Shloka 1

२)। अन्त:करणकी शुद्धिसे ही विचार, भाव, श्रद्धादि गुण और क्रियाएँ शुद्ध होंगी। अतएव इस प्रसंगमें आहारका विवेचन करके यह भाव दिखलाया गया है कि सात्त्विक, राजस और तामस आहारोंमें जो आहार जिसको प्रिय होता है, वह उसी गुणवाला होता है। इसी भावसे शलोकमें “प्रिय” शब्द देकर विशेष लक्ष्य कराया गया है। अतः आहारकी दृष्टिसे भी उसकी पहचान हो सकती है। यही बात यज्ञ, दान और तपके विषयमें भी समझ लेनी चाहिये। ३. दूध, चीनी आदि रसयुक्त पदार्थोंको 'रस्याः” कहते हैं। २. मक्खन, घी तथा सात्त्विक पदार्थोंसे निकाले हुए तैल आदि स्नेहयुक्त पदार्थोंको “स्निग्धा:” कहते हैं। 3. जिन पदार्थोंका सार बहुत कालतक शरीरमें स्थिर रह सकता है, ऐसे ओज उत्पन्न करनेवाले पदार्थोंको 'स्थिरा:' कहते हैं। ४. जो गंदे और अपवित्र नहीं हैं तथा देखते ही मनमें साच्चिक रुचि उत्पन्न करनेवाले हैं, ऐसे पदार्थोको /ह॒द्या:" कहते हैं। ५. भक्ष्य, भोज्य, लेह्मु और चोष्य--इन चार प्रकारके खानेयोग्य पदार्थोकी “आहार” कहते हैं। ६. (१) आयुका अर्थ है उम्र या जीवन। जीवनकी अवधिका बढ़ जाना आयुका बढ़ना है। (२) सत्त्वका अर्थ है बुद्धि। बुद्धिका निर्मल, तीक्ष्ण एवं यथार्थ तथा सूक्ष्मदर्शिनी होना ही सत्त्वका बढ़ना है। (३) बलका अर्थ है सत्कार्यमें सफलता दिलानेवाली मानसिक और शारीरिक शक्ति। इस आन्तर एवं बाह्मशक्तिका बढ़ना ही बलका बढ़ना है। (४) मानसिक और शारीरिक रोगोंका नष्ट होना ही आरोग्यका बढ़ना है। (५) हृदयमें संतोष, सात्त्विक प्रसन्नता और पुष्टिका होना तथा मुखादि शरीरके अंगोंपर शुद्धभावजनित आनन्दके चिह्नोंका प्रकट होना सुख है; इनकी वृद्धि सुखका बढ़ना है। (६) चित्तवृत्तिका प्रेमभावसम्पन्न हो जाना और शरीरमें प्रीतिकर चिह्लोंका प्रकट होना ही प्रीतिका बढ़ना है। उपर्युक्त आयु, बुद्धि और बल आदिको बढ़ानेवाले जो दूध, घी, शाक, फल, चीनी, गेहूँ, जौ, चना, मूँग और चावल आदि सात्तविक आहार हैं, उन सबको समझानेके लिये आहारका यह लक्षण किया गया है। ७. नीम, करेला आदि पदार्थ कड़वे हैं, इमली आदि खट्टे हैं, क्षार तथा विविध भाँतिके नमक नमकीन हैं, बहुत गरम-गरम वस्तुएँ अति उष्ण हैं, लाल मिर्च आदि तीखे हैं, भाड़में भूँजे हुए अन्नादि रूखे हैं और राई आदि पदार्थ दाहकारक हैं। उपर्युक्त पदार्थोको खानेके समय गले आदिमें तकलीफका होना, जीभ, तालू आदिका जलना, दाँतोंका आम जाना, चबानेमें दिक्कत होना, आँखों और नाकोंमें पानी आ जाना, हिचकी आना आदि जो वष्ट होते हैं, उन्हें 'दुःख” कहते हैं। खानेके बाद जो पश्चात्ताप होता है, उसे “चिन्ता” कहते हैं और खानेसे जो बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'रोग” कहते हैं। इन कड़वे, खट्टे आदि पदार्थोंके खानेसे ये दु:ख, चिन्ता और रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिये इन्हें “दुःख, चिन्ता और रोगोंको उत्पन्न करनेवाले” कहा है। अतएव इनका त्याग करना उचित है। ८. 'यातयाम” अर्थात्‌ अधपका उन फलों अथवा उन खाद्य पदार्थोंको समझना चाहिये, जो पूरी तरहसे पके न हों अथवा जिनके सिद्ध होनेमें (सीझनेमें) कमी रह गयी हो। इसी श्लोकमें *पर्युषितम” यानी बासी अन्नको तामस बतलाया गया है। “यातयामम्‌” का अर्थ एक प्रहर पहलेका बना भोजन मान लेनेसे “बासी' भोजनको तामस बतलानेकी कोई सार्थकता नहीं रह जाती; यह सोचकर यहाँ “यातयामम” का अर्थ “अधपका' किया गया है। ९. अग्नि आदिके संयोगसे, हवासे अथवा मौसिम बीत जाने आदिके कारणोंसे जिन रसयुक्त पदार्थोंका रस सूख गया हो (जैसे संतरे, ऊख आदिका रस सूख जाया करता है), उनको “गतरस'” कहते हैं। १०. खानेकी जो वस्तुएँ स्वभावसे ही दुर्गन्धयुक्त हों (जैसे प्याज, लहसुन आदि) अथवा जिनमें किसी क्रियासे दुर्गन्‍्ध उत्पन्न कर दी गयी हो, उन वस्तुओंको “पूति” कहते हैं। ३३. पहले दिनके बनाये हुए भोजनको “पर्युषित” या बासी कहते हैं। उन फलोंको भी बासी समझना चाहिये, जिनमें पेड़से तोड़े बहुत समय बीत जानेके कारण विकार उत्पन्न हो गया हो। ३२. अपने या दूसरेके भोजन कर लेनेपर बची हुई जूठी चीजोंको 'उच्छषिष्ट” कहते हैं। ३१३. मांस, अण्डे आदि हिंसामय और शराब-ताड़ी आदि निषिद्ध मादक वस्तुएँ, जो स्वभावसे ही अपवित्र हैं अथवा जिनमें किसी प्रकारके संगदोषसे, किसी अपवित्र वस्तु, स्थान, पात्र या व्यक्तिके संयोगसे या अन्याय और अधर्मसे उपार्जित असत्‌ धनके द्वारा प्राप्त होनेके कारण अपवित्रता आ गयी हो, उन सब वस्तुओंको “अमेध्य” कहते हैं। ऐसे पदार्थ देव-पूजनमें भी निषिद्ध माने गये हैं। इनके सिवा गाँजा, भाँग, अफीम, तम्बाकू, सिगरेट-बीड़ी, अर्क, आसव और अपवित्र दवाइयाँ आदि तमोगुण उत्पन्न करनेवाली जितनी भी खान-पानकी वस्तुएँ हैं--सभी अपवित्र हैं। $. यज्ञ करनेवाले जो पुरुष उस यज्ञसे स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा, विजय या स्वर्ग आदिकी प्राप्ति एवं किसी प्रकारके अनिष्टकी निवृत्तिरूप इस लोक या परलोकके किसी प्रकारके सुखभोग या दुःख-निवृत्तिकी जरा भी इच्छा नहीं करते, उनका वाचक 'अफलाकाडुक्षिभि:” पद है (गीता ६।१) २. देवता आदिके उद्देश्यसे घृतादिके द्वारा अग्निमें हवन करना या अन्य किसी प्रकारसे किसी भी वस्तुका समर्पण करके किसीकी यथायोग्य पूजा करना “यज्ञ" कहलाता है। 3. अपने-अपने वर्णाश्रमके अनुसार जिस यज्ञका जिसके लिये शास्त्रोंमें विधान है, उसको अवश्य करना चाहिये; ऐसे शास्त्रविहित कर्तव्यरूप यज्ञका न करना भगवान्‌के आदेशका उल्लंघन करना है--इस प्रकार यज्ञ करनेके लिये मनमें दृढ़ निश्चय करके निष्कामभावसे जो यज्ञ किया जाता है, वही यज्ञ सात््विक होता है। ४. जो यज्ञ किसी फलप्राप्तिके उद्देश्यसे किया गया है, वह शास्त्रविहित और श्रद्धापूर्वक किया हुआ होनेपर भी राजस है, एवं जो दम्भपूर्वक किया जाता है, वह भी राजस है; फिर जिसमें ये दोनों दोष हों, उसके 'राजस' होनेमें तो कहना ही कया है? ५. जो यज्ञ शास्त्रविहित न हो या जिसके सम्पादनमें शास्त्रविधिकी कमी हो अथवा जो शास्त्रोक्त विधानकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे किया गया हो, उसे “विधिहीन” कहते हैं। ६. जो यज्ञ शास्त्रोक्त मन्त्रोंसे रहित हो, जिसमें मन्त्रप्रयोग हुए ही न हों या विधिवत्‌ न हुए हों अथवा अवहेलनासे त्रुटि रह गयी हो--उस यज्ञको “मन्त्रहीन' कहते हैं। ७. ब्रह्मा, महादेव, सूर्य, चन्द्रमा, दुर्गा, अग्नि, वरुण, यम, इन्द्र आदि जितने भी शास्त्रोक्त देवता हैं-- शास्त्रोंमें जिनके पूजनका विधान है, उन सबका वाचक यहाँ “देव” शब्द है। 'द्विज' शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--इन तीनों वर्णोका वाचक होनेपर भी यहाँ केवल ब्राह्मणोंहीके लिये प्रयुक्त है; क्योंकि शास्त्रानुसार ब्राह्मण ही सबके पूज्य हैं। “गुरु” शब्द यहाँ माता, पिता, आचार्य, वृद्ध एवं अपनेसे जो वर्ण, आश्रम और आयु आदिमें किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबका वाचक है तथा “प्राज्ञ" शब्द यहाँ परमेश्वरके स्वरूपको भलीभाँति जाननेवाले महात्मा ज्ञानी पुरुषोंका वाचक है। इन सबका यथायोग्य आदर-सत्कार करना; इनको नमस्कार करना; दण्डवत्‌-प्रणाम करना; इनके चरण धोना; इन्हें चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पण करना; इनकी यथायोग्य सेवा आदि करना और इन्हें सुख पहुँचानेकी उचित चेष्टा करना आदि इनका पूजन करना है। <. यहाँ पवित्रता” केवल शारीरिक शौचका वाचक है; क्योंकि वाणीकी शुद्धिका वर्णन अगले पंद्रहवें श्लोकमें और मनकी शुद्धिका वर्णन सोलहवें श्लोकमें अलग किया गया है। जल-मृतिकादिके द्वारा शरीरको स्वच्छ और पवित्र रखना एवं शरीरसम्बन्धी समस्त चेष्टाओंका उत्तम होना ही शरीरकी पवित्रता है (गीता १६।३) १. यहाँ शरीरकी अकड़ और ऐंठ आदि वक्रताके त्यागका नाम 'सरलता' है। २. यहाँ “ब्रह्मचर्य” शब्द शरीरसम्बन्धी सब प्रकारके मैथुनोंके त्याग और भलीभाँति वीर्य धारण करनेका बोधक है। 3. शरीरद्वारा किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कभी जरा भी कष्ट न पहुँचानेका नाम ही यहाँ “अहिंसा' है। ४. उपर्युक्त क्रियाओंमें शरीरकी प्रधानता है अर्थात्‌ इनसे शरीरका विशेष सम्बन्ध है और ये इन्द्रियोंके सहित शरीरको उसके समस्त दोषोंका नाश करके पवित्र बना देनेवाली हैं, इसलिये इन सबको “शरीरसम्बन्धी तप” कहते हैं। ५. जो वचन किसीके भी मनमें जरा भी उद्धेग उत्पन्न करनेवाले न हों तथा निन्दा या चुगली आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हों, उन्हें “अनुद्वेगकर” कहते हैं। जैसा देखा, सुना और अनुभव किया हो, ठीक वैसा- का-वैसा ही भाव दूसरेको समझानेके लिये जो यथार्थ वचन बोले जायूँ, उनको “सत्य” कहते हैं। जो सुननेवालेको प्रिय लगते हों तथा कटुता, रूखापन, तीखापन, ताना और अपमानके भाव आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हों--ऐसे प्रेमयुक्त, मीठे, सरल और शान्त वचनोंको “प्रिय” कहते हैं; तथा जिनसे परिणाममें सबका हित होता हो; जो हिंसा, द्वेष, डाह, वैरसे सर्वथा शून्य हों और प्रेम, दया तथा मंगलसे भरे हों, उनको 'हित” कहते हैं। जिस वाक्यमें उपर्युक्त सभी गुणोंका समावेश हो एवं जो शास्त्रवर्णित वाणीसम्बन्धी सब प्रकारके दोषोंसे रहित हो, उसी वाक्यके उच्चारणको “वाचिक तप” माना जा सकता है। ६. विषाद-भय, चिन्ता-शोक, व्याकुलता-उद्विग्नता आदि दोषोंसे रहित होकर सात्त्विक प्रसन्नता, हर्ष और बोधशक्तिसे युक्त हो जाना ही “मनका प्रसाद' है। ७. रूक्षता, डाह, हिंसा, प्रतिहिंसा, क्रूरता, निर्दयता आदि तापकारक दोषोंसे सर्वथा शून्य होकर मनका सदा-सर्वदा शान्त और शीतल बने रहना ही “सौम्यत्व' है। ८. मनका निरन्तर भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व, स्वरूप, लीला और नाम आदिके चिन्तनमें या ब्रह्मविचारमें लगे रहना ही “मौन” है। ९, अन्त:करणकी चंचलता सर्वथा नाश होकर उसका स्थिर तथा अच्छी प्रकार अपने वशमें हो जाना ही “आत्मविनिग्रह' है। १०. अन्तःकरणमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, ईर्ष्या-वैर, घृणा-तिरस्कार, असूया- असहिष्णुता, प्रमाद, व्यर्थ विचार, इष्टविरोध और अनिष्टचिन्तन आदि दुर्भावोंका सर्वथा नष्ट हो जाना और इनके विरोधी दया, क्षमा, प्रेम, विनय आदि समस्त सद्भावोंका सदा विकसित रहना “भावसंशुद्धि' है। १३१. जो मनुष्य इस लोक या परलोकके किसी प्रकारके भी सुखभोग अथवा दुःखकी निवृत्तिरूप फलकी कभी किसी भी कारणसे किंचिन्मात्र भी कामना नहीं करता, उसे “अफलाकाडक्षी” कहते हैं और जिसके मन, बुद्धि और इन्द्रिय अनासक्त, निगृहीत तथा शुद्ध होनेके कारण कभी किसी भी प्रकारके भोगके सम्बन्धसे विचलित नहीं हो सकते, जिसमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो गया है, उसे “युक्त” कहते हैं। उपर्युक्त तीन प्रकारका तप जब ऐसे निष्काम पुरुषोंद्वारा किया जाता है, तभी वह पूर्ण सात््विक होता है। ३२, शास्त्रोंमें उपर्युक्त तपका जो कुछ भी महत्त्व, प्रभाव और स्वरूप बतलाया गया है, उसपर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर सम्मानपूर्वक पूर्ण विश्वास होना “परम श्रद्धा” है और ऐसी श्रद्धासे युक्त होकर बड़े-से-बड़े विघ्नों या कष्टोंकी कुछ भी परवा न करके सदा अविचलित रहते हुए अत्यन्त आदर और उत्साहपूर्वक उपर्युक्त तपका आचरण करते रहना ही उसे परम श्रद्धासे करना है। ३३. अभिप्राय यह है कि शरीर, वाणी और मनसम्बन्धी उपर्युक्त तप ही सात्त्विक हो सकते हैं। साथ ही यह भी दिखलाया है कि यद्यपि ये तप स्वरूपसे तो साच्त्विक हैं; परंतु वे पूर्ण सात््विक तब होते हैं, जब इस श्लोकमें बतलाये हुए भावसे किये जाते हैं। १. तपमें वस्तुत: आस्था न होनेपर भी लोगोंको धोखा देकर किसी प्रकारका स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये तपस्वीका-सा स्वाँग रचकर जो किसी लौकिक या शास्त्रीय तपका बाहरसे दिखाने भरके लिये आचरण किया जाता है, उसे दम्भसे तप करना कहते हैं। २. जिस फलकी प्राप्तिके लिये उसका अनुष्ठान किया जाता है, उसका प्राप्त होना या न होना निश्चित नहीं है; इसलिये उसे “अध्रुव” कहा है और जो कुछ फल मिलता है, वह भी सदा नहीं रहता, उसका निश्चय ही नाश हो जाता है; इसलिये उसे “चल” कहा है। 3. तपकी प्रसिद्धिसे जो इस प्रकार जगत्‌में बड़ाई होती है कि यह मनुष्य बड़ा भारी तपस्वी है, इसकी बराबरी कौन कर सकता है, यह बड़ा श्रेष्ठ है आदि--उसका नाम 'सत्कार' है। किसीको तपस्वी समझकर उसका स्वागत करना, उसके सामने खड़े हो जाना, प्रणाम करना, मानपत्र देना या अन्य किसी क्रियासे उसका आदर करना “मान' है, तथा उसकी आरती उतारना, पैर धोना, पत्र-पुष्पादि षोडशोपचारसे पूजा करना, उसकी आज्ञाका पालन करना--इन सबका नाम “पूजा” है। इन सबके लिये जो लौकिक या शास्त्रीय तपका आचरण किया जाता है, वही सत्कार, मान और पूजाके लिये तप करना है। इसके सिवा अन्य किसी स्वार्थकी सिद्धिके लिये किया जानेवाला तप भी राजस है। ४. तपके वास्तविक लक्षणोंको न समझकर जिस किसी भी क्रियाको तप मानकर उसे करनेका जो हठ या दुराग्रह है, उसे “मूढ्ग्राह” कहते हैं। ५. जिस तपका वर्णन इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकोंमें किया गया है, जो अशास्त्रीय, मनःकल्पित, घोर और स्वभावसे ही तामस है, जिसमें दम्भकी प्रेरणासे या अज्ञानसे पैरोंको पेड़की डालीमें बाँधकर सिर नीचा करके लटकना, लोहेके काँटोंपर बैठना तथा इसी प्रकारकी अन्यान्य घोर क्रियाएँ करके बुरी भावनासे अर्थात्‌ दूसरोंकी सम्पत्तिका हरण करने, उसका नाश करने, उनके वंशका उच्छेद करने अथवा उनका किसी प्रकार कुछ भी अनिष्ट करनेके लिये जो अपने मन, वाणी और शरीरको ताप पहुँचाना है--उसे “तामस तप” कहते हैं। ६. वर्ण, आश्रम, अवस्था और परिस्थितिके अनुसार शास्त्रविहित दान करना--अपने स्वत्वको यथाशक्ति दूसरोंके हितमें लगाना मनुष्यका परम कर्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो मनुष्यत्वसे गिरता है और भगवान्‌के कल्याणमय आदेशका अनादर करता है। अतः जो दान केवल इस कर्तव्य बुद्धिसे ही दिया जाता है, जिसमें इस लोक और परलोकके किसी भी फलकी जरा भी अपेक्षा नहीं होती--वही दान पूर्ण साच्विक है। ७. जिस देश और जिस कालमें जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, उस वस्तुके दानद्वारा सबको यथायोग्य सुख पहुँचानेके लिये वही योग्य देश और काल है। इसके अतिरिक्त कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, मथुरा, काशी, प्रयाग, नैमिषारण्य आदि तीर्थस्थान और ग्रहण, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रान्ति, एकादशी आदि पुण्यकाल --जो दानके लिये शास्त्रोंमें प्रशस्त माने गये हैं, वे भी योग्य देश-काल हैं। ८. जिसके पास जहाँ जिस समय जिस वस्तुका अभाव हो, वह वहीं और उसी समय उस वस्तुके दानका पात्र है। जैसे--भूखे, प्यासे, नंगे, दरिद्र, रोगी, आर्त, अनाथ और भयभीत प्राणी अन्न, जल, वस्त्र, निर्वाहयोग्य धन, औषध, आश्वासन, आश्रय और अभयदानके पात्र हैं। आर्त प्राणियोंकी पात्रतामें जाति, देश और कालका कोई बन्धन नहीं है। उनकी आतुरदशा ही पात्रताकी पहचान है। इनके सिवा जो श्रेष्ठ आचरणोंवाले विद्वान, ब्राह्मण, उत्तम ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तथा सेवाव्रती लोग हैं--जिनको जिस वस्तुका दान देना शास्त्रमें कर्तव्य बतलाया गया है--वे भी अपने-अपने अधिकारके अनुसार यथाशक्ति धन आदि सभी आवश्यक वस्तुओंके दानपात्र हैं। १. जिसका अपने ऊपर उपकार है, उसकी सेवा करना तथा यथासाध्य उसे सुख पहुँचानेका प्रयास करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है। उसे जो लोग दान समझते हैं, वे वस्तुत: उपकारीका तिरस्कार करते हैं और जो लोग उपकारीकी सेवा नहीं करना चाहते, वे तो कृतघ्नकी श्रेणीमें हैं; अतएव अपना उपकार करनेवालेकी तो सेवा करनी ही चाहिये। यहाँ अनुपकारीको दान देनेकी बात कहकर भगवान्‌ यह भाव दिखलाते हैं कि दान देनेवाला दानके पात्रसे बदलेमें किसी प्रकारके जरा भी उपकार पानेकी इच्छा न रखे। जिससे किसी भी प्रकारका अपना स्वार्थका सम्बन्ध मनमें नहीं है, उस मनुष्यको जो दान दिया जाता है--वही सात्त्विक है। इससे वस्तुतः दाताकी स्वार्थबुद्धिका ही निषेध किया गया है। २. किसीके धरना देने, हठ करने या भय दिखलाने अथवा प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पुरुषोंके कुछ दबाव डालनेपर बिना ही इच्छाके मनमें विषाद और दुःखका अनुभव करते हुए निरुपाय होकर जो दान दिया जाता है, वह क्लेशपूर्वक दान देना है। 3. जो मनुष्य बराबर अपने काममें आता है या आगे चलकर जिससे अपना कोई छोटा या बड़ा काम निकालनेकी सम्भावना या आशा है, ऐसे व्यक्ति या संस्थाओंको दान देना प्रत्युपकारके प्रयोजनसे दान देना है। ४. मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये या रोग आदिकी निवृत्तिके लिये जो किसी वस्तुका दान किसी व्यक्ति या संस्थाको दिया जाता है, वह फलके उद्देश्यसे दान देना है। ५. यथायोग्य अभिवादन, कुशल-प्रश्न, प्रियभाषण और आसन आदिद्दवारा सम्मान न करके जो रूखाईसे दान दिया जाता है, वह बिना सत्कारके दिया जानेवाला दान है। ६. पाँच बात सुनाकर, कड़वा बोलकर, धमकाकर, फिर न आनेकी कड़ी हिदायत देकर, दिल्लगी उड़ाकर अथवा अन्य किसी भी प्रकारसे वचन, शरीर या संकेतके द्वारा अपमानित करके जो दान दिया जाता है, वह तिरस्कारपूर्वक दिया जानेवाला दान है। ७. जिस देश-कालमें दान देना आवश्यक नहीं है अथवा जहाँ दान देना शास्त्रमें निषेध किया है, वे देश और काल दानके लिये अयोग्य हैं। ८. जिन मनुष्योंको दान देनेकी आवश्यकता नहीं है तथा जिनको दान देनेका शास्त्रमें निषेध है, वे धर्मध्वजी, पाखण्डी, कपटवेषधारी, हिंसा करनेवाले, दूसरोंकी निन्‍दा करनेवाले, दूसरोंकी जीविकाका छेदन करके अपने स्वार्थसाधनमें तत्पर, बनावटी विनय दिखानेवाले, मद्य-मांस आदि अभक्ष्य वस्तुओंको भक्षण करनेवाले, चोरी, व्यभिचार आदि नीच कर्म करनेवाले, ठग, जुआरी और नास्तिक आदि सभी दानके लिये अपात्र हैं। ९. जिस परमात्मासे समस्त कर्ता, कर्म और कर्म-विधिकी उत्पति हुई है, उस भगवान्‌के वाचक '३“', “तत्‌” और 'सत्‌'--ये तीनों नाम हैं; अत: इनके उच्चारण आदिसे उन सबके अंगवैगुण्यकी पूर्ति हो जाती है। अतएव प्रत्येक कामके आरम्भमें परमेश्वरके नामोंका उच्चारण करना परम आवश्यक है। $. यहाँ “ब्राह्मण” शब्द ब्राह्मण आदि समस्त प्रजाका, “वेद” चारों वेदोंका, यज्ञ" शब्द यज्ञ, तप, दान आदि समस्त शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका वाचक है। २. जिस परमेश्वरसे इन यज्ञादि कर्मोंकी उत्पत्ति हुई है, उसका नाम होनेके कारण ओंकारके उच्चारणसे समस्त कर्मोंका अंगवैगुण्य दूर हो जाता है तथा वे पवित्र और कल्याणप्रद हो जाते हैं। यह भगवानके नामकी अपार महिमा है। इसीलिये वेदोक्त मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक यज्ञादि कर्म करनेके अधिकारी दिद्वान्‌ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके यज्ञ, दान, तप आदि समस्त शास्त्रविहित शुभ कर्म सदा ओंकारके उच्चारणपूर्वक ही होते हैं। ३. जो विहित कर्म करनेवाले साधारण वेदवादी हैं, वे फलकी इच्छा या अहंता-ममताका त्याग नहीं करते; किंतु जो कल्याणकामी मनुष्य हैं, जिनको परमेश्वरकी प्राप्तिके सिवा अन्य किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है, वे समस्त कर्म अहंता, ममता, आसक्ति और फल-कामनाका सर्वथा त्याग करके केवल परमेश्वरके ही लिये उनके आज्ञानुसार किया करते हैं। ४. सद्भाव” (सत्यभाव) नित्य भावका अर्थात्‌ जिसका अस्तित्व सदा रहता है, उस अविनाशी तत्त्वका वाचक है और वही परमेश्वरका स्वरूप है। इसलिये उसे 'सत” नामसे कहा जाता है। ५. अन्तःकरणका जो शुद्ध और श्रेष्ठभाव है, उसका वाचक यहाँ 'साधुभाव” है। वह परमेश्वरकी प्राप्तिका हेतु है; इसलिये उसमें परमेश्वरके 'सत्‌” नामका प्रयोग किया जाता है अर्थात्‌ उसे 'सद्भाव” कहा जाता है। ६. जो शास्त्रविहित करनेयोग्य शुभ कर्म है, वह निष्कामभावसे किये जानेपर परमात्माकी प्राप्तिका हेतु है; इसलिये उसमें परमात्माके 'सत” नामका प्रयोग किया जाता है अर्थात्‌ उसे “सत्‌ कर्म” कहा जाता है। ७. यज्ञ, तप और दानसे यहाँ साच्चिक यज्ञ, तप और दानका निर्देश किया गया है तथा उनमें जो श्रद्धा और प्रेमपूर्वक आस्तिक बुद्धि है, जिसे निष्ठा भी कहते हैं, उसका वाचक यहाँ “स्थिति” शब्द है; ऐसी स्थिति परमेश्वरकी प्राप्तिमें हेतु है, इसलिये वह “सत्‌' है। ८. जो कोई भी कर्म केवल भगवानके आज्ञानुसार उन्हींके लिये किया जाता है, जिसमें कर्ताका जरा भी स्वार्थ नहीं रहता--ऐसा कर्म कतके अन्त:करणको शुद्ध बनाकर उसे परमेश्वरकी प्राप्ति करा देता है, इसलिये वह 'सत' है। ३. 'यत"” पदसे यहाँ निषिद्ध कर्मोंका समाहार नहीं है; क्योंकि निषिद्ध कर्मोके करनेमें श्रद्धाकी आवश्यकता नहीं है और उनका फल भी श्रद्धापर निर्भर नहीं है। उनको करते भी वे ही मनुष्य हैं, जिनकी शास्त्र, महापुरुष और ईश्वरमें पूर्ण श्रद्धा नहीं होती। जिनको विश्वास नहीं है, उनको भी पापकर्मोंका दुःखरूप फल अवश्य ही मिलता है। अतः यहाँ यज्ञ, दान और तपरूप शुभ क्रियाओंके साथ-साथ आया हुआ “यत्‌ कृतम्‌” पद उसी जातिकी क्रियाका वाचक है। २. हवन, दान और तप तथा अन्यान्य शुभ कर्म श्रद्धापूर्वक किये जानेपर ही अन्त:करणकी शुद्धिमें और इस लोक या परलोकके फल देनेमें समर्थ होते हैं। बिना श्रद्धाके किये हुए शुभ कर्म व्यर्थ हैं, इसीसे उनको 'असत्‌' और “वे इस लोक या परलोकमें कहीं भी लाभप्रद नहीं हैं'--ऐसा कहा है। द्विचत्वारिशो5् ध्याय: (श्रीमद्धगवद्गीतायामष्टादशो< ध्याय:) त्यागका, सांख्यसिद्धान्तका, फलसहित वर्ण-धर्मका, उपासनासतहित ज्ञाननिष्ठाका, भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगका एवं गीताके माहात्म्यका वर्णन सम्बन्ध--गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे गीताके उपदेशका आरम्भ हुआ। वहॉसे आरम्भ करके तीसवें *लीकतक भगवान्‌ने ज्ञानयोगका उपदेश दिया और प्रसंगवश क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी कर्तव्यताका प्रतिपादन करके उनतालीसवें *लोकसे लेकर अध्यायकी समाप्ति-पर्यन्त कर्मगोगका उपदेश दिया; उसके बाद तीसरे अध्यायसे सत्रहवें अध्यायतक कहीं ज्ञानयोगकी दृष्टिसे और कहीं कर्मयोगकी दृष्टिसे परमात्माकी प्राप्तिके बहुत-से साधन बतलाये। उन सबको युननेके अनन्तर अब अर्जुन इस अठारहवें अध्यायमें समस्त जअध्यायोंके उपदेशका सार जाननेके उद्देश्यसे भगवान्‌के सामने संन्यास यानी ज्ञानयोगका और त्याग यानी फलासक्तिके त्यागरूप कर्मयोगका तत्त्व थलीभॉति अलग- अलग जाननेकी इच्छा प्रकट करते हैं-- अजुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्‌ केशिनिषूदन,अर्जुन बोले--हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्‌! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्यागके तत्त्वको पृथक्‌-पृथक्‌ जानना चाहता हूँ

arjuna uvāca | saṃnyāsasya mahābāho tattvam icchāmi veditum | tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthak keśiniṣūdana ||

قال أرجونا: «يا ذا الذراعين العظيمين! يا هṛṣīkeśa، يا قاتل كِشين! أريد أن أعرف على وجه الجلاء حقيقة السَّنْياسا (saṃnyāsa: الزهد/الاعتزال) وحقيقة التَّياغا (tyāga: التخلّي)، مميِّزًا بينهما. وفي توتّر الميدان الأخلاقي في ساحة القتال، ألتمس بيانًا دقيقًا يفرّق بين ترك الفعل وترك التعلّق بثمرات الفعل، طلبًا لقاعدة عيشٍ تحفظ الدارما وتطهّر النيّة.»

अर्जुनःArjuna
अर्जुनः:
Karta
TypeNoun
Rootअर्जुन
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect (Paroksha-bhuta), Third, Singular, Parasmaipada
संन्यासस्यof renunciation (sannyāsa)
संन्यासस्य:
TypeNoun
Rootसंन्यास
FormMasculine, Genitive, Singular
महाबाहोO mighty-armed one
महाबाहो:
TypeNoun
Rootमहाबाहु
FormMasculine, Vocative, Singular
तत्त्वम्the true nature / principle
तत्त्वम्:
Karma
TypeNoun
Rootतत्त्व
FormNeuter, Accusative, Singular
इच्छामिI wish / desire
इच्छामि:
TypeVerb
Rootइष्
FormPresent, First, Singular, Parasmaipada
वेदितुम्to know
वेदितुम्:
TypeVerb
Rootविद्
FormInfinitive (Tumun)
त्यागस्यof relinquishment (tyāga)
त्यागस्य:
TypeNoun
Rootत्याग
FormMasculine, Genitive, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
हृषीकेशO Hrishikesha (Lord of the senses)
हृषीकेश:
TypeNoun
Rootहृषीकेश
FormMasculine, Vocative, Singular
पृथक्separately
पृथक्:
TypeIndeclinable
Rootपृथक्
केशिनिषूदनO slayer of Keshi
केशिनिषूदन:
TypeNoun
Rootकेशिनिषूदन
FormMasculine, Vocative, Singular

अजुन उवाच

A
Arjuna
K
Kṛṣṇa (Hṛṣīkeśa, Mahābāhu, Keśiniṣūdana)
K
Keśin

Educational Q&A

The verse frames the central inquiry of the final chapter: how to distinguish saṃnyāsa (renunciation) from tyāga (relinquishment). It sets up Kṛṣṇa’s clarification that spiritual freedom is not merely abandoning action, but abandoning egoistic ownership and craving for results—so that duty can be performed in purity and alignment with dharma.

On the eve of battle, after hearing many paths and syntheses across earlier chapters, Arjuna seeks a definitive summary. He asks Kṛṣṇa to separate and define two closely related ideals—renunciation and relinquishment—so he can act without confusion, guilt, or attachment, and understand what true spiritual discipline requires amid worldly responsibility.