Adhyaya 4
Bhishma ParvaAdhyaya 422 Versesयुद्ध आरम्भ-पूर्व वातावरण; संकेत और दर्शन के स्तर पर ‘अनिष्ट’ की छाया गहराती है।

Adhyaya 4

Bhīṣma Parva, Adhyāya 4 — Dhṛtarāṣṭra–Vyāsa Saṃvāda on Kāla and Jayalakṣaṇa (Signs of Victory)

Upa-parva: Nimitta-jaya-lakṣaṇa-vicāra (Omens and Signs of Victory) — within Bhīṣma Parva

Vaiśaṃpāyana narrates a reflective exchange in which the ascetic sage Vyāsa addresses Dhṛtarāṣṭra’s predicament. Vyāsa first articulates kāla (time) as a force that contracts and recreates worldly conditions, denying permanence and warning against the ethical degradation of kin-slaying framed as political necessity. Dhṛtarāṣṭra acknowledges knowledge yet admits confusion driven by self-interest, then requests a precise account of the signs that accompany impending victory in collective engagements. Vyāsa enumerates auspicious indicators: orderly sacrificial fire (bright, smokeless, right-curling flame), favorable sounds (conch, drums), auspicious bird-calls and flight patterns, favorable winds, pleasing sensory conditions, and—most prominently—troop morale and cohesion. He also describes the dynamics of rout and panic: once a formation is “split” (dīrṇa), fear propagates, and even large forces become hard to stabilize. The chapter concludes with a strategic-philosophical caution: numerical strength alone does not ensure victory; outcomes are unstable, contingent, and entwined with daiva (the beyond-human factor), so even victory may entail depletion.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के द्वार पर आकाश स्वयं भाषा बोल उठता है—राहु-केतु का एक ही राशि में आ जाना, सूर्य का तुला में होना, और अशुभ संकेतों की शृंखला; मानो युद्ध से पहले प्रकृति अंतिम चेतावनी दे रही हो। → धृतराष्ट्र, कुछ क्षण मौन रहकर बार-बार लंबी साँसें लेते हैं और संजय से पूछते हैं—ये उत्पात क्या कहते हैं? उसी प्रश्न के उत्तर में कथा युद्धभूमि से हटकर ‘भूमि’ और ‘भूत’ के व्यापक विधान पर फैलती है: स्थावर-जंगम का भेद, जंगम की योनियाँ, चौदह प्रकार के प्राणी, ग्राम्य और आरण्य पशुओं की गणना—और फिर उसी भूमि पर अधिकार के लिए राजाओं की अतृप्त लालसा। → वाक्य-शिखर यह उद्घोष बनता है: ‘भूमौ च जायते सर्वं… भूमि: प्रतिष्ठा भूतानां’ और फिर उसका कठोर निष्कर्ष—‘यस्य भूमिस्तस्य सर्वं… तत्रातिगृद्धा राजानो विनिधघ्नन्तीतरेतरम्’—जिसके पास भूमि, उसके पास सब; और उसी भूमि के लोभ में राजा एक-दूसरे का विनाश करते हैं। → अध्याय ज्ञान-गणना के रूप में स्थिर होता है—चर-अचर, अण्डज-स्वेदज-जरायुज, चौदह भेद, ग्राम्य-आरण्य पशुओं की सूची—और इस बोध पर टिकता है कि युद्ध का मूल केवल शस्त्र नहीं, ‘भूमि’ का आकर्षण है, जो समस्त प्राणियों की प्रतिष्ठा भी है और संघर्ष का कारण भी। → अशुभ संकेतों की छाया बनी रहती है—यदि भूमि ही सबका आधार है, तो उसी भूमि के लिए उठे शस्त्र किसका धर्म सिद्ध करेंगे और किसका विनाश?

Shlokas

Verse 1

- राहु और केतु सदा एक-दूसरेसे सातवीं राशिपर स्थित होते हैं, किंतु उस समय दोनों एक राशिपर आ गये थे; अतः महान्‌ अनिष्टके सूचक थे। सूर्य तुलापर थे, उनके निकट राहुके आनेका वर्णन पहले आ चुका है; फिर केतुके वहाँ पहुँचनेसे महान्‌ दुर्योग बन गया है। चतुथों5 ध्याय: धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजयके द्वारा भूमिके महत्त्वका वर्णन वैशम्पायन उवाच एवमुक्‍क्त्वा ययौ व्यासो धृतराष्ट्राय धीमते । धृतराष्ट्रोडपि तच्छुत्वा ध्यानमेवान्वपद्यत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बुद्धिमान्‌ राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर महर्षि व्यासजी चले गये। धृतराष्ट्र भी उनके पूर्वोक्त वचन सुनकर कुछ कालतक उनपर सोच- विचार करते रहे

قال فايشَمبايانا: «بعد أن قال ذلك لدهرتراشترا الحكيم، انصرف الحكيم فياسا. وأما دهرتراشترا، فلما سمع تلك الكلمات، دخل في تأمّلٍ عميق، يراجع ما قيل زمناً—وقفةٌ باطنية تومئ إلى قلقٍ أخلاقي عشية الصراع العظيم».

Verse 2

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनि:श्वस्य मुहुर्मुहुः । संजयं संशितात्मानमपृच्छद्‌ भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) दो घड़ीतक सोचने-विचारनेके पश्चात्‌ बारंबार लंबी साँस खींचते हुए उन्होंने विशुद्ध हृदयवाले संजयसे पूछा--

قال فايشَمبايانا: «وبعد أن تأمّل كأنه لحظة، وأطلق زفراتٍ عميقةً ثقيلةً مراراً، سأل سيّدُ البهارات، ذلك “الثور” بينهم، سانجايا ذا النفس المهذّبة والعقل الثابت—إشارةً إلى ما يعتمل في صدر الملك من كربٍ داخلي وهو يلتمس المشورة الصادقة تحت وطأة الحرب الوشيكة وثقلها الأخلاقي».

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जग्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें अमंगलस्‌चक उत्पातों तथा विजययूचक लक्षणोंका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,संजयेमे महीपाला: शूरा युद्धाभिनन्दिन: । अन्योन्यमभिनिष्नन्ति शस्त्रैरुब्चावचैरिह “संजय! पृथ्वीका पालन करनेवाले ये शूरवीर नरेश इस भूमिके लिये ही अपना जीवन निछावर करके युद्धका अभिनन्दन करते और छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हैं। इस भूतलके ऐश्वर्यको स्वयं ही चाहते हुए वे एक-दूसरेको सहन नहीं कर पाते हैं। परस्पर प्रहार करते हुए यमलोककी जनसंख्या बढ़ाते हैं, परंतु शान्त नहीं होते हैं। अतः मैं ऐसा मानता हूँ कि यह भूमि बहुसंख्यक गुणोंसे विभूषित है। इसलिये संजय! तुम मुझसे इस भूमिके गुणोंका ही वर्णन करो

قال فياسا: «يا سانجايا، إن هؤلاء الملوك الشجعان، حماة الأرض، يطربون للحرب ويبذلون حياتهم من أجل هذه الأرض. هنا يضرب بعضهم بعضاً بأسلحةٍ شتّى، كبيرةٍ وصغيرة.» ويصوّر البيت ساحة القتال منافسةً مأساوية على السيادة: فالشهوة إلى سلطان الدنيا تدفع الحكّام إلى عدم احتمال بعضهم بعضاً وإلى عنفٍ لا ينقطع، فيزيد عدد الراحلين إلى مملكة ياما، ومع ذلك لا تهدأ نفوسهم.

Verse 4

पार्थिवा: पृथिवीहेतो: समभित्यज्य जीवितम्‌ । न वा शाम्यन्ति निष्नन्तो वर्धयन्ति यमक्षयम्‌,“संजय! पृथ्वीका पालन करनेवाले ये शूरवीर नरेश इस भूमिके लिये ही अपना जीवन निछावर करके युद्धका अभिनन्दन करते और छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हैं। इस भूतलके ऐश्वर्यको स्वयं ही चाहते हुए वे एक-दूसरेको सहन नहीं कर पाते हैं। परस्पर प्रहार करते हुए यमलोककी जनसंख्या बढ़ाते हैं, परंतु शान्त नहीं होते हैं। अतः मैं ऐसा मानता हूँ कि यह भूमि बहुसंख्यक गुणोंसे विभूषित है। इसलिये संजय! तुम मुझसे इस भूमिके गुणोंका ही वर्णन करो इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि भौमगुणकथने चतुर्थोउध्याय:

قال فايشَمبايانا: «إنّ الملوك، من أجل الأرض، يطرحون حتى أرواحهم ويُسرعون إلى ساحة القتال. ومع أنهم يصرعون بعضهم بعضًا، لا يهدأون؛ بل لا يزيدون إلا مملكة يَما امتلاءً بتزايد الموتى الذي لا ينقطع.»

Verse 5

भौममैश्वर्यमिच्छन्तो न मृष्यन्ते परस्परम्‌ । मन्ये बहुगुणा भूमिस्तन्ममाचक्ष्व संजय,“संजय! पृथ्वीका पालन करनेवाले ये शूरवीर नरेश इस भूमिके लिये ही अपना जीवन निछावर करके युद्धका अभिनन्दन करते और छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हैं। इस भूतलके ऐश्वर्यको स्वयं ही चाहते हुए वे एक-दूसरेको सहन नहीं कर पाते हैं। परस्पर प्रहार करते हुए यमलोककी जनसंख्या बढ़ाते हैं, परंतु शान्त नहीं होते हैं। अतः मैं ऐसा मानता हूँ कि यह भूमि बहुसंख्यक गुणोंसे विभूषित है। इसलिये संजय! तुम मुझसे इस भूमिके गुणोंका ही वर्णन करो

قال فايشَمبايانا: «إذ يبتغون سيادة الأرض وغناها، لا يطيق بعضهم بعضًا. أرى أن هذه الأرض موهوبة بفضائل كثيرة؛ فحدّثني يا سَنجايا عن خصال الأرض.»

Verse 6

बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । कोट्यश्व लोकवीराणां समेता: कुरुजाडले,“कुरक्षेत्रमें इस जगत्‌के कई हजार, लाख, करोड़ और अरबों वीर एकत्र हुए हैं

قال فايشَمبايانا: «في كُرُوجانغالا اجتمع أبطال العالم عددًا لا يُحصى—بالآلاف، وبعشرات الآلاف، بل حتى بالكوṭيّات والأربودات.»

Verse 7

देशानां च परीमाणं नगराणां च संजय । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यत एते समागता:,“संजय! ये लोग जहाँ-जहाँसे आये हैं, उन देशों और नगरोंका यथार्थ परिमाण मैं तुमसे सुनना चाहता हूँ

قال فايشَمبايانا: «يا سَنجايا، أودّ أن أسمع بدقّة القياس الحقيقي واتساع الأقاليم والمدن التي قدم منها هؤلاء المحاربون مجتمعين.»

Verse 8

दिव्यबुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्वं ज्ञानचक्षुषा । प्रभावात्‌ तस्य विप्रर्षेव्यासस्थामिततेजस:,“क्योंकि तुम अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि व्यासजीके प्रभावसे दिव्य बुद्धिरूपी प्रदीपसे प्रकाशित ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न हो गये हो"

«لأنك، بفضل القوة الروحية لذلك البراهمارشي فياسا ذي البهاء الذي لا يُحدّ، قد مُنحت عين المعرفة الحقّة، مستنيرةً بمصباح العقل الإلهي. وهكذا فأنت أهلٌ لأن تُبصر وتروي ما يتجاوز نظر الناس العادي.»

Verse 9

संजय उवाच यथाप्रज्ञं महाप्राज्ञ भौमान्‌ वक्ष्यामि ते गुणान्‌ | शास्त्रचक्षुरवेक्षस्व नमस्ते भरतर्षभ,संजयने कहा--महाप्राज्ञ! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपसे इस भूमिके गुणोंका वर्णन करूँगा। भरतश्रेष्ठी आपको नमस्कार है; आप शास्त्रदृष्टिसे इस विषयको देखिये और समझिये

قال سنجيا: «أيها الحكيم العظيم، سأصف لك—بحسب ما يبلغه فهمي—خصال هذه الأرض. لك مني التحية والخضوع، يا أكرمَ رجالِ آلِ بهاراتا؛ فانظر إلى هذا الأمر بعين الشاسترا (الكتب المقدسة) وافهمه.»

Verse 10

द्विविधानीह भूतानि चराणि स्थावराणि च । त्रसानां त्रिविधा योनिरण्डस्वेदजरायुजा:,राजन्‌! इस पृथ्वीपर दो तरहके प्राणी उपलब्ध हैं--स्थावर और जंगम। जंगम प्राणियोंकी उत्पत्तिके तीन स्थान हैं--अण्डज, स्वेदज और जरायुज

قال سنجيا: «أيها الملك، إن الكائنات الحية في هذا العالم نوعان: متحركة وثابتة. وأما المتحركة فمولدها يُذكر على ثلاثة أنحاء: ما يخرج من البيض، وما يتولد من الرطوبة، وما يولد من الرحم.»

Verse 11

त्रसानां खलु सर्वेषां श्रेष्ठा राजन्‌ जरायुजा: । जरायुजानां प्रवरा मानवा: पशवश्च ये,राजन! सम्पूर्ण जंगम जीवोंमें जरायुज श्रेष्ठ माने गये हैं, जरायुजोंमें भी मनुष्य और पशु उत्तम हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، إن أرفعَ المتحركات منزلةً هم المولودون من الرحم. ومن بين هؤلاء المولودين من الرحم، أيها الملك، يُعَدُّ الإنسانُ والبهائمُ من خيرها.»

Verse 12

नानारूपधरा राजंस्तेषां भेदाश्षतुर्दश । वेदोक्ता: पृथिवीपाल येषु यज्ञा: प्रतिष्ठिता:,वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले होते हैं। राजन्‌! उनके चौदह भेद हैं, जो वेदोंमें बताये गये हैं। भूपाल! उन्हींमें यज्ञोंकी प्रतिष्ठा है

قال سنجيا: «أيها الملك، إنهم يتخذون صورًا شتى. يا حامي الأرض، أقسامهم أربعة عشر كما ورد في الفيدا؛ وعلى هذه الأقسام تقوم شعائر القربان (اليَجْنَة yajña).»

Verse 13

ग्राम्याणां पुरुषा: श्रेष्ठा: सिंहाश्वारण्यवासिनाम्‌ | सर्वेषामेव भूतानामन्योन्येनोपजीवनम्‌,ग्रामवासी पशु और मनुष्योंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं और वनवासी पशुओंमें सिंह श्रेष्ठ हैं। समस्त प्राणियोंका जीवन-निर्वाह एक-दूसरेके सहयोगसे होता है

قال سنجيا: «فيمن يسكنون القرى، يُعَدُّ الإنسانُ الأرفعَ منزلة؛ وفي الوحوش الساكنة الغابة، يُعَدُّ الأسدُ الأرفعَ منزلة. حقًّا إن معيشةَ جميع الكائنات تقوم على التعاضد المتبادل—فكلٌّ يحيا بعون غيره.»

Verse 14

उद्धिज्जा: स्थावरा: प्रोक्तास्तेषां पजचैव जातय: । वृक्षगुल्मलतावलल्‍ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातय:,स्थावरोंको उद्धिज्ज कहते हैं। उनकी पाँच ही जातियाँ हैं--वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली और त्वक्सार (बाँस आदि)। ये सब तृणवर्गकी जातियाँ हैं

قال سنجيا: إن الكائنات التي تولد بالإنبات تُسمّى «غير متحركة» (النباتات). ويُقال إن لها خمسة أصناف: الأشجار، والشجيرات، والزواحف من الكروم، والمتسلّقات، وما كان له لُبٌّ ليفيّ أو قلبٌ كالقِشر (كالخيزران). وكلّ ذلك يُعدّ من أصناف الحشائش والنبات.

Verse 15

तेषां विंशतिरेकोना महाभूतेषु पठचसु । चतुर्विशतिरुद्दिष्टा गायत्री लोकसम्मता,ये स्थावर-जंगमरूप उन्नीस प्राणी हैं। इनके साथ पाँच महाभूतोंको गिन लेनेपर इनकी संख्या चौबीस हो जाती है। गायत्रीके भी चौबीस ही अक्षर होते हैं। इसलिये इन चौबीस भूतोंको भी लोकसम्मत गायत्री कहा गया है

قال سنجيا: يُقال إن عدد تلك الكائنات تسعة عشر؛ فإذا أُدخلت معها «المهابهوتات» الخمسة (العناصر العظمى) أُعلن المجموع أربعةً وعشرين. ولأن «الغاياتري»—المقبولة في العالم بوصفها ذات حجّة—تتألف كذلك من أربعٍ وعشرين مقطعًا، فقد جرى في الفهم الشائع أن تُسمّى هذه الأربعة والعشرون أيضًا «غاياتري».

Verse 16

य एतां वेद गायत्री पुण्यां सर्वगुणान्विताम्‌ । तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोके न प्रणश्यति,भरतश्रेष्ठ] जो लोकमें स्थित इस सर्वगुणसम्पन्न पुण्यमयी गायत्रीको यथार्थरूपसे जानता है, वह कभी नष्ट नहीं होता

قال سنجيا: يا خيرَ آلِ بهاراتا، من عرف على الحقيقة هذه الغاياتري المقدّسة، الجامعة لكل الفضائل، لا يهلك في هذا العالم.

Verse 17

अरण्यवासिन: सप्त सप्तैषां ग्रामवासिन: । सिंहा व्याप्रा वराहाश्न महिषा वारणास्तथा

قال سنجيا: «كان منهم سبعةٌ يسكنون الغابة، وكذلك سبعةٌ منهم يسكنون القرى—(رجالٌ على شاكلة) الأسود، والنمور، والخنازير البرّية، والجاموس، والفيلة.»

Verse 18

गौरजाविमनुष्याश्च अश्वाश्वतरगर्दभा:,गाय, बकरी, भेड़, मनुष्य, घोड़े, खच्चर और गदहे--इन सात पशुओंको साधु पुरुषोंने ग्रामवासी बताया है। राजन! इस प्रकार ये ग्रामवासी और वनवासी मिलकर कुल चौदह पशु कहे गये हैं

قال سنجيا: البقرة، والماعز، والضأن، والإنسان، والحصان، والبغل، والحمار—هذه السبعة من الحيوان سمّاها الرجال الصالحون «سُكّان القرى». أيها الملك، وهكذا إذا اجتمع سُكّان القرى وسُكّان الغابات قيل إن مجموع الحيوان أربعة عشر.

Verse 19

एते ग्राम्या: समाख्याता: पशव: सप्त साधुभि: । एते वै पशवो राजन _ग्राम्यारण्याश्षतुर्दश,गाय, बकरी, भेड़, मनुष्य, घोड़े, खच्चर और गदहे--इन सात पशुओंको साधु पुरुषोंने ग्रामवासी बताया है। राजन! इस प्रकार ये ग्रामवासी और वनवासी मिलकर कुल चौदह पशु कहे गये हैं

قال سنجيا: «إن الحكماء وصفوا هذه الحيوانات السبعة بأنها “أهلية” (تعيش بين المساكن). أيها الملك، فإذا جُمِعَت الأهلية والوحشية معًا قيل إن هذه الحيوانات أربعة عشرَ جميعًا».

Verse 20

भूमौ च जायते सर्व भूमौ सर्व विनश्यति । भूमि: प्रतिष्ठा भूतानां भूमिरेव परायणम्‌,सब कुछ इस भूमिपर ही उत्पन्न होता है और भूमिमें ही विलीन होता है। भूमि ही सब प्राणियोंकी प्रतिष्ठा और भूमि ही सबका परम आश्रय है

قال سنجيا: «كلُّ شيءٍ يولد على الأرض، وعلى الأرض يفنى كلُّ شيء. الأرضُ هي أساسُ الكائنات، والأرضُ وحدَها ملجؤهم الأخير».

Verse 21

यस्य भूमिस्तस्य सर्व जगत्‌ स्थावरजड्भमम्‌ । तत्रातिगृद्धा राजानो विनिधघ्नन्तीतरेतरम्‌,जिसके अधिकारमें भूमि है, उसीके अधिकारमें सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ है, इसीलिये भूमिके प्रति आसक्ति रखनेवाले राजालोग एक-दूसरेको मारते हैं

قال سنجيا: «مَن يملك الأرض يُعَدّ مالكًا للعالم كلّه، بما فيه المتحرّك والساكن. لذلك فإن الملوك، وقد استبدّ بهم الطمع المفرط في الإقليم، يضرب بعضُهم بعضًا حتى الهلاك».

Verse 176

ऋक्षाश्न वानराश्नैव सप्तारण्या: स्मृता नृप । नरेश्वर! उपर्युक्त चौदह प्रकारके जरायुज प्राणियोंमें वनवासी पशु सात हैं और ग्रामवासी भी सात ही हैं। सिंह, व्याप्र, वराह, महिष, गज, रीछ और वानर--ये सात वनवासी पशु माने गये हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، من بين الأنواع الأربعة عشر من الكائنات الولودة المذكورة آنفًا، يُعَدّ سبعةٌ منها من سكان الغابة وسبعةٌ من سكان القرى. الأسد، والنمر، والخنزير البري، والجاموس، والفيل، والدب، والقرد—فهذه السبعة تُذكَر على أنها حيوانات تعيش في الغابة».

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether pursuit of sovereignty can justify actions that damage kuladharma and kinship ethics; Vyāsa frames kin-harm as ethically diminutive and urges a lawful path when alternatives exist.

Victory is not a simple function of force; it depends on contingent conditions (nimitta), collective psychology (harṣa/morale), and the operation of kāla/daiva, implying the need for humility, ethical restraint, and strategic prudence.

Yes: the chapter explicitly notes that numerical superiority does not guarantee success and that even successful engagements entail kṣaya (depletion), functioning as a caution against triumphal certainty and simplistic causality.