
Abhimanyu’s Assault on Bhīṣma’s Screen; Banner-Felling and Reinforcements (सौभद्र-भीष्म-समरः)
Upa-parva: Bhīṣma-vadha-prastāva (War-day engagements under Bhīṣma’s command)
Saṃjaya reports that on a severe war-day, Bhīṣma advances into Pāṇḍava formations while protected by five elite allies (Durmukha, Kṛtavarmā, Kṛpa, Śalya, and Viviṃśati). Bhīṣma’s standard (notably the tāla emblem) is repeatedly visible as he executes high-velocity archery, severing heads and arms and unsettling mounts. Abhimanyu, enraged, charges Bhīṣma’s chariot and engages both Bhīṣma and his attendants, striking multiple opponents and demonstrating agility and precision. Bhīṣma counters with rapid volleys, damaging Abhimanyu’s standard and charioteer; allied Kaurava mahārathas add pressure, yet Abhimanyu retaliates by cutting down Bhīṣma’s banner—an important morale-sign—prompting acclaim among onlookers. Bhīṣma then intensifies with larger-scale weapon use, showering Abhimanyu with dense arrow-fall, leading Pāṇḍava reinforcements (including Virāṭa, Dhṛṣṭadyumna, Bhīma, Kekayas, and Sātyaki) to rush in. A parallel crisis unfolds: Śalya defeats the Matsya prince Uttara (including a spear-throw and follow-up), provoking Śaṅkha’s retaliatory advance; Bhīṣma moves to intercept, while Arjuna positions to protect Śaṅkha. The chapter closes with Bhīṣma’s continued battlefield dominance, widespread Pāṇḍava disarray, and the onset of evening withdrawal amid confusion and sustained arrow-fire.
Chapter Arc: Kurukshetra ke madhya, Arjuna ki jigyasa dharma ke sookshma bhed par tikti hai: manushya ki shraddha ka swaroop kya hai, aur vah kaise satya-karm ko asatya-abhiman se alag karti hai? → Shri Bhagavan shraddha ko teen gunon—sattva, rajas, tamas—ke anuroop batate hain; phir yagna, tapa aur aahara ke bhed kholte hue dikhate hain ki bahari kathorata aur shastr-viruddh acharan kaise dharma ka roop dharan karke adharma ban jata hai. → Tamas tapa ka nishedh: jo moorkhagrah se apne sharir ko peedakar ya doosron ko nasht karne ke uddeshya se kiya jaye, vah tapa ‘tamas’ hai—tyajya, ghor, aur vinashkari; yahin par dharma ka teekha nirnay hota hai ki kasht apne aap mein pavitrata nahi, niyat aur vidhi hi mool hai. → Sattvik yagna-tapa-daan ki pehchan ‘yastavyam eva’—kartavya-buddhi se, phal-tyag se—mein sthapit hoti hai; aur ‘sat’ shabd ko yagna, tapa, daan ki sthiti aur unke uddeshya-karm ka naam batakar, sadhana ko satya ke dhruv par baandh diya jata hai. → Arjuna ke man mein agla prashn ubharta hai: jo karm shraddha se kiye gaye par shastr-vidhi se rahit hon, unka gati-phal kya hota hai?
Verse 1
भीष्मपर्वमें चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ४० ॥। ऑपन--माजल बछ। अकाल २. अपने धर्मका पालन करनेके लिये कष्ट सहन करके जो अन्त:ः:करण और इन्द्रियोंको तपाना है, उसीका नाम यहाँ “तप: पद है। गीताके सतरहवें अध्यायमें जिस शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका निरूपण है--यहाँ “तपः:” पदसे उसका निर्देश नहीं है; क्योंकि उसमें अहिंसा, सत्य, शौच, स्वाध्याय और आर्जव आदि जिन लक्षणोंका तपके अंगरूपमें निरूपण हुआ है, यहाँ उनका अलग वर्णन किया गया है। ३. किसी भी प्राणीको कभी कहीं भी लोभ, मोह या क्रोधपूर्वक अधिक मात्रामें, मध्य मात्रामें या थोड़ा-सा भी किसी प्रकारका कष्ट स्वयं देना, दूसरेसे दिलवाना या कोई किसीको कष्ट देता हो तो उसका अनुमोदन करना--हर हालतमें हिंसा है। इस प्रकारकी हिंसाका किसी भी निमित्तसे मन, वाणी, शरीरद्वारा न करना--अर्थात् मनसे किसीका बुरा न चाहना, वाणीसे किसीको न तो गाली देना, न कठोर वचन कहना और न किसी प्रकारके हानिकारक वचन ही कहना तथा शरीरसे न किसीको मारना, न कष्ट पहुँचाना और न किसी प्रकारकी हानि ही पहुँचाना आदि--ये सभी अहिंसाके भेद हैं। २. केवल गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, मेरा इन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है--ऐसा मानकर अथवा मैं तो भगवान्के हाथकी कठपुतलीमात्र हूँ, भगवान् ही अपने इच्छानुसार मेरे मन, वाणी और शरीरसे सब कर्म करवा रहे हैं, मुझमें न तो अपने-आप कुछ करनेकी शक्ति है और न मैं कुछ करता ही हूँ--ऐसा मानकर कर्तृत्व-अभिमानका त्याग करना ही त्याग है या कर्तव्यकर्म करते हुए उनमें ममता, आसक्ति, फल और स्वार्थका सर्वथा त्याग करना भी त्याग है एवं आत्मोजन्नतिमें विरोधी वस्तु, भाव और क्रियामात्रके त्यागका नाम भी “त्याग” कहा जा सकता है। 3. दूसरेके दोष देखना या उन्हें लोगोंमें प्रकट करना अथवा किसीकी निनन््दा या चुगली करना पिशुनता है; इसके सर्वथा अभावका नाम “अपैशुन' है। ४. किसी भी प्राणीको दुःखी देखकर उसके दुःखको जिस किसी प्रकारसे किसी भी स्वार्थकी कल्पना किये बिना ही निवारण करनेका और सब प्रकारसे उसे सुखी बनानेका जो भाव है, उसे “दया” कहते हैं। दूसरोंको कष्ट नहीं पहुँचाना “अहिंसा' है और उनको सुख पहुँचानेका भाव “दया” है। यही अहिंसा और दयाका भेद है। ५. अन्त:करण, वाणी और व्यवहारमें जो कठोरताका सर्वथा अभाव होकर उनका अतिशय कोमल हो जाना है, उसीको '"मार्दव” कहते हैं। ६. हाथ-पैर आदिको हिलाना, तिनके तोड़ना, जमीन कुरेदना, बेमतलब बकते रहना, बेसिर-पैरकी बातें सोचना आदि हाथ-पैर, वाणी और मनकी व्यर्थ चेष्टाओंका नाम चपलता है। इसीको प्रमाद भी कहते हैं। इसके सर्वधा अभावको “अचापल' कहते हैं। ७. श्रेष्ठ पुरुषोंकी उस शक्तिविशेषका नाम तेज है, जिसके कारण उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृतिवाले मनुष्य भी प्राय: अन्यायाचरणसे रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कमोमें प्रवृत्त हो जाते हैं। ८. भारी-से-भारी आपत्ति, भय या दु:ख उपस्थित होनेपर भी विचलित न होना; काम, क्रोध, भय या लोभसे किसी प्रकार भी अपने धर्म और कर्तव्यसे विमुख न होना “बैर्य' है। ९. इस अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर इस श्लोकके पूर्वार्द्धतक ढाई श्लोकोंमें छब्बीस लक्षणोंके रूपमें उस दैवीसम्पदरूप सदगुण और सदाचारका ही वर्णन किया गया है। अत: ये सब लक्षण जिसमें स्वभावसे विद्यमान हों अथवा जिसने साधनद्वारा प्राप्त कर लिये हों, वही पुरुष दैवीसम्पदसे युक्त है। ३०. मान, बड़ाई, पूजा और प्रतिष्ठाके लिये, धनादिके लोभसे या किसीको ठगनेके अभिप्रायसे अपनेको धर्मात्मा, भगवद्धक्त, ज्ञानी या महात्मा प्रसिद्ध करना अथवा दिखाऊ धर्मपालनका, दानीपनका, भक्तिका, व्रत-उपवासादिका, योग-साधनका और जिस किसी भी रूपमें रहनेसे अपना काम सधता हो, उसीका ढोंग रचना “दम्भ' है। $. विद्या, धन, कुटुम्ब, जाति, अवस्था, बल और ऐश्वर्य आदिके सम्बन्धसे जो मनमें गर्व होता है--जिसके कारण मनुष्य दूसरोंको तुच्छ समझकर उनकी अवहेलना करता है, उसका नाम “घमण्ड' है। २. अपनेको श्रेष्ठ, बड़ा या पूज्य समझना, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और पूजा आदिकी इच्छा रखना एवं इन सबके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना 'अभिमान' है। ३. बुरी आदतके अथवा क्रोधी मनुष्योंके संगके कारण या किसीके द्वारा अपना तिरस्कार, अपकार या निन्दा किये जानेपर, मनके विरुद्ध कार्य होनेपर, किसीके द्वारा दुर्ववचन सुनकर या किसीका अन्याय देखकर--इत्यादि किसी भी कारणसे अन्तःकरणमें जो द्वेषयुक्त उत्तेजना हो जाती है--जिसके कारण मनुष्यके मनमें प्रतिहिंसाके भाव जाग्रत् हो उठते हैं, नेत्रोंमे लाली आ जाती है, होठ फड़कने लगते हैं, मुखकी आकृति भयानक हो जाती है, बुद्धि मारी जाती है और कर्तव्यका विवेक नहीं रह जाता--इत्यादि किसी प्रकारकी भी “उत्तेजित वृत्ति” का नाम “क्रोध” है। ४. कोमलताके अत्यन्त अभावका नाम कठोरता है। किसीको गाली देना, कटुवचन कहना, ताने मारना आदि वाणीकी कठोरता है, विनयका अभाव शरीरकी कठोरता है तथा क्षमा और दयाके विरुद्ध प्रतिहिंसा और क्रूरताके भावको मनकी कठोरता कहते हैं। ५. सत्य-असत्य और धर्म-अधर्म आदिको यथार्थ न समझना या उनके सम्बन्धमें विपरीत निश्चय कर लेना ही यहाँ 'अज्ञान' है। ६. इस श्लोकमें दुर्गुण और दुराचारोंके समुदायरूप आसुरीसम्पद् संक्षेपमें बतलायी गयी है। अत: ये सब या इनमेंसे कोई भी लक्षण जिसमें विद्यमान हो, उसे आसुरीसम्पदासे युक्त समझना चाहिये। ७. इसी अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर तीसरे श्लोकतक सात्त्विक गुण और आचरणोंके समुदायरूप जिस दैवी- सम्पदाका वर्णन किया गया है, वह मनुष्यको संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त करके सच्चिदानन्दघन परमेश्वरसे मिला देनेवाली है--ऐसा वेद, शास्त्र और महात्मा सभी मानते हैं। ८. 'सर्ग” सृष्टिको कहते हैं, भूतोंकी सृष्टिको भूतसर्ग कहते हैं। यहाँ “अस्मिन् लोके” से मनुष्यलोकका संकेत किया गया है तथा इस अध्यायमें मनुष्योंके लक्षण बतलाये गये हैं, इसी कारण यहाँ 'भूतसर्गा" पदका अर्थ “मनुष्यसमुदाय' किया गया है। ९. मनुष्योंके दो समुदायोंमेंसे जो सात्तविक है, वह तो दैवी प्रकृतिवाला है और जो रजोमिश्रित तमः:प्रधान है, वह आसुरी प्रकृतिवाला है। 'राक्षसी” और “मोहिनी' प्रकृतिवाले मनुष्योंको यहाँ आसुरी प्रकृतिवाले समुदायके अन्तर्गत ही समझना चाहिये। १०. जिस कर्मके आचरणसे इस लोक और परलोकमें मनुष्यका यथार्थ कल्याण होता है, वही कर्तव्य है। मनुष्यको उसीमें प्रवृत्त होना चाहिये और जिस कर्मके आचरणसे अकल्याण होता है, वह अकर्तव्य है, उससे निवृत्त होना चाहिये। भगवानने यहाँ यह भाव दिखलाया है कि आसुरस्वभाववाले मनुष्य इस कर्तव्य-अकर्तव्य-सम्बन्धी प्रवृत्ति और निवृत्तिको बिलकुल नहीं समझते; इसलिये जो कुछ उनके मनमें आता है, वही करने लगते हैं। ३. यहाँ आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंकी मनगढ़ंत कल्पनाका वर्णन किया गया है। वे लोग ऐसा मानते हैं कि न तो इस चराचर जगत्का भगवान् या कोई धर्माधर्म ही आधार है तथा न इस जगत्की कोई नित्य सत्ता है अर्थात् न तो जन्मसे पहले या मरनेके बाद किसी भी जीवका अस्तित्व है एवं न कोई इसका रचयिता, नियामक और शासक ईश्वर ही है। २. नास्तिक सिद्धान्तवाले मनुष्य आत्माकी सत्ता नहीं मानते, वे केवल देहवादी या भौतिकवादी ही होते हैं; इससे उनका स्वभाव भ्रष्ट हो जाता है, उनकी किसी भी सत्कार्यके करनेमें प्रवृत्ति नहीं होती। उनकी बुद्धि भी अत्यन्त मन्द होती है; वे जो कुछ निश्चय करते हैं, सब केवल भोग-सुखकी दृष्टिसे ही करते हैं। उनका मन निरन्तर सबका अहित करनेकी बात ही सोचा करता है, इससे वे अपना भी अहित ही करते हैं तथा मन, वाणी, शरीरसे चराचर जीवोंको डराने, दु:ख देने और उनका नाश करनेवाले बड़े-बड़े भयानक कर्म ही करते रहते हैं। 3. जिनके खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल, व्यवसाय-वाणिज्य, देन-लेन और बर्ताव-व्यवहार आदि शास्त्रविरुद्ध और भ्रष्ट होते हैं, वे भ्रष्ट आचरणोंवाले कहे जाते हैं। ४. आसुरस्वभाववाले मनुष्य मनमें उठनेवाली कल्पनाओंकी पूर्तिके लिये भाँति-भाँतिकी सैकड़ों आशाएँ लगाये रहते हैं। उनका मन कभी किसी विषयकी आशामें लटकता है, कभी किसीमें खिंचता है और कभी किसीमें अटकता है; इस प्रकार आशाओंके बन्धनसे वे कभी छूटते ही नहीं। इसीसे उनको सैकड़ों आशाओंकी फॉँसियोंसे बँधे हुए कहा गया है। ५. विषय-भोगोंके उद्देश्यसे जो काम-क्रोधका अवलम्बन करके अन्यायपूर्वक अर्थात् चोरी, ठगी, डाका, झूठ, कपट, छल, दम्भ, मार-पीट, कूटनीति, जूआ, धोखेबाजी, विष-प्रयोग, झूठे मुकद्दमे और भय-प्रदान आदि शास्त्रविरुद्ध उपायोंके द्वारा दूसरोंक धनादिको हरण करनेकी चेष्टा करना है--यही विषय-भोगोंके लिये अन्यायसे अर्थसंचय करनेका प्रयत्न करना है। ३. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि अहंकारके साथ ही वे मानमें भी चूर रहते हैं, इससे ऐसा समझते हैं कि 'संसारमें हमसे बड़ा और है ही कौन; हम जिसे चाहें; मार दें, बचा दें, जिसकी चाहें जड़ उखाड़ दें या रोप दें।” अतः बड़े गर्वके साथ कहते हैं--“अरे! हम सर्वथा स्वतन्त्र हैं, सब कुछ हमारे ही हाथोंमें तो है; हमारे सिवा दूसरा कौन एऐश्वर्यवान् है, सारे ऐश्वर्योंके स्वामी हमीं तो हैं। सारे ईश्वरोंके ईश्वर परम पुरुष भी तो हमीं हैं। सबको हमारी ही पूजा करनी चाहिये। हम केवल एऐश्वर्यके स्वामी ही नहीं, समस्त ऐश्वर्यका भोग भी करते हैं। हमने अपने जीवनमें कभी विफलताका अनुभव किया ही नहीं; हमने जहाँ हाथ डाला, वहीं सफलताने हमारा अनुगमन किया। हम सदा सफलजीवन हैं, परम सिद्ध हैं, भविष्यमें होनेवाली घटना हमें पहलेसे ही मालूम हो जाती है। हम सब कुछ जानते हैं, कोई बात हमसे छिपी नहीं है। इतना ही नहीं, हम बड़े बलवान हैं; हमारे मनोबल या शारीरिक बलका इतना प्रभाव है कि जो कोई उसका सहारा लेगा, वही उस बलसे जगत्पर विजय पा लेगा। इन्हीं सब कारणोंसे हम परम सुखी हैं; संसारके सारे सुख सदा हमारी सेवा करते हैं और करते रहेंगे।” २. अभिप्राय यह है कि ऐसे मनुष्य कामोपभोगके लिये भाँति-भाँतिके पाप करते हैं और उनका फल भोगनेके लिये उन्हें विष्ठा, मूत्र, रुधिर, पीब आदि गंदी वस्तुओंसे भरे दुःखदायक कुम्भीपाक, रौरवादि घोर नरकोंमें गिरना पड़ता है। 3. जो अपने ही मनसे अपने-आपको सब बातोंमें सर्वश्रेष्ठ, सम्मान्य, उच्च और पूज्य मानते हैं, वे “आत्मसम्भावित' हैं। ४. जो घमण्डके कारण किसीके साथ--यहाँतक कि पूजनीयोंके प्रति भी विनयका व्यवहार नहीं करते, वे 'स्तब्ध' हैं। ५. दूसरोंके दोष देखना, देखकर उनकी निन्दा करना, उनके गुणोंका खण्डन करना और गुणोंमें दोषारोपण करना एवं भगवान् और संत पुरुषोंमें भी दोष देखते रहना--इन सब दोषोंसे युक्त मनुष्यको “अभ्यसूयक' कहते हैं। ६. सभीके अंदर अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वर स्थित हैं। अत: किसीसे विरोध या द्वेष करना, किसीका अहित करना और किसीको दु:ख पहुँचाना अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित परमेश्वरसे ही द्वेष करना है। ७. सिंह, बाघ, सर्प, बिच्छू, सूअर, कुत्ते और कौए आदि जितने भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग हैं--ये सभी आसुरी योनियाँ हैं। $. मनुष्ययोनिमें जीवको भगवत्प्राप्तिका अधिकार है। इस अधिकारको प्राप्त होकर भी जो मनुष्य इस बातको भूलकर, दैव-स्वभावरूप भगवत्प्राप्तिके मार्कको छोड़कर आसुरस्वभावका अवलम्बन करते हैं, वे मनुष्य-शरीरका सुअवसर पाकर भी भगवानको नहीं पा सकते--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको न पानेकी बात कही है। २. स्त्री, पुत्र आदि समस्त भोगोंकी कामनाका नाम 'काम' है; इस कामनाके वशीभूत होकर ही मनुष्य चोरी, व्यभिचार और अभक्ष्य-भोजनादि नाना प्रकारके पाप करते हैं। मनके विपरीत होनेपर जो उत्तेजनामय वृत्ति उत्पन्न होती है, उसका नाम “क्रोध” है; क्रोधके आवेशमें मनुष्य हिंसा-प्रतिहिंसा आदि भाँति-भाँतिके पाप करते हैं। धनादि विषयोंकी अत्यन्त बढ़ी हुई लालसाको “लोभ” कहते हैं। लोभी मनुष्य उचित अवसरपर धनका त्याग नहीं करते एवं अनुचितरूपसे भी उपार्जन और संग्रह करनेमें लगे रहते हैं; इसके कारण उनके द्वारा झूठ, कपट, चोरी और विश्वासघात आदि बड़े-बड़े पाप बन जाते हैं। मनुष्य जबसे काम, क्रोध, लोभके वशमें होते हैं, तभीसे वे अपने विचार, आचरण और भावोंमें गिरने लगते हैं। काम, क्रोध और लोभके कारण उनसे ऐसे कर्म होते हैं, जिनसे उनका शारीरिक पतन हो जाता है, मन बुरे विचारोंसे भर जाता है, बुद्धि बिगड़ जाती है, क्रियाएँ सब दूषित हो जाती हैं और इसके फलस्वरूप उनका वर्तमान जीवन सुख, शान्ति और पवित्रतासे रहित होकर दुःखमय बन जाता है तथा मरनेके बाद उनको आसुरी योनियोंकी और नरकोंकी प्राप्ति होती है। इसीलिये इन त्रिविध दोषोंको “नरकके द्वार और आत्माका नाश करनेवाले” बतलाया गया है। ३. काम, क्रोध और लोभ आदि आसुरीसम्पदाका त्याग करके शास्त्रप्रतिपदित सदगुण और सदाचाररूप दैवीसम्पदाका निष्कामभावसे सेवन करना ही कल्याणके लिये आचरण करना है। ४. वेद और वेदोंके आधारपर रचित स्मृति, पुराण, इतिहासादि सभीका नाम शास्त्र है। आसुरीसम्पदाके आचार- व्यवहार आदिके त्यागका और दैवीसम्पदारूप कल्याणकारी गुण-आचरणोंके सेवनका ज्ञान शास्त्रोंसे ही होता है। कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान करानेवाले शास्त्रोंके विधानकी अवहेलना करके अपनी बुद्धिसे अच्छा समझकर जो मनमाने तौरपर मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा आदि किसीकी भी इच्छाविशेषको लेकर आचरण करना है, यही शास्त्रविधिको त्यागकर मनमाना आचरण करना है। ऐसे कर्म करनेवाले कर्ताको कोई भी फल नहीं मिलता अर्थात् परमगति नहीं मिलती--इसमें तो कहना ही क्या है, लौकिक अणिमादि सिद्धि और स्वर्गप्राप्तिरूप सिद्धि भी नहीं मिलती एवं संसारमें सात््विक सुख भी नहीं मिलता। ३१. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये--इसकी व्यवस्था श्रुति, वेदमूलक स्मृति और पुराण-इतिहासादि शास्त्रोंसे प्राप्त होती है। अतएव इस विषयमें मनुष्यकों मममाना आचरण न करके शास्त्रोंको ही प्रमाण मानना चाहिये अर्थात् इन शास्त्रोंमें जिन कर्मोंके करनेका विधान है, उनको करना चाहिये और जिनका निषेध है, उन्हें नहीं करना चाहिये। तथा उन शास्त्रविहित शुभ कर्मोका आचरण भी निष्कामभावसे ही करना चाहिये, क्योंकि शास्त्रोंमें निष्ठामभावसे किये हुए शुभ कर्मोंको ही भगवत्प्राप्तिमें हेतु बतलाया है। एकचत्वारिशो< ध्याय: (श्रीमद्धगवद््गीतायां सप्तदशो<्ध्याय:) श्रद्धाका और शास्त्रविपरीत घोर तप करनेवालोंका वर्णन, आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्-पृथक् भेद तथा ३०, तत्, सतके प्रयोगकी व्याख्या सम्बन्ध-गीताके सोलहवें जध्यायके आरम्भमें श्रीभगवानने निष्कामभावसे सेवन किये जानेवाले शासत्रविहित गुण और आचरणोंका दैवीसम्पदाके नागमसे वर्णन करके फिर शासत्रविपरीत आयुरी सम्पत्तिका कथन किया। साथ ही आयुरस्वभाववाले पुरुषोंको नरकोंमें गिरानेकी बात कही और यह बतलाया कि काम, क्रोध, लोभ ही आयुरीसम्पदाके प्रधान अवगुण हैं और ये तीनों ही नरकोंके द्वार हैं. इनका त्याग करके जो आत्मकल्याणके लिये साधन करता है, वह परम यतिको प्राप्त होता है। इसके अनन्तर यह कहा कि जो शासत्रविधिका त्याग करके मनगाने ढंगसे अपनी समझसे जिसको अच्छा कर्म समझता है, वही करता है; उसे अपने उन कर्मोका फल नहीं मिलता; यह तो ठीक ही है; परंतु ऐसे लोग भी तो हो सकते हैं. जो शासत्रविधिका तो न जाननेके कारण अथवा अन्य किसी कारणसे त्याग कर बैठते हैं तथा यज्ञ- पूजादि शुभ कर्म श्रद्धापूर्वक करते हैं; उनकी क्या स्थिति होती है? इस जिज्ञासाको व्यक्त करते हुए अर्जुन भगवानूसे पूछते हैं-- अजुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृूज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता: । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तम:,अर्जुन बोले--हे कृष्ण! जो श्रद्धासे युक्त मनुष्य शास्त्रविधिको त्यागकर देवादिका पूजन करते हैं,* उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी5
قال أرجونا: يا كريشنا، أولئك الذين يملكون إيمانًا، لكنهم يضعون جانبًا أوامر الشاسترا (śāstra) ثم يعبدون ويقيمون اليَجْنَا (yajña)، ما منزلتهم؟ أهي قائمة على السَّتْفَا (sattva) أم على الرَّجَس (rajas) أم على التَّمَس (tamas)؟
Verse 2
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा) | सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु,श्रीभगवान् बोले--मनुष्योंकी वह शास्त्रीय संस्कारोंसे रहित केवल स्वभावसे उत्पन्न श्रद्धा सात्विकी और राजसी तथा तामसी-ऐसे तीनों प्रकारकी ही होती है। उसको तू मुझसे सुन
قال الربّ المبارك: «إنّ الإيمان (śraddhā) لدى ذوي الأجساد، الناشئ من طبيعتهم، ثلاثةُ أنواع: ساتفِيّ (sāttvika)، وراجسِيّ (rājasa)، وتامسِيّ (tāmasa). فاسمعه منّي.»
Verse 3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत | श्रद्धामयो<यं पुरुषो यो यच्छुद्ध: स एव सः
يا بهاراتا، إنّ إيمان كلّ امرئ يتشكّل على قدر طبيعته الباطنة. فالإنسان في الحقيقة مُكوَّن من الإيمان؛ وكما يكون إيمانه يكون هو.
Verse 4
हे भारत! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तःकरणके अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही हैः ३ ।। सम्बन्ध--श्रद्धाके अनुसार मनुष्योंकी निछाका स्वरूप बतलाया गया: इससे यह जाननेकी इच्छा हो सकती है कि ऐसे मनुष्योंकी पहचान कैसे हो कि कौन किस निषछावाला है। इसपर भगवान् कहते हैं-- यजसन्ते सात््विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसा: । प्रेतान् भूतगणां श्वान्ये यजन्ते तामसा जना:,सात्त्विक पुरुष देवोंको पूजते हैं,/ राजस पुरुष यक्ष और राक्षसोंको३ तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणोंकोः पूजते हैं
يا بهاراتا، إنّ إيمان الناس جميعًا يوافق ما في قلوبهم من باطن. فالإنسان مُكوَّن من الإيمان؛ فكما يكون إيمانه يكون هو. ثم يبيّن الربّ علامة ذلك في العمل: أهل الساتفا يعبدون الآلهة؛ وأهل الراجس يتوجّهون إلى الياكشا والراكشاسا؛ وأهل التامس يعبدون البريتا وأفواج الأرواح والغيلان.
Verse 5
अशान््त्रविदितं घोर तप्यन्ते ये तपो जना: । दम्भाहंकारसंयुक्ता: कामरागबलान्विता:,जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित केवल मन:ःकल्पित घोर तपको तपते हैं तथा दम्भ और अहंकारसे युक्तरँ एवं कामना, आसिक्त और बलके अभिमानसे भी युक्त हैं फलको न चाहनेवाले योगी पुरुषोंद्वारा परमश्रद्धासे किये हुए-5 उस पूर्वोक्त तीन प्रकारके तपको सातच््विक कहते हैं
أولئك الذين يمارسون تقشّفًا مروّعًا غير مُجازٍ في الشاسترا—قومٌ مولعون بتلك الرياضة—يعذّبون أنفسهم، مقرونين بالرياء والأنانية، مدفوعين بالشهوة والتعلّق والكِبْر بقوّتهم.
Verse 6
कर्षयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस:7 । मां चैवान्त:शरीरस्थं तान् विद्धयासुरनिश्चयान्,जो शरीररूपसे स्थित भूतसमुदायको और अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं,* उन अज्ञानियोंको तू आसुरस्वभाववाले जान
أولئك السفهاء يعذّبون جماعة العناصر الحيّة المقيمة في الجسد، ويؤذونني أيضًا أنا الساكن في الداخل، الذاتَ المقيمة في الجسد. فاعلم أنهم ذوو عزمٍ آسوريّ.
Verse 7
सम्बन्ध--त्रिविध स्वाभाविक श्रद्धावालोंके तथा घोर तप करनेवाले लोगोके लक्षण बतलाकर अब भगवान् यात्विकका ग्रहण और राजस-तामसका त्याग करानेके उद्देश्यसे यात्तिक-राजस-तामस आहार, यज्ञ] तप और दानके भेद युननेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं-- आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय: । यज्ञस्तपस्तथा दान तेषां भेदमिमं शृणु,भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार तीन प्रकारका प्रिय होता है। वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकारके होते हैं।* उनके इस पृथक्-पृथक् भेदको तू मुझसे सुन
قال أرجونا: «حتى الطعامُ الذي يستلذه الناسُ جميعًا هو ثلاثةُ أصنافٍ بحسب طبيعة كلّ امرئ. وكذلك القُربانُ (اليَجْنَة)، والزُّهدُ/التقشّفُ (التَّبَس)، والصدقةُ (الدَّانَة)؛ فكلٌّ منها ثلاثيّ. فاسمع مني الآن الفروقَ بينها.»
Verse 8
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना: । रस्या:5 स्निग्धा:: स्थिरा5 ह॒द्या“ं आहारा:5 सात्त्विकप्रिया:,आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीतिको बढ़ानेवाले* रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभावसे ही मनको प्रिय--ऐसे आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विक पुरुषको प्रिय होते हैं
قال أرجونا: «الأطعمةُ التي تزيد العمر، وصفاءَ الذهن، والقوةَ، والصحةَ، والسعادةَ، والرضا الباطن—تلك التي هي لذيذةٌ مغذّية، دَسِمةٌ باعتدال، ثابتةٌ مُقيمة (صالحةٌ مُسندة)، ومحبوبةٌ للقلب بطبعها—هي المحبّبةُ لمن استقرّ في السَّتْفَة (sattva).»
Verse 9
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिन: । आहारा राजसस्येष्टा द:ः:खशोकामयप्रदा:
قال أرجونا: «الأطعمةُ المُرّةُ والحامضةُ والمالحةُ، شديدةُ السخونة، لاذعةٌ حادّة، يابسةٌ مُحرِقة—هي المفضّلةُ عند من تغلب عليه الرَّجَس (rajas)؛ وهي تُورِث الألمَ والحزنَ والمرض.»
Verse 10
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाह-कारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगोंको उत्पन्न करनेवाले आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ* राजस पुरुषको प्रिय होते हैं ।। यातयामं* गतरसं5 पूति? पर्युषितं** च यत् । उच्छिष्टमपिः? चामेध्यं* 5 भोजनं तामसप्रियम्,जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुषको प्रिय होता है
قال أرجونا: «الطعامُ الفاسدُ أو الذي فات أوانه، الخالي من الطعم، الكريهُ الرائحة، المبيتُ لليلةٍ (البائت)، وكذلك البقايا والنجسُ غيرُ الطاهر—ذلك طعامٌ محبوبٌ لمن تغلب عليه التَّمَس (tamas).»
Verse 11
अफलाकाडुक्षिभियज्ञो 3 विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात््विक:३
قال أرجونا: «ذلك القُربانُ (اليَجْنَة) الذي يُقامُ من غير طلبِ ثمرة، ويُؤدَّى وفقَ الحكمِ المقرَّر، مع عزمٍ راسخٍ في القلب: “إنما يُفعل لأنه واجبٌ أن يُفعل”—فذلك قربانٌ من طبيعة السَّتْفَة (sattva).»
Verse 12
जो शास्त्रविधिसे नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है--इस प्रकार मनको समाधान करके, फल न चाहनेवाले पुरुषोंद्वारा किया जाता है, वह सात्तविक है ।। अभिसंधाय तु फल दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञ विद्धि राजसम्,परंतु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरणके लिये अथवा फलको भी दृष्टिमें रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञको तू राजस जानडरें
يا خيرَ آلِ بهاراتا! إنَّ القُربانَ الذي يُقامُ مُتطلِّعًا إلى ثمرته—بل ولأجلِ المباهاة وإظهارِ النفس—فاعلمْ أنَّه قُربانٌ راجَسِيٌّ (تغلبُ عليه الشهوةُ والاندفاع). وأخلاقيًّا هو تديُّنٌ في الظاهر، غيرَ أنَّ باطنَه تحرِّكه رغبةُ النتائج وطلبُ الاعترافِ الاجتماعي، فلذلك يفتقدُ صفاءَ الواجبِ الخالص.
Verse 13
विधिहीनमसृष्टान्नं5 मन्त्रहीनमदक्षिणम्ः | श्रद्धाविरहितं यज्ञ तामसं परिचक्षते,शास्त्रविधिसे हीन, अन्नदानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैं
والقُربانُ الذي يُقامُ بلا أحكامٍ مقرَّرة، وبلا توزيعٍ لائقٍ للطعام، وبلا مَنترَاتٍ لازمة، وبلا دَكشِنا (أجورٍ للكهنة)، وبلا إيمان—يُعلَنُ أنَّه قُربانٌ تامَسِيٌّ (مُظلِمٌ مُضلَّل). وأخلاقيًّا هو مظهرُ طقسٍ لا روحَ فيه، يفتقرُ إلى التوقير والمسؤولية وقصدِ إقامةِ الدَّرما.
Verse 14
सम्बन्ध-- इस प्रकार तीन तरहके यज्ञोंके लक्षण बतलाकर, अब तपके लक्षणोंका प्रकरण आरम्भ करते हुए चार “लोकोंद्वारा सात्विक तपके लक्षण बतलाते हैं-- देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं" शौचमार्जवम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते,देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनोंका पूजन, पवित्रता,& सरलता, ब्रह्मचर्य- और अहिंसाः---यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है
تعظيمُ الآلهة، وتعظيمُ «ذوي الولادتين» (البراهمة العلماء)، وتعظيمُ المعلّم والحكماء؛ والطهارةُ والاستقامة؛ والعفّةُ على نهجِ البْرَهْمَتْشَرْيَا، واللاعنْف (أهِمْسَا)—ذلك كلُّه يُعلَنُ تَقَشُّفًا للجسد. وأخلاقيًّا ليست رياضةُ البدن مجرّدَ مشقّة، بل سيرةٌ مُهذَّبة تُكرِّم النظامَ المقدّس والعلمَ وكفَّ الأذى برحمة.
Verse 15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।४ स्वाध्याया भ्यसनं चैव वाड्मयं तप उच्यते
الكلامُ الذي لا يُثيرُ اضطرابَ الآخرين—صادقًا، لطيفًا، نافعًا—ومواظبةُ السْفادْهْيَايَا (المطالعة والتعلّم الذاتي): ذلك يُعلَنُ تَقَشُّفًا للسان.
Verse 16
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद््गीतापवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशासत्ररूप श्रीमद्भगवद््गीतोपनिषद, श्रीकृष्णाजुनसंवादमें दैवासुरसम्पदाविभागयोग नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ,जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रोंक पठनका एवं परमेश्वरके नाम-जपका अभ्यास है, वही वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है ।। मन: प्रसाद: सौम्यत्वं? मौनमात्मविनिग्रह:* 5 | भावसंशुद्धिरित्येतत््*९ तपो मानसमुच्यते मनकी प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करनेका स्वभाव, मनका निग्रह और अन्त:करणके भावोंकी भलीभाँति पवित्रता--इस प्रकार यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है
تُسمّى رياضةُ اللسان تقشّفًا حين لا تُقلِقُ الكلماتُ الآخرين، وتكون صادقةً، لطيفةً، نافعةً، وحين يُداوَمُ على تلاوةِ النصوصِ المقدّسة ودراستها. وأمّا تقشّفُ النفس فيُقال إنّه سكينةُ القلب، واللِّين، والصمتُ الباطن، وضبطُ الذات، وتطهيرُ الميولِ الداخلية تطهيرًا تامًّا. وفي السياق الأخلاقي لتعليم ساحة القتال، تُعرِّف هذه الرياضاتُ القوّةَ لا بوصفها قسوةً، بل بوصفها سيادةً على القول والفكر، منسجمةً مع الحقّ والمنفعة.
Verse 17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविध॑ नरैः । अफलाकाडूक्षिभियक्ति:*5 सात्त्विकं परिचक्षते,इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्म॒विद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रपविभागयोगो नाम सप्तदशो<ध्याय:
إنَّ الزهدَ والتقشُّفَ الذي يُؤدَّى بأعلى درجات الإيمان—ويُمارَس على وجوهه الثلاثة من قِبَل أناسٍ منضبطين متحرّرين من التطلّع إلى الثمرة—يُعلَن هنا أنه «ساتفِكي» (sāttvika). وأخلاقيًّا يعلّم أن تهذيب النفس يصير مُطهِّرًا حين يقوم على يقينٍ صادق لا على طلب الجزاء.
Verse 18
१७ ।। सम्बन्ध-- अब राजय तपके लक्षण बतलाये जाते हैं-- सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेनः चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्ते राजसं चलमपश्चुवम्र,जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा अन्य किसी स्वार्थके लिये भी३ स्वभावसे या पाखण्डसे किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है
قال أرجونا: إنَّ التقشُّف الذي يُؤدَّى طلبًا للتكريم بين الناس، والوجاهة الشخصية، والتعبُّد للذات—ويُمارَس برياءٍ ونفاق—يُعلَن هنا أنه «راجَسي» (rājasa). ومثل هذه الممارسة مضطربة لا ثبات لها، وثمرتها لا تدوم. وأخلاقيًّا تُحذِّر من أن الانضباط الروحي يفقد قدرته على التطهير إذا قادته الأنا والاستعراض الاجتماعي لا الصدق وكبح النفس في الباطن.
Verse 19
सम्बन्ध-- अब तामस तपके लक्षण बतलाते हैं. जो कि सर्वथा त्याज्य हैं-- मूठढग्राहेणात्मनोरं यत् पीडया क्रियते तप: । परस्योत्सादनार्थ वा तत् तामसमुदाह्तम्
قال أرجونا: إنَّ التقشُّف الذي يُؤدَّى بعنادٍ أحمق—بتعذيب الجسد وإيلامه—أو الذي يُتَّخذ قصدًا لإيذاء غيره أو إهلاكه، يُعلَن أنه تقشُّفٌ على صفة الظلمة «تامَسي» (tāmasika).
Verse 20
१९ || सम्बन्ध-- तीन प्रकारके तपोंका लक्षण करके अब दानके तीन प्रकारके लक्षण कहते हैं-- दातव्यमिति यद् दानं दीयते5नुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद् दानं सात्त्विकं स्मृतम्,दान देना ही कर्तव्य है*--ऐसे भावसे जो दान देश तथा काल* और पात्रके प्राप्त होनेपर८ उपकार न करनेवालेके प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है+
قال أرجونا: العطاء الذي يُبذَل عن قناعةٍ تقول: «ينبغي أن يُعطى»، لمن لا يملك ردًّا ولا مكافأة، ويُقدَّم في المكان والزمان اللائقين إلى مستحقٍّ جدير—فذلك العطاء يُذكَر أنه «ساتفِكي» (sāttvika).
Verse 21
यत्तु प्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुन: । दीयते च परिक्लिष्टं तद् दानं राजसं स्मृतम्,किंतु जो दान क्लेशपूर्वकः तथा प्रत्युपकारके प्रयोजनसेः अथवा फलको दृष्टिमें रखकर* फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है
وأمّا العطاء الذي يُبذَل بمشقّةٍ أو على كُره، إمّا طلبًا لردّ الجميل أو مع تعليق النظر على ثوابٍ ومنفعة، فيُذكَر أنه عطاءٌ «راجَسي» (rājasa).
Verse 22
अदेशकाले यद् दानमपात्रेभ्यश्व दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत् तामसमुदाह्ृतम्,जो दान बिना सत्कारके” अथवा तिरस्कारपूर्वक* अयोग्य देश-कालमें* और कुपात्रके* प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है
قال أرجونا: إن العطاء الذي يُقدَّم في غير موضعه وزمانه، ولغير المستحقين—يُعطى بلا توقير ومع ازدراء—فذلك يُعلَن أنه عطاءٌ تاماسيّ (tāmasika).
Verse 23
सम्बन्ध-- अब सात्विक यज्ञ दान और तप उपादेय क्यों हैं: भगवान्से उनका क्या सम्बन्ध है तथा उन सात्विक यज्ञ, तप और दानोंगें जो अंग-वैगुण्य हो जाय, उसकी पूर्ति किस प्रकार होती है--यह सब बतलानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है-- ३० तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत: । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्न यज्ञाश्न विहिता: पुरा,३5, तत्, सत--ऐसे यह तीन प्रकारका सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका नाम कहा है; उसी ब्रह्मसे सृष्टिके आदिकालमें ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादिः रचे गये
«تَتْ»، «سَتْ»—هكذا تُذكَر التسمية الثلاثية لبراهْمان (Brahman). ومن ذلك البراهْمان نفسه، في بدء الخلق، شُرِّع البراهمة، والڤيدا، وطقوس القربان (yajña).
Verse 24
सम्बन्ध-- परमेश्वरके उपर्युक्त उ०, तत् और सत्--इन तीन नामोंका यज्ञ, दान, तप आदिके साथ क्या सम्बन्ध है? ऐसी जिज्ञाया होनेपर कहते हैं-- तस्मादोमित्युदाह्ृत्य यज्ञदानतप:क्रिया: । प्रवर्तन्ते विधानोक्ता: सततं ब्रह्म॒वादिनाम्
لذلك، بإنشاد «أوم» في البدء، تُستهلّ أعمال القربان والصدقة والزهد—المؤدّاة وفق حكم الشاسترا—على الدوام على يد الذين يتكلمون عن براهْمان (ويحيون به).
Verse 25
२४ ।। तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतप:क्रिया: । दानक्रियाश्व विविधा: क्रियन्ते मोक्षकाड्क्षिभि:,तत् अर्थात् “तत” नामसे कहे जानेवाले परमात्माका ही यह सब है--इस भावसे फलको न चाहकर नाना प्रकारकी यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याणकी इच्छावाले पुरुषोंद्वारा की जाती हैं:
من غير أن يقصدوا ثمرةً لأنفسهم، يقوم طالِبو الموكشا بالقرابين والرياضات، ويباشرون كذلك أنواعًا شتى من الصدقات—يفعلونها بروح «تَتْ»، على أنها تقدمة للواقع الأسمى لا وسيلةً لاكتساب النتائج.
Verse 26
सद्धभावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते,'सत्'--इस प्रकार यह परमात्माका नाम सत्यभावमें* और श्रेष्ठभावमें+ प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्ममें भी* “सत” शब्दका प्रयोग किया जाता है
تُستعمل كلمة «سَتْ» للدلالة على الوجود الحقّ وعلى السجية النبيلة؛ وكذلك، يا بارثا، يُطلَق لفظ «سَتْ» أيضًا على العمل المحمود.
Verse 27
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते,तथा यज्ञ, तप और दानमें जो स्थिति है, वह भी 'सत' इस प्रकार कही जाती है? और उस परमात्माके लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्--ऐसे कहा जाता है*
في القربان والزهد والصدقة تُسمّى الثباتُ والاستقامةُ أيضًا «سَت» (الخير/الحق). وكذلك كلُّ عملٍ يُؤدَّى ابتغاءَ ذاك (العلِيّ الأعلى) يُسمّى حقًّا «سَت».
Verse 28
सम्बन्ध-- इस प्रकार श्रद्धापूर्वक किये हुए शास्त्र-विह्चित यज्ञ, तप; दान आदि कमोंका महत्त्व बतलाया गया; उसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि जो शास्त्रविद्वित यज्ञादि कर्म बिना श्रद्धाके किये जाते है; उनका क्या फल होता है: इसपर भगवान् इस अध्यायका उपसंहार करते हुए कहते हैं-- अश्रद्धया हुत॑ं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्ः । असदित्युच्यते पार्थ न च तत् प्रेत्य नो इह,हे अर्जुन! बिना श्रद्धाके किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है--वह समस्त “असत'--इस प्रकार कहा जाता है; इसलिये वह न तो इस लोकमें लाभदायक है और न मरनेके बाद ही?
يا بارثا (أرجونا)! كلُّ ما يُقَدَّم قربانًا، أو يُعطى صدقةً، أو يُمارَس زهدًا—بل كلُّ عملٍ صالحٍ يُفعل—إذا فُعل بغير إيمانٍ (شرَدها) سُمّي «أَسَت»؛ باطلًا لا ثمرة له. فلا نفعَ فيه في هذه الحياة، ولا بعد الموت.
Verse 40
भीष्मपर्वणि तु चत्वारिंशो 5ध्याय:
في قسم بهيشما (Bhīṣma Parva)، هذا هو الفصل الأربعون (أدهيَايَا).
The chapter implies a tension between individual heroism and collective duty: champions act decisively to protect allies and symbols of command, yet outcomes show how personal valor must operate within coordinated protection, reinforcement, and withdrawal responsibilities.
Visible markers of authority (standards, chariots, escort screens) and disciplined coordination are portrayed as decisive; tactical effectiveness is linked to composure, rapid support, and the management of morale as much as to individual skill.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is narrative-structural—demonstrating escalation, the signaling role of banners, and the causal linkage between localized crises and broader army morale/withdrawal.