द्रोणपर्व अध्याय ६७ — अर्जुनस्य प्रवेशः, श्रुतायुध-वधः, सुदक्षिण-वधः
Arjuna’s advance; deaths of Śrutāyudha and Sudakṣiṇa
अल्पं दत्तं मयाद्येति निष्ककोटिं सहस्रश: । एकाह्वा दास्यति पुन: को<न्यस्तत् सम्प्रदास्यति,राजा रन्तिदेव एक दिनमें सहस्रों कोटि निष्क दान करके भी यह खेद प्रकट किया करते थे कि आज मैंने बहुत कम दान किया; ऐसा सोचकर वे पुनः दान देते थे। भला दूसरा कौन इतना दान दे सकता है?
ومع أنّ الملك رَنتيديفا كان يتصدّق في يومٍ واحدٍ بآلاف الكُوطيّات من النِّشْكَات، كان يُظهر أسفًا قائلاً: «لقد أعطيتُ اليوم قليلًا جدًّا». ثم، إذ يفكّر هكذا، يعود فيعطي من جديد. فمن ذا غيره يستطيع أن يجود بمثل هذا الجود؟
नारद उवाच