द्रोणपर्व (अध्याय ११२) — कर्णभीमयोर्युद्धम्, दुर्योधनस्य रक्षणादेशः
Droṇa-parva 112: Karṇa–Bhīma Engagement and Duryodhana’s Protective Order
अस्मदर्थ च राजेन्द्र संनहोद् यदि केशव: । रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्मयुम्नो वा महारथ:,'राजेन्द्र! महाराज! यदि युद्धके श्रेष्ठ मुहानेपर हमारी सहायताके लिये भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम, अनिरुद्ध, महारथी प्रद्युम्न, गद, सारण अथवा वृष्णिवंशियोंसहित साम्ब कवच धारण करके तैयार होंगे, तो भी मैं पुरुषसिंह सत्यपराक्रमी शिनिपौत्र सात्यकिको अवश्य ही अपनी सहायताके कार्यमें नियुक्त करूँगा; क्योंकि मेरी दृष्टिमें दूसरा कोई सात्यकिके समान नहीं है”
asmadarthaṃ ca rājendra sannaddho yadi keśavaḥ | rāmo vāpy aniruddho vā pradyumno vā mahārathaḥ ||
قال يودهيشثيرا: «يا ملكَ الملوك! حتى لو وقف كيشافا (كريشنا) نفسه مُتسلّحًا مستعدًّا للقتال نصرةً لنا—أو بالاراما، أو أنيرودها، أو براديومنَة فارسَ العجلة العظيم—فمع ذلك، ولأمر معاونتي، سأُعيّن يقينًا ساتياكي: أسدَ الرجال، البطلَ المُجرَّب، حفيدَ شيني؛ إذ لا أرى، في تقديري، من يساويه.»
युधिष्ठिर उवाच