दुर्योधनस्य कर्णप्रार्थना — कृपकर्णसंवादः
Duryodhana’s Appeal to Karna — The Kripa–Karna Dialogue
ऑपन--माजल छा अफ-जआकऋा-ज एकत्रिशर्दाधेकशततमो< ध्याय: भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय संजय उवाच वर्तमाने महाराज संग्रामे लोमहर्षणे । व्याकुलेषु च सर्वेषु पीड्यमानेषु सर्वश:,संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठ महाराज! इस प्रकार रोमांचकारी संग्राम छिड़ जानेपर जब सारी सेनाएँ सब ओरसे पीड़ित और व्याकुल हो गयीं तब राधानन्दन कर्ण युद्धके लिये पुनः भीमसेनके सामने आया। ठीक उसी तरह, जैसे वनमें एक मतवाला हाथी दूसरे मदोन्मत्त हाथीपर आक्रमण करता है इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कर्णकी पराजयविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १३१ ॥। अपन काल छा | अप्-#-रू+ द्वात्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: भीमसेन और कर्णका घोर युद्ध धृतराष्ट्र रवाच स्वयं शिष्यो महेशस्य भृगूत्तम धनुर्धर: । शिष्यत्वं प्राप्तवान् कर्णस्तस्य तुल्यो<स्त्रविद्यया
sañjaya uvāca | vartamāne mahārāja saṅgrāme lomaharṣaṇe | vyākuleṣu ca sarveṣu pīḍyamāneṣu sarvaśaḥ |
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، لما اشتعلت تلك المعركة المروِّعة، وحين اضطربت الجيوش كلها وأُنهِكت من كل جانب، ازداد القتال ضراوةً—ممهِّدًا لعودة كارنا ليتقدّم مرةً أخرى لمواجهة بهيماسينا. وتُبرز الأبيات مناخ الحرب الأخلاقي: ما إن تُطلَقَ العُنفُ حتى يهتزّ الأقوياء جميعًا، ويغدو ميدان القتال دوّامةً من الخوف والضغط والهجوم الذي لا ينقطع.»
संजय उवाच
The verse highlights the ethical reality of war: once combat escalates, it produces widespread distress and pressure on all sides, showing how collective suffering and confusion become the natural climate of violence.
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that the battle is in full force and terrifying; all troops are shaken and oppressed from every direction, setting the immediate context for the ensuing duel-focused events of the chapter.