराभवम् । यथैव संगतं कृत्वा नर: पतति मद्रकै:,'ओ बिच्छू! जैसे मद्रनिवासियोंके पास रखी हुई धरोहर और गान्धारनिवासियोंमें शौचाचार नष्ट हो जाते हैं, जहाँ क्षत्रिय पुरोहित हो उस यजमानके यज्ञमें दिया हुआ हविष्य जैसे नष्ट हो जाता है, जैसे शूद्रोंका संस्कार करानेवाला ब्राह्मण पराभवको प्राप्त होता है, जैसे ब्रह्मद्रोही मनुष्य इस जगत्में सदा ही तिरस्कृत होते रहते हैं, जैसे मद्रनिवासियोंके साथ मित्रता करके मनुष्य पतित हो जाता है तथा जिस प्रकार मद्रनिवासीमें सौहार्दकी भावना सर्वथा नष्ट हो गयी है, उसी प्रकार तेरा यह विष भी नष्ट हो गया। मैंने अथर्ववेदके मन्त्रसे तेरे विषको शान्त कर दिया”
yathā bradvādviṣo nityaṁ gacchantīha parābhavam | yathaiva saṅgataṁ kṛtvā naraḥ patati madrakaiḥ ||
قال كارنا: «يا أيها العقرب! كما أن بعض المؤثرات المعادية والمفسدة تفضي حتمًا في هذا العالم إلى الهلاك، كذلك يسقط المرء عن السلوك القويم بمخالطة المادرا. وكما يُقال إن الوديعة والطهارة تهلكان عند المادرا والغاندارا، وإن القربان في الذبيحة يفسد إذا أُقيمت الشعائر على غير ترتيبها، وإن البرهمي الذي يجري الطقوس لمن لا يستحقها يلقى العار، وإن من يخون المعرفة المقدسة يُقابَل بالازدراء الدائم في العالم—فكذلك، يا عقرب، قد أُبطل مفعول سُمّك. وبمانترا من الأتهرفافيدا هدّأتُ سمّك.»
कर्ण उवाच
The verse uses a chain of moral-ritual analogies to assert that bad association and improper conduct lead to downfall and social censure, while disciplined sacred speech (mantra) is portrayed as capable of counteracting harm (here, poison).
Karna addresses a scorpion and declares that its venom has been neutralized. He supports this claim with proverbial comparisons about disgrace arising from corrupt company and ritual impropriety, concluding that he has calmed the poison through an Atharvavedic mantra.