Mahabharata Adhyaya 174
Drona ParvaAdhyaya 17446 Versesकौरव-पक्ष की ओर झुकता हुआ: द्रोण-कर्ण के क्रुद्ध आक्रमण से पाण्डव-पक्ष में पलायन-सा, पर भीम के हस्तक्षेप से संतुलन लौटने की कोशिश

Adhyaya 174

Chapter Arc: जयद्रथ-वध से क्षुब्ध दुर्योधन, वाक्य-चातुर्य और उपालम्भ का शस्त्र लेकर, विजयी वीरों में श्रेष्ठ कर्ण और आचार्य द्रोण के पास सहसा पहुँचता है—और युद्ध की दिशा को शब्दों से मोड़ने का प्रयत्न करता है। → दुर्योधन कहता है कि सव्यसाची अर्जुन ने सैन्धव को रण में मार गिराया, और उसी बीच पाण्डव-सेना उसकी विशाल वाहिनी को रौंद रही है; वह आरोप करता है कि द्रोण और कर्ण जैसे बलवान, कृतास्त्र, जयश्री-सम्पन्न योद्धा ‘उपेक्षित’ बैठे हैं, मानो शक्ति होते हुए भी अशक्त हों। यह कटु वाणी दोनों को अमर्ष से भर देती है और वे क्रुद्ध होकर संग्राम को और उग्र कर देते हैं। → द्रोण के प्रचण्ड प्रहार से पाञ्चालों में हाहाकार उठता है—पहले रणभूमि क्षणभर को निःशब्द-सी लगती है, फिर क्रुद्ध योद्धाओं के टकराव से सहसा महान् कोलाहल फूट पड़ता है; पाञ्चालों की चीख-पुकार और आर्तनाद (द्रोण की मार से) रात के युद्ध को संकुल, अराजक और रक्तरंजित शिखर पर पहुँचा देता है। → पाण्डव-पक्ष की पंक्तियाँ डगमगाती हैं; सेना का पलायन-सा होने लगता है, पर भीमसेन रण-धर्म का स्मरण कराकर और अपने पराक्रम से सैनिकों को लौटाता/स्थिर करता है, जिससे पूर्ण भगदड़ रुकती है और मोर्चा फिर से जमने लगता है। → रात्रि-युद्ध की घनी अराजकता में, द्रोण-कर्ण की क्रुद्ध गति और भीम की प्रतिरोध-धुरी के बीच अगला क्षण किसके पक्ष में टूटेगा—यह अनिश्चितता अध्याय के अंत में युद्ध को अधर में छोड़ देती है।

Shlokas

Verse 1

अपन का बछ। ] अतकहऑफा<ज द्विसप्तत्याधेकशततमो< ध्याय: दुर्योधनके उपालम्भसे द्रोणाचार्य और कर्णका घोर युद्ध

قال سانجيا: «يا سيّدَ الناس، لما رأى ابنُك (دوريودھانا) قوّاته تفرّ مذعورةً وتُذبح على أيدي محاربين عظام النفوس، استولى عليه غضبٌ عارم.»

Verse 2

अभ्येत्य सहसा कर्ण द्रोणं च जयतां वरम्‌ । अमर्षवशमापतन्नो वाक्यज्ञो वाक्यमब्रवीत्‌

قال سنجيا: إنّ دوريودhana، الماهر في فنّ الخطاب، مضى فجأةً إلى كارنا وإلى درونا—وهما أرفعُ المنتصرين من بين المحاربين. وقد غلبته الحميّةُ والغيظ، فخاطبهما بكلماتٍ وُلِدت من كبرياءٍ مجروح، يريد أن يلهب عزائم قادته وسط وطأة الحرب الأخلاقية.

Verse 3

भवदभ्यामिह संग्राम: क्रुद्धा भ्यां सम्प्रवर्तितः । आहवे निहतं दृष्टवा सैन्धवं सव्यसाचिना

قال سنجيا: «إنّ هذه المعركة هنا إنما أُطلقت بيديكما أنتما الاثنين في ثورة الغضب. إذ لما رأيتما جايادراثا ملك السِّندهو صريعًا في الوغى بسهم أرجونا، سَڤياساچي—الرامي الذي يُحسن بكلتا يديه—تماديتما، وأنتم في سَورةٍ، في القتال حتى الليل.»

Verse 4

निहन्यमानां पाण्डूनां बलेन मम वाहिनीम्‌ | भूत्वा तद्विजये शक्तावशक्ताविव पश्यत:

قال سنجيا: «ولكن في هذه الساعة تُقطَع جموعي العظيمة بسطوة أبناء باندو. وأنتم تنظرون كأنكم عاجزون، مع أنكم قادرون على إحراز الظفر. إنّ تقاعسكم الآن يجعل القوة تبدو ضعفًا، وجيشُنا يُفنى أمام أعينكم.»

Verse 5

यद्य॒हं भवतोस्त्याज्यो न वाच्यो5स्मि तदैव हि । आवां पाण्डुसुतान्‌ संख्ये जेष्याव इति मानदौ

قال سنجيا: «يا من تُكرمان الناس! إن كنتما حقًّا ترَيان أن من الصواب أن تُقصياني، فما كان ينبغي لكما منذ ذلك الحين أن تقولا لي: “سنغلب أبناء باندو في ساحة القتال.” فمثل هذه الكلمات تُلزم المرء بالمسؤولية؛ وإنّ نبذَ إنسانٍ بعد الأخذ بمشورته مما يُلام عليه في ميزان الدَّرما.»

Verse 6

तदैवाहं वच: श्रुत्वा भवद्धयामनुसम्मतम्‌ | नाकरिष्यमिदं पार्थवैरं योधविनाशनम्‌,“उसी समय आपलोगोंकी सम्मति सुनकर मैं कुन्तीपुत्रोंके साथ यह वैर नहीं करता, जो सम्पूर्ण योद्धाओंके लिये विनाशकारी हो रहा है

قال سنجيا: «وفي تلك اللحظة بعينها، لما سمعتُ الرأي الذي أقررتماه، عزمتُ ألا أُمعن في هذه العداوة مع أبناء پِرِثا (كونتي)—عداوةٍ ثبت أنها تُهلك جميع المحاربين.»

Verse 7

यदि नाहं परित्याज्यो भवद्धयां पुरुषर्षभौ | युध्यतामनुरूपेण विक्रमेण सुविक्रमौ,“अत्यन्त पराक्रमी पुरुषप्रवर वीरो! यदि आप मुझे त्याग देना न चाहते हों तो अपने अनुरूप पराक्रम प्रकट करते हुए युद्ध कीजिये'

قال سنجيا: «يا خيرَ الرجال، يا أبطالَ الشجاعةِ التي لا تُجارى! إن كنتم لا تريدون أن تهجروني، فقاتِلوا—وأظهروا بأسًا يليق بكم، ببسالتكم اللائقة المشرقة.»

Verse 8

वाक्प्रतोदेन तौ वीरौ प्रणुन्नौ तनयेन ते । प्रावर्तयेतां संग्रामं घट्टिताविव पन्नगौ

قال سنجيا: وقد سِيقَ البطلان بسوطِ الكلام—ولُدِغا بسخريةِ ابنِك—فاشتعلَا غضبًا كأفعوين دُوستا بالأقدام، وأعادا تحريكَ أهوالِ القتال من جديد.

Verse 9

ततस्तौ रथिनां श्रेष्ठी सर्वलोक धनुर्धरी । शैनेयप्रमुखान्‌ पार्थानभिदुद्रुवतू रणे

قال سنجيا: ثم إنّ هذين الاثنين—وهما أبرعُ فرسانِ العجلات الحربية، المشهوران في العالم كلّه بسداد الرمي، دروناآچاريا وكرْنا—اندفعا من جديد إلى ساحة الوغى، يغيران مباشرةً على عظماء مقاتلي الباندافا بقيادة شاينيَيا (ساتياكي).

Verse 10

तथैव सहिता: पार्था: सर्वसैन्येन संवृता: । अभ्यवर्तन्त तौ वीरौ नर्दमानौ मुहुर्मुहु:

قال سنجيا: وعلى النحو نفسه تقدّم أبناءُ بريثا (الباندافا)، مصطفّين في نظامٍ محكمٍ ومحجوبين بجيشهم كلّه، لملاقاةِ هذين البطلين اللذين كانا يزأران مرارًا وتكرارًا.

Verse 11

अथ द्रोणो महेष्वासो दशभि: शिनिपुड्भवम्‌ | अविध्यत्‌ त्वरितं क्रुद्ध: सर्वशस्त्रभूृतां वर:

قال سنجيا: ثم إنّ درونا، الرامي العظيم—وهو أسبقُ حملةِ السلاح جميعًا—وقد استبدّ به الغضب وأقدم بعزمٍ سريع، طعن ساتياكي، سليلَ شيني، بعشرِ سهام.

Verse 12

कर्णश्न॒ दशभिर्बाणै: पुत्रश्न तव सप्तभि: । दशभिर्वषसेनश्व॒ सौबलश्लापि सप्तभि:

قال سنجيا: أُصيب كَرْنَةُ بعشرِ سهام، وأُصيب ابنُك بسبعة. وكذلك ثُقِبَ فْرِشَسِينَا بعشرة، وأُصيب السَّوْبَالِيّ بسبعة. وهكذا تُقاسُ ضراوةُ المعركة بعددِ النِّصال؛ ففي الحرب يُحصى البأسُ والقدرُ معًا بالجراح لا بالكلام.

Verse 13

दृष्टवा च समरे द्रोणं निघ्नन्तं पाण्डवीं चमूम्‌

قال سنجيا: إذ رأيتُ دْرُونَةَ في ساحة القتال يضرب جيشَ الباندڤا ويُسقطه، انكشف زخمُ الحرب الكالح—فإتقانُ السلاح قد يطغى على الجموع، ويشتدُّ الثقلُ الأخلاقي للعنف حين يغدو المعلّمُ الموقَّر أداةً لدمارٍ واسع النطاق.

Verse 14

विव्यधु: सोमकास्तूर्ण समन्ताच्छरवृष्टिभि: । समरांगणमें द्रोणाचार्यको पाण्डव-सेनाका संहार करते देख सोमकोंने चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा करके उन्हें तुरंत घायल कर दिया ।।

قال سنجيا: إن السُّوماكَةَ عاجلوا الهجوم من كل جانب بوابلٍ من السهام. وهناك كان دْرُونَةُ يسلب أرواحَ الكشاتريا، يا سيّدَ الناس—صورةٌ لاندفاع الحرب الكالح، حيث تتحوّل البسالةُ والواجبُ في ساحة القتال إلى ذبحٍ لا يهدأ.

Verse 15

द्रोणेन वध्यमानानां पञ्चालानां विशाम्पते

قال سنجيا: «يا سيّدَ الناس، حين كان البانچالا يُقطَعون بسيف دْرُونَة…»

Verse 16

पुत्रानन्ये पितृनन्ये भ्रातृनन्ये च मातुलान्‌,कोई पुत्रोंकी, कोई पिताओंको, कोई भाइयोंको, कोई मामा, भानजों, मित्रों, सम्बन्धियों तथा बन्धु-बान्धवोंको छोड़-छोड़कर अपनी जान बचानेके लिये तुरंत ही भाग चले

قال سنجيا: في ذلك الهلع ترك بعضُهم أبناءَه، وترك آخرون آباءَهم؛ وخلّف قومٌ إخوتَهم، بل حتى أخوالَهم وراءهم. وقد طرحوا جانبًا أبناءَ الإخوة، والأصدقاء، وذوي القربى، وكلَّ من يَشدّهم إليه رباطٌ قريب، وفرّوا من فورهم—لا يحركهم إلا دافعٌ واحد: نجاةُ النفس. ويكشف المشهد كيف يستطيع الخوفُ في الحرب أن يُحطّم واجبَ الأسرة وروابطَ المجتمع، فلا يبقى للإنسان إلا غريزةُ البقاء.

Verse 17

भागिनेयान्‌ वयस्यांश्व॒ तथा सम्बन्धिबान्धवान्‌ | उत्सृज्योत्सृज्य गच्छन्ति त्वरिता जीवितेप्सव:

قال سانجيا: إنهم كانوا يطرحون مرارًا أبناءَ الأخوات والرفاق، بل حتى ذوي القربى والأهل، ثم يفرّون مسرعين مدفوعين برغبة حفظ حياتهم. ففي رعب المعركة تُهجر عُرى المودّة وواجبات الذمّة حين يطغى طلب النجاة على الكفّ والوفاء.

Verse 18

अपरे मोहिता मोहात्‌ तमेवाभिमुखा ययु: । पाण्डवानां रणे योधा: परलोकं गता: परे,कुछ पाण्डव-सैनिक रणभूमिमें मोहित होकर मोहवश पुनः द्रोणाचार्यके ही सामने चले गये और मारे गये। बहुत-से सैनिक परलोक सिधार गये

قال سانجيا: وآخرون أضلّهم الاضطراب، فعادوا يواجهون دروناآچاريا نفسه. وفي المعركة اندفع كثير من مقاتلي الباندافا في تلك الحيرة، فقُتلوا ومضوا إلى العالم الآخر—مُبيّنين كيف أن فقدان صفاء الذهن وحسن التقدير في الحرب يغدو سريعًا سبب الهلاك.

Verse 19

सा तथा पाण्डवी सेना पीड्यमाना महात्मना । निशि सम्प्राद्रवद्‌ राजन्नुत्सूज्योल्का: सहस्रश:

قال سانجيا: وهكذا، أيها الملك، إن جيش الباندافا وقد ضُيِّق عليه من ذلك المحارب العظيم النفس، فرّ في الليل، وهو يلقي وراءه آلاف المشاعل المتقدة. وأمام أعين بهيماسينا وأرجونا وشري كريشنا وناكولا وسهاديفا ودارماراجا يودهيشتيرا ودهريشتاديومنا، انكسر الجيش وتفرّق، مبيّنًا كيف يمكن للخوف والاضطراب أن يغلبا حتى قضيةً عادلة إذا واجهت قوةً طاغية.

Verse 20

पश्यतो भीमसेनस्य विजयस्याच्युतस्य च । यमयोर्धर्मपुत्रस्य पार्षतस्य च पश्यत:

قال سانجيا: وبينما كان بهيماسينا ينظر، وكان أرجونا الظافر على الدوام، وكريشنا (أچيوتا)، والتوأمان ناكولا وسهاديفا، ودارمابوترا يودهيشتيرا، ودهريشتاديومنا ابن بريشاتا، يشاهدون كذلك—إذا بجيش الباندافا، وقد أُنهك وعُذِّب على يد دروناآچاريا العظيم النفس، يفرّ طوال الليل وهو يلقي آلاف المشاعل. ويُبرز المشهد أن الحرب قد تدفع حتى الجيش ذي القضية العادلة إلى الفوضى أمام تفوّق الحيلة والقوة، فيما يبقى قادته شهودًا على معاناة صفوفهم.

Verse 21

तमसा संवृते लोके न प्राज्ञायत किंचन । कौरवाणां प्रकाशेन दृश्यन्ते विद्रुता: परे

قال سانجيا: لما غشّى الظلامُ العالمَ لم يعد يُدرَك شيءٌ على وجه اليقين. ولم يُرَ بعضُ الفارّين من الآخرين إلا بنورٍ كان يسطع في معسكر الكورافا. ويُبرز المشهد كيف أن الخوفَ والاضطرابَ في الحرب قد يحجبان حسنَ التمييز، وكيف أن ميزةً يسيرة—وهنا هي الرؤية—قد تحسم الحركةَ والمعنوياتِ والبقاء.

Verse 22

द्रवमाणं तु तत्‌ सैन्यं द्रोणकर्णो महारथौ । जघ्नतु: पृष्ठतो राजन्‌ किरन्तौ सायकान्‌ बहून्‌,राजन! महारथी द्रोणाचार्य और कर्ण बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए उस भागती हुई पाण्डव-सेनाको पीछेसे मार रहे थे

قال سنجيا: أيها الملك، لما كان ذلك الجيش يفرّ في فوضى واضطراب، ضربه من الخلف الفارسان العظيمان على العربة—درونا وكرنا—وأمطراه بوابل لا يُحصى من السهام.

Verse 23

पज्चालेषु प्रभग्नेषु क्षीयमाणेषु सर्वतः । जनार्दनो दीनमना: प्रत्यभाषत फाल्गुनम्‌,जब पांचाल योद्धा सब ओरसे नष्ट होने और भागने लगे, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने दीनचित्त होकर अर्जुनसे इस प्रकार कहा--

قال سنجيا: لما كان محاربو البانچالا يُحطَّمون ويتناقصون من كل جانب، خاطب جناردانا (كريشنا) فالغونا (أرجونا) وقلبه مثقل بالشفقة والقلق.

Verse 24

द्रोणकर्णों महेष्वासावेतौ पार्षतसात्यकी । पज्चालांश्चैव सहितौ जघ्नतु: सायकैर्भृशम्‌

قال سنجيا: إن درونا وكرنا—وهما من أعظم الرماة—قد اجتمعا فضربا دريشتاديومنَ (ابن بريشاتا) وساتياكي ومحاربي البانچالا، فأثخنوهم جراحًا بوابلٍ عاصف من السهام.

Verse 25

एतयो: शरवर्षेण प्रभग्ना नो महारथा: । वार्यमाणापि कौन्तेय पृतना नावतिष्ठते,'पार्थ! इन दोनोंकी बाण-वर्षासे हमारे महारथियोंके पाँव उखड़ गये हैं। हमारी सेना रोकनेपर भी रुक नहीं रही है”

قال سنجيا: «يا ابن كونتي، تحت وابل سهام هذين الاثنين اضطرب فرساننا العظام على العجلات وانكسر عزمهم. ومع أنهم يُحاوَل كفُّهم، فإن الجيش لا يثبت في موضعه.»

Verse 26

तां तु विद्रवर्ती दृष्टवा ऊचतुः केशवार्जुनौ । मा विद्रवत वित्रस्ता भयं त्यजत पाण्डवा:,अपनी सेनाको भागती देख श्रीकृष्ण और अर्जुनने उससे कहा--'पाण्डव वीरो! भयभीत होकर भागो मत। भय छोड़ो

قال سنجيا: لما رأى كيشافا وأرجونا جموعهم في فرار، خاطباهم قائلين: «يا أبطال الباندافا، لا تهربوا مذعورين. اطرحوا الخوف عن قلوبكم!»

Verse 27

तावावां सर्वसैन्यैश्न व्यूहै: सम्यगुदायुधै: । द्रोणं च सूतपुत्र॑ं च प्रयताव: प्रबाधितुम्‌

قال سنجيا: «إنّا نحن الاثنان، بعد أن صففنا جموع الجيش كلَّه في تشكيلات قتال محكمة (فيوها) وتسلّحنا تمامًا، نجتهد في كبح دروناآتشاريّا وكَرْنَة ابن السائق، ودفعهما إلى التراجع.»

Verse 28

एतौ हि बलिनौ शूरौ कृतास्त्रौ जितकाशिनौ । उपेक्षितौ तव बलैनाशयेतां निशामिमाम्‌

قال سنجيا: «هذان الاثنان—درونا وكَرْنَة—قويّان شجاعان، قد اكتمل لهما علم السلاح، متلألئان ببهاء الظفر. إن أهملتهما فسيُفنيان جيشك كلَّه في هذه الليلة ذاتها!»

Verse 29

तयो: संवदतोरेवं भीमकर्मा महाबल: । आयाद्‌ू वृकोदर: शीघ्र पुनरावर्त्य वाहिनीम्‌

قال سنجيا: «وبينما كان الاثنان يتحدثان على هذا النحو مع جنودهما، أقبل بهيما (فريكودارا)، عظيم القوة رهيب الأفعال، وقد أعاد فرقته على عجل، فوصل إلى هناك ثانيةً سريعًا.»

Verse 30

वृकोदरमथायान्तं दृष्टवा तत्र जनार्दन: । पुनरेवाब्रवीद्‌ राजन हर्षयन्निव पाण्डवम्‌,राजन्‌! भीमसेनको वहाँ आते देख भगवान्‌ श्रीकृष्ण पाण्डुपुत्र अर्जुनका हर्ष बढ़ाते हुए-से पुनः इस प्रकार बोले--

قال سنجيا: «فلما رأى جناردانا (شري كريشنا) فريكودارا (بهيما) مقبلًا إلى هناك، عاد فتكلّم، أيها الملك، كأنه يتعمّد أن يُفرِح الباندڤا (أرجونا) ويشدّ عزيمته.»

Verse 31

एष भीमो रणश्लाघी वृतः सोमकपाण्डवै: । अभ्यवर्तत वेगेन द्रोणकर्णों महारथौ,'ये युद्धकी स्पृहा रखनेवाले भीमसेन सोमक और पाण्डवयोद्धाओंसे घिरकर महारथी ट्रोण और कर्णका सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आ रहे हैं

قال سنجيا: «انظروا إلى بهيما، المتفاخر بساحات القتال، وقد أحاط به السومَكَة ومحاربو الباندڤا. إنه يندفع بسرعة عظيمة ليواجه المها‌رَثِيَّين، درونا وكَرْنَة.»

Verse 32

एतेन सहितो युद्धय पज्चालैश्व महारथै: । आश्रचासनार्थ सैन्यानां सर्वेषां पाण्डुनन्दन,'पाण्डुनन्दन! इनके और पांचाल महारथियोंके साथ रहकर तुम अपनी सारी सेनाओंको सान्त्वना देनेके लिये यहाँ युद्ध करो”

قال سانجيا: «يا ابنَ باندو، اثبُتْ معه ومع عِظامِ مُقاتلي العربات من البانشالا، وقاتِلْ هنا، لكي تُطمَئِنَ جموعَ جيشك كلَّها وتُثبِّتَ قلوبَهم.»

Verse 33

ततस्तौ पुरुषव्याप्रावुभी माधवपाण्डवौ | द्रोणकर्णो समासाद्य धिष्ठितौ रणमूर्धनि,तदनन्तर वे दोनों पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन युद्धके मुहानेपर द्रोणाचार्य और कर्णके सामने जाकर खड़े हो गये

قال سانجيا: ثم إن ذينك السَّيِّدَين من خِيار الرجال—مادهافا (شري كريشنا) والباندَفي (أرجونا)—تقدّما لملاقاة درونا وكرنا، وثبتا في مقدّمة ساحة القتال.

Verse 34

संजय उवाच ततस्तत्‌ पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत्‌ | ततो द्रोणश्व कर्णश्व॒ परान्‌ ममृदतुर्युधि

قال سانجيا: «أيها الملك، عندئذٍ عاد جيش يودهيشثيرا العظيم بعد أن ارتدّ مرةً أخرى، ورجع إلى المعمعة. ثم إن درونا وكرنا، في خِضَمّ القتال، شرعا يسحقان مقاتلي العدو.»

Verse 35

स सम्प्रहारस्तुमुलो निशि प्रत्यभवन्महान्‌ । यथा सागरयो राजंश्नन्द्रोदयविवृद्धयो:

قال سانجيا: «أيها الملك، لقد غدا ذلك الاصطدام في الليل عظيمًا هائجًا. وبدا شديد الفظاعة—كبحرين عظيمين ينتفخان عند طلوع القمر—هكذا اندفعت المعركة بين الجيشين وهدرت.»

Verse 36

तत उत्सृज्य पाणिशभ्यां प्रदीपांस्तव वाहिनी । युयुधे पाण्डवै: सार्धमुन्मत्तवदसंकुला,तदनन्तर आपकी सेना अपने हाथोंसे मशालें फेंककर उन्मत्तके समान असंकुलभावसे पाण्डव-सैनिकोंके साथ युद्ध करने लगी

قال سانجيا: «ثم إن جيشك، بعدما ألقى المشاعل من أيديهم، قاتل مع جنود الباندافا—مندفعين كالممسوسين، بلا تردّد ولا انتظام في الصفوف.»

Verse 37

रजसा तमसा चैव संवृते भृशदारुणे । केवल नामगोत्रेण प्रायुध्यन्त जयैषिण:,धूल और अंधकारसे छाये हुए उस अत्यन्त भयंकर संग्राममें विजयाभिलाषी योद्धा केवल नाम और गोत्रका परिचय पाकर युद्ध करते थे

قال سنجيا: في تلك المعركة المروِّعة غايةَ الرهبة، وقد غشّاها الغبارُ والظلام، كان المحاربون المتعطّشون للنصر يقتتلون، لا يعرف بعضُهم بعضًا إلا بإعلان الاسم والنَّسَب فحسب.

Verse 38

अश्रूयन्त हि नामानि श्राव्यमाणानि पार्थिव: । प्रहरद्धिर्महाराज स्वयंवर इवाहवे,महाराज! स्वयंवरकी भाँति उस युद्धसस्‍्थलमें भी प्रहार करनेवाले नरेशोंद्वारा सुनाये जाते हुए नाम श्रवणगोचर हो रहे थे

قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، لقد كانت أسماءُ الملوك تُسمَع حقًّا—يُجهر بها على ألسنة من يهوون بضرباتهم في ساحة القتال—حتى بدا مشهدُ الحرب كأنه سْوَيَمْفَرا (svayaṃvara)، حيث يعلن الأبطالُ عن أنفسهم وهم يتبارزون.»

Verse 39

नि:ःशब्दमासीत्‌ सहसा पुन: शब्दों महानभूत्‌ । क्रुद्धानां युध्यमानानां जीयतां जयतामपि

قال سنجيا: فجأةً يسود صمتٌ تام، ثم لا يلبث أن ينهض من جديد دويٌّ عظيم. وبين محاربين يقاتلون في غضب—قومٌ يُغلَبون وآخرون يَغلِبون—كان الصخب ينقطع بغتةً ثم يعود فيندفع مرةً أخرى.

Verse 40

यत्र यत्र सम दृश्यने प्रदीपा: कुरुसत्तम । तत्र तत्र सम शूरास्ते निपतन्ति पतज्भवत्‌,कुरुश्रेष्ठी जहाँ-जहाँ मशालें दिखायी देती थीं, वहाँ-वहाँ शूरवीर सैनिक पतंगोंकी तरह टूट पड़ते थे

قال سنجيا: «يا خيرَ الكورو، حيثما شوهدت المشاعلُ تتلألأ على السواء، هناك وهناك اندفع أولئك الأبطالُ، على قدرٍ واحد من الجرأة، إلى المعمعة كالفراش ينجذب إلى اللهب.»

Verse 41

तथा संयुध्यमानानां विगाढासीन्महानिशा । पाण्डवानां च राजेन्द्र कौरवाणां च सर्वश:,राजेन्द्र! इस प्रकार युद्धमें लगे हुए पाण्डवों और कौरवोंकी वह महारात्रि सर्वथा प्रगाढ़ हो चली

قال سنجيا: وبينما كانوا يواصلون القتال، أيها الملك، اشتدّت تلك الليلة العظمى حتى غدت حالكةً تمامًا، فأحاطت بالباندافا والكاورافا من كل جانب.

Verse 123

एते कौरव संक्रन्दे शैनेयं पर्यवाकिरन्‌ । फिर कर्णने दस, आपके पुत्रने सात, वृषसेनने दस और शकुनिने भी सात बाण मारे। कुरुराज! इन वीरोंने युद्धमें शिनिपौत्र सात्यकिपर चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

قال سانجيا: في ذلك القتال المضطرب، أمطر أولئك المحاربون من الكوروڤا على شَيْنَيَة (ساتيَكي) من كل جانب وابلًا من السهام—فأصابه كارنا بعشر، وابنُ الملك بسبع، وفْرِشَسينا بعشر، وشكوني أيضًا بسبع. وهكذا، يا سيد الكورو، شرعوا يضيّقون عليه في خضمّ المعمعة بمطرٍ من المقاذيف.

Verse 143

रश्मिभिर्भास्करो राजंस्तमांसीव समन्तत: । प्रजापालक नरेश! जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा चारों ओरके अन्धकारको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य वहाँ क्षत्रियोंके प्राण लेने लगे

قال سانجيا: «أيها الملك، يا حامي الرعية! كما أن الشمس بأشعتها تطرد الظلمات من كل جانب، كذلك كان دروناآتشاريّا هناك يشرع في سلب أرواح الكشاتريا».

Verse 156

शुश्रुवे तुमुल: शब्द: क्रोशतामितरेतरम्‌ । प्रजानाथ! द्रोणाचार्यकी मार खाकर परस्पर चीखते-चिल्लाते हुए पांचालोंका घोर आर्तनाद सुनायी देने लगा

قال سانجيا: سُمِعَ دويٌّ هائلٌ مضطرب، إذ كان الرجال يصرخ بعضهم في وجه بعض. يا سيد الرعية! وبعد أن نالهم ضربُ دروناآتشاريّا، أخذ عويلُ البانچالا المروّع—صياحًا وصراخًا في فزعٍ متبادل—يدوّي في الأرجاء.

Verse 171

इस प्रकार श्रीमह्माभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

قال سانجيا: وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «درونا پرفا»—وخاصة في قسم «مقتل غهاطوتكاتشا»—وفي سياق واقعة القتال ليلًا، اختُتم الفصل الحادي والسبعون بعد المئة، المتعلق باضطراب القتال المتشابك وضيق المعمعة.

Verse 172

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे द्विसप्तत्यधिकशततमो<थध्याय:

قال سانجيا: وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «درونا پرفا»، في قسم «مقتل غهاطوتكاتشا»، أثناء القتال ليلًا وفي المعركة المتشابكة المضطربة الكثيفة، اختُتم الفصل الثاني والسبعون بعد المئة.

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