Droṇa-parva Adhyāya 96: Sātyaki’s Line-Penetration, Encirclement, and Advance toward Arjuna
सारथि: प्रवर: कृष्ण: शीघ्राश्नास्य हयोत्तमा: । अल्पं च विवरं कृत्वा तूर्ण याति धनंजय:,त्वरन्नेकरथेनैव समेत्य द्रोणमब्रवीत् । संजय कहते हैं--राजन्! तदनन्तर जब कुन्तीकुमार अर्जुन सिन्धुराज जयद्रथका वध करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्य और कृतवर्माका दुस्तर सेना-व्यूह भेदन करके आपकी सेनामें प्रविष्ट हो गये और सव्यसाची अर्जुनके हाथसे जब काम्बोजराजकुमार सुदक्षिण तथा पराक्रमी श्रुतायुध मार दिये गये तथा जब सारी सेनाएँ नष्ट-भ्रष्ट होकर चारों ओर भाग खड़ी हुईं, उस समय अपनी सम्पूर्ण सेनामें भगदड़ मची देख आपका पुत्र दुर्योधन बड़ी उतावलीके साथ एकमात्र रथके द्वारा द्रोणाचार्यके पास गया और उनसे मिलकर इस प्रकार बोला--
sārathiḥ pravaraḥ kṛṣṇaḥ śīghrāśnāsya hayottamāḥ | alpaṁ ca vivaraṁ kṛtvā tūṛṇaṁ yāti dhanañjayaḥ, tvarann ekarathenaiva sametya droṇam abravīt ||
قال سنجيا: «أيها الملك، إن كريشنا—أعظم السائقين—قاد الخيول الممتازة بقبضةٍ سريعة. ودهننجايا (أرجونا)، بعد أن أحدث فتحةً يسيرة في صفوف العدو، اندفع إلى الأمام مسرعًا؛ وفي عَجَلةٍ شديدة جاء دوريوذانا وحده بعربةٍ واحدة إلى درونا وخاطبه.»
संजय उवाच