
भीष्मपर्व — अध्याय २: संजयस्य दिव्यदृष्टिप्रदानम् तथा निमित्तवर्णनम् (Granting Sañjaya Divine Sight and the Description of Omens)
Upa-parva: Sañjaya-divya-dṛṣṭi-pradāna (Granting of Divine Sight to Sañjaya) — Omens of Kṣaya
Vaiśaṃpāyana reports that Vyāsa, after observing the twilights, foresees severe destruction in the forthcoming battle and privately counsels Dhṛtarāṣṭra (here referenced through the Vaicitravīrya lineage). Vyāsa urges emotional steadiness by invoking the inevitability of time’s cycle (kāla-paryāya) and offers the king the ability to see the war directly; Dhṛtarāṣṭra refuses direct viewing of kin-death but requests complete auditory narration. Vyāsa grants Sañjaya divine sight and expanded cognition: he will perceive events openly or secretly, by day or night, even those mentally conceived; he will remain unharmed by weapons and fatigue and will survive the conflict. Vyāsa then enumerates alarming nimittas—assemblies of predatory birds, abnormal atmospheric and celestial appearances (sun and moon distortions, unusual halos and lightning, indistinct day-night), ominous sounds, trembling or bleeding images, unstruck drums, and other disturbances—interpreting them as signs of imminent large-scale kṣaya. The chapter closes with continued foreboding phenomena, reinforcing the war’s inevitability and the narrative necessity of Sañjaya’s reportage.
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि अब पूर्व-पश्चिम दिशाओं में आमने-सामने खड़ी सेनाओं के बीच एक रहस्यमय, अनिवार्य-सा संकेत-काल आरम्भ होता है—मानो युद्ध से पहले स्वयं प्रकृति बोल उठी हो। → धृतराष्ट्र (वैचित्रवीर्य-वंशज राजा) पुत्रों के भविष्य को सोचकर शोकाकुल हैं; उसी समय ‘भूत-भव्य-भविष्यवित्’ प्रत्यक्षदर्शी-से ज्ञानी द्वारा कालचक्र का बोध कराया जाता है—और फिर एक-एक करके अपशकुन उभरते हैं: रात्रि में आकाशीय पशुओं का रौद्र प्रणाद, पक्षियों की दारुण वाणी, ग्रहों की विकृति, बिना बादल के गर्जना, रथ-वाहनों का रुदन। → रोहिणी को पीड़ित करता शनैश्वर और सोम-लक्ष्म का व्यावर्तन ‘महद् भय’ का उद्घोष करता है; उसी के साथ अनभ्र-गर्जना और अश्रुबिन्दु-से गिरते संकेत युद्ध की निकटता को चरम पर पहुँचा देते हैं—यह केवल भय नहीं, नियति का दस्तक है। → वक्ता धृतराष्ट्र को समझाता है: जब सब काल के अधीन होकर विनाश की ओर बढ़ें, तब इसे ‘कालपर्याय’ जानकर शोक में मन न डुबो—यह उपदेश शोक को दर्शन में रूपान्तरित करता है, यद्यपि संकट टलता नहीं। → अपशकुनों की श्रृंखला यह संकेत देती है कि शीघ्र ही ‘घोर रण’ में राजाओं और राजपुत्रों की देहें पृथ्वी ढँकेंगी—अगला चरण युद्ध के वास्तविक उद्घाटन की ओर बढ़ता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्मा भारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूण्डविनिर्माणपर्वमें सैन्यशिक्षणविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ,ऑपनआक्रात बछ। अकाल द्वितीयो<्ध्याय: वेदव्यासजीके द्वारा संजयको दिव्य दृष्टिका दान तथा भयसूचक उत्पातोंका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततः पूर्वापरे सैन्ये समीक्ष्य भगवानृषि: । सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यास: सत्यवतीसुत: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पूर्व और पश्चिम दिशामें आमने-सामने खड़ी हुई दोनों ओरकी सेनाओंको देखकर भूत, भविष्य और वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले, सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, भरतवंशियोंके पितामह सत्यवतीनन्दन महर्षि भगवान् व्यास, जो होनेवाले भयंकर संग्रामके भावी परिणामको प्रत्यक्ष देख रहे थे, विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्रके पास आये। वे उस समय अपने पुत्रोंके अन्यायका चिन्तन करते हुए शोकमग्न एवं आर्त हो रहे थे। व्यासजीने उनसे एकान्तमें कहा
قال فَيْشَمْبَايَنَة: ثم إنّ الحكيمَ المباركَ—فياسا ابنَ سَتْيَفَتِي، وأفضلَ العارفين بالويدات—لمّا تفحّص الجيشين المصطفَّين متقابلين في الجانبين الشرقي والغربي، تهيّأ لأن يعمل على ضوء ما هو آتٍ.
Verse 2
भविष्यति रणे घोरे भरतानां पितामह: । प्रत्यक्षदर्शी भगवान् भूतभव्यभविष्यवित्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पूर्व और पश्चिम दिशामें आमने-सामने खड़ी हुई दोनों ओरकी सेनाओंको देखकर भूत, भविष्य और वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले, सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, भरतवंशियोंके पितामह सत्यवतीनन्दन महर्षि भगवान् व्यास, जो होनेवाले भयंकर संग्रामके भावी परिणामको प्रत्यक्ष देख रहे थे, विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्रके पास आये। वे उस समय अपने पुत्रोंके अन्यायका चिन्तन करते हुए शोकमग्न एवं आर्त हो रहे थे। व्यासजीने उनसे एकान्तमें कहा इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि श्रीवेदव्यासदर्शने द्वितीयो5ध्याय:
قال فَيْشَمْبَايَنَة: في المعركةِ الرهيبةِ التي كانت توشك أن تقع، جاء الجدُّ الموقَّرُ لآلِ بهاراتا—بهاغَفان فياسا ابنُ سَتْيَفَتِي، الذي يُبصر ما سيأتي عيانًا ويعلم الماضي والحاضر والمستقبل—إلى الملك دْهْرِتَراشْتْرَة ابنِ فِچِتْرَفِيرْيَة. وكان دْهْرِتَراشْتْرَةُ، إذ يتفكّر في ظلمِ أبنائه، غارقًا في الحزن والوجع؛ فكلّمه فياسا على انفراد.
Verse 3
वैचित्रवीर्य राजानं स रहस्यब्रवीदिदम् । शोचन्तमार्त ध्यायन्तं पुत्राणामनयं तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पूर्व और पश्चिम दिशामें आमने-सामने खड़ी हुई दोनों ओरकी सेनाओंको देखकर भूत, भविष्य और वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले, सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, भरतवंशियोंके पितामह सत्यवतीनन्दन महर्षि भगवान् व्यास, जो होनेवाले भयंकर संग्रामके भावी परिणामको प्रत्यक्ष देख रहे थे, विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्रके पास आये। वे उस समय अपने पुत्रोंके अन्यायका चिन्तन करते हुए शोकमग्न एवं आर्त हो रहे थे। व्यासजीने उनसे एकान्तमें कहा
قال فَيْشَمْبَايَنَة: عندئذٍ قال (فياسا) هذه الكلمات سرًّا للملك دْهْرِتَراشْتْرَة ابنِ فِچِتْرَفِيرْيَة، وكان في ذلك الوقت ينوح حزنًا ويقلب في صدره قلقًا ظلمَ أبنائه.
Verse 4
व्यास उवाच राजन् परीतकालास्ते पुत्राश्चान्ये च पार्थिवा: । ते हिंसन्तीव संग्रामे समासाद्येतरेतरम्,व्यासजी बोले--राजन! तुम्हारे पुत्रों तथा अन्य राजाओंका मृत्युकाल आ पहुँचा है। वे संग्राममें एक-दूसरेसे भिड़कर मरने-मारनेको तैयार खड़े हैं
قال فياسا: «أيها الملك، لقد حلّ على أبنائك وعلى سائر الملوك أيضًا الأجلُ المعيَّن للموت. وقد التقوا في ساحة القتال، فوقفوا مستعدين أن يضربوا وأن يُضرَبوا—قاصدين إلى الهلاك المتبادل».
Verse 5
तेषु कालपरीतेषु विनश्यत्स्वेव भारत । कालपर्यायमाज्ञाय मा सम शोके मन: कृथा:,भारत! वे कालके अधीन होकर जब नष्ट होने लगें, तब इसे कालका चक्कर समझकर मनमें शोक न करना
يا بهاراتا، حين يبدأ أولئك الرجال—وقد أدركهم الزمان (كالا)—أن يهلكوا من تلقاء أنفسهم، فاعلم أن ذلك دورانُ دورة الزمان، ولا تدع قلبك يسقط في الحزن.
Verse 6
यदि चेच्छसि संग्रामे द्रष्टमेतान् विशाम्पते । चक्षुर्ददानि ते पुत्र युद्ध तत्र निशामय,राजन! यदि संग्रामभूमिमें इन सबकी अवस्था तुम देखना चाहो तो मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करूँ। वत्स! फिर तुम (यहाँ बैठे-बैठे ही) वहाँ होनेवाले युद्धका सारा दृश्य अपनी आँखों देखो
يا سيدَ الرعية، إن شئت أن ترى هؤلاء في ساحة القتال، منحتُك بصرًا إلهيًّا. يا بُنيّ، عندئذٍ—وأنت جالس هنا—سترى بعينيك كلَّ مشاهد الحرب التي ستقع هناك.
Verse 7
धृतराष्ट्र रवाच न रोचये ज्ञातिवध॑ द्रष्टूं ब्रह्मर्षिसत्तम । युद्धमेतत् त्वशेषेण शृणुयां तव तेजसा,धृतराष्ट्रने कहा--ब्रह्मर्षिप्रवर! मुझे अपने कुटुम्बीजनोंका वध देखना अच्छा नहीं लगता; परंतु आपके प्रभावसे इस युद्धका सारा वृत्तान्त सुन सकूँ, ऐसी कृपा आप अवश्य कीजिये
قال دْهريتاراشترا: «يا أفضلَ البراهمارشِيّين، لا أرغب أن أشهد قتلَ أقربائي. ولكن بقدرة إشراقك الروحي، امنحني أن أسمع—على التمام وبكل تفصيل—خبرَ هذه الحرب كلَّه.»
Verse 8
वैशम्पायन उवाच एतस्मिन् नेच्छति द्रष्टूं संग्रामं श्रोतुमिच्छति । वराणामीश्वरो व्यास: संजयाय वरं ददौ,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! व्यासजीने देखा, धृतराष्ट्र युद्धका दृश्य देखना तो नहीं चाहता, परंतु उसका पूरा समाचार सुनना चाहता है। तब वर देनेमें समर्थ उन महर्षिने संजयको वर देते हुए कहा--
قال فَيْشَمبايانا: «يا جاناميجايا، رأى فياسا أن دْهريتاراشترا لا يريد أن يرى ساحة القتال، لكنه يريد أن يسمع الخبر كاملًا. فحينئذٍ منح فياسا—وهو القادر على منح العطايا—سَنْجَيا نعمةً وقال…»
Verse 9
एष ते संजयो राजन् युद्धमेतद् वदिष्यति । एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति,“राजन! यह संजय आपको इस युद्धका सब समाचार बताया करेगा। सम्पूर्ण संग्रामभूमिमें कोई ऐसी बात नहीं होगी, जो इसके प्रत्यक्ष न हो
قال فايشَمبايانا: «أيها الملك، إنَّ هذا سانجيا سيقصُّ عليك مجرى هذه الحرب. وفي الصراع كلِّه لن يبقى شيءٌ خافيًا عن إدراكه المباشر».
Verse 10
चक्षुषा संजयो राजन् दिव्येनैव समन्वित: । कथयिष्यति ते युद्ध सर्वज्ञश्न भविष्यति,“राजन! संजय दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न होकर सर्वज्ञ हो जायगा और तुम्हें युद्धकी बात बतायेगा
قال فايشَمبايانا: «أيها الملك، إنَّ سانجيا، وقد أُوتيَ بصرًا إلهيًا، سيقصُّ عليك أمر القتال، وسيغدو كمن يعلم كلَّ ما يجري في ساحة الحرب».
Verse 11
प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि | मनसा चिन्तितमपि सर्व वेत्स्यति संजय:,“कोई भी बात प्रकट हो या अप्रकट, दिनमें हो या रातमें अथवा वह मनमें ही क्यों न सोची गयी हो, संजय सब कुछ जान लेगा
قال فايشَمبايانا: «سواء أكان الأمر علنًا أم سرًّا، نهارًا أم ليلًا—بل حتى ما يُضمر في النفس ويُفكَّر به—فإنَّ سانجيا سيعلمه كلَّه».
Verse 12
नैनं शस्त्राणि छेत्स्यन्ति नैनं बाधिष्यते श्रम: । गावल्गणिरयं जीवन युद्धादस्माद् विमोक्ष्यते,“इसे कोई हथियार नहीं काट सकता। इसे परिश्रम या थकावटकी बाधा भी नहीं होगी। गवल्गणका पुत्र यह संजय इस युद्धसे जीवित बच जायगा
لن تقطعه الأسلحة، ولن يقهره الإعياء ولا العناء. هذا سانجيا، ابن غافالغَنا، سيُخلَّص حيًّا من هذه الحرب، محفوظًا بحمايةٍ عليا.
Verse 13
अहं तु कीर्तिमितेषां कुरूणां भरतर्षभ । पाण्डवानां च सर्वेषां प्रथयिष्यामि मा शुच:,“भरतश्रेष्ठ! मैं इन समस्त कौरवों और पाण्डवोंकी कीर्तिका तीनों लोकोंमें विस्तार करूँगा। तुम शोक न करो
قال فايشَمبايانا: «يا فحلَ آلِ بهاراتا، سأُعلن وأُشيع مجدَ هؤلاء الكورو جميعًا ومجدَ الباندافا جميعًا في العوالم. فلا تحزن.»
Verse 14
दिष्टमेतन्नरव्याप्र नाभिशोचितुमहसि । न चैव शक्यं संयन्तुं यतो धर्मस्ततो जय:,“नरश्रेष्ठ। यह दैवका विधान है। इसे कोई मेट नहीं सकता। अतः इसके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जहाँ धर्म है, उसी पक्षकी विजय होगी”
يا نمرَ الرجال، إنّ هذا قد قُضي به القضاء؛ فلا ينبغي لك أن تحزن عليه. ولا يمكن حقًّا كبحه أو دفعه—فحيث يقوم الدَّرْمَا تكون الغَلَبة.
Verse 15
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा स भगवान् कुरूणां प्रपितामह: । पुनरेव महाभागो धृतराष्ट्रमुवाच ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर कुरुकुलके पितामह महाभाग भगवान् व्यास पुनः धृतराष्ट्रसे बोले--
قال فايشامبايانا: فلما قال ذلك، عاد فياسا المبارك—جدُّ الكورو الأكبر—فخاطب دْهريتاراشترا مرةً أخرى.
Verse 16
इह युद्धे महाराज भविष्यति महान् क्षय: । तथेह च निमित्तानि भयदान्युपलक्षये,“महाराज! इस युद्धमें महान् नर-संहार होगा; क्योंकि मुझे इस समय ऐसे ही भयदायक अपशकुन दिखायी देते हैं
قال فايشامبايانا: «أيها الملك العظيم، سيكون في هذه المعركة هلاكٌ عظيم للرجال؛ فإني أرى الآن هنا نُذُرًا مشؤومة تُنذر بالخوف والكارثة».
Verse 17
श्येना गृथ्राश्न काकाश्न कड़काश्न सहिता बकै: । सम्पतन्ति नगाग्रेषु समवायां श्व॒ कुर्वते,“बाज, गीध, कौवे, कंक और बबगुले वृक्षोंके अग्रभागपर आकर बैठते तथा अपना समूह एकत्र करते हैं
قال فايشامبايانا: «إن الصقور والنسور والغربان والحدايا والبلشونات تتجمع معًا، وتهوي إلى قمم الأشجار، فتقف على أعلى الأغصان وتكوّن سربًا».
Verse 18
अभ्यग्र॑ च प्रपश्यन्ति युद्धमानन्दिनो द्विजा: । क्रव्यादा भक्षयिष्यन्ति मांसानि गजवाजिनाम्,'ये पक्षी अत्यन्त आनन्दित होकर युद्धस्थलको बहुत निकटसे आकर देखते हैं। इससे सूचित होता है कि मांसभक्षी पशु-पक्षी आदि प्राणी हाथियों और घोड़ोंके मांस खायेंगे। भयकी सूचना देनेवाले कंक पक्षी कठोर स्वरमें बोलते हुए सेनाके बीचसे होकर दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं
قال فايشامبايانا: «تُرى الطيور، كأنها طَرِبةٌ لوقع الحرب، تقترب جدًّا وتُشاهد القتال. وهذا نذيرٌ بأن الكواسر وآكلات اللحم ستقتات قريبًا على أجساد الفيلة والخيول».
Verse 19
निर्दयं चाभिवाशन्तो भैरवा भयवेदिन: । कड्का: प्रयान्ति मध्येन दक्षिणामभितो दिशम्,'ये पक्षी अत्यन्त आनन्दित होकर युद्धस्थलको बहुत निकटसे आकर देखते हैं। इससे सूचित होता है कि मांसभक्षी पशु-पक्षी आदि प्राणी हाथियों और घोड़ोंके मांस खायेंगे। भयकी सूचना देनेवाले कंक पक्षी कठोर स्वरमें बोलते हुए सेनाके बीचसे होकर दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं
قال فايشَمبايانا: «مُطلِقةً صرخاتٍ قاسية، تمرّ طيورُ الكَنْكا المروِّعة—وهي نُذُرٌ تُنبئ بالخوف—من خلال وسط الجيش وتمضي نحو الجهة الجنوبية». وفي لغة الفأل في الملحمة، فإن اقتراب طيور الجيف من ساحة القتال يدلّ على مذبحة وشيكة، وعلى أن الكائنات الآكلة للّحم ستقتات على القتلى، حتى الخيل والفيلة.
Verse 20
उभे पूर्वापरे संध्ये नित्यं पश्यामि भारत । उदयास्तमने सूर्य कबन्धै: परिवारितम्,'भारत! मैं प्रातः और सायं दोनों संध्याओंके समय उदय और अस्तकी वेलामें सूर्यदेवको प्रतिदिन कबन्धोंसे घिरा हुआ देखता हूँ
قال فايشَمبايانا: «يا بهاراتا، عند ملتقى النهار مرتين—صباحًا ومساءً—أرى على الدوام الشمسَ ساعةَ الشروق وساعةَ الغروب، محاطةً بجذوعٍ بلا رؤوس (كَبَنْدها).» ويُعرض هذا المنظر كنذير شؤم، يدلّ على اضطراب نظام العالم، وينبئ بالمذبحة العظمى وبالزلزال الأخلاقي الذي تجلبه الحرب.
Verse 21
श्वेतलोहितपर्यन्ता: कृष्णग्रीवा: सविद्युत: । विवर्णा: परिघा: संधौ भानुमन्तमवारयन्,'संध्याके समय सूर्यदेवको तिरंगे घेरोंने सब ओरसे घेर रखा था। उनमें श्वेत और लाल रंगके घेरे दोनों किनारोंपर थे और मध्यमें काले रंगका घेरा दिखायी देता था। इन घेरोंके साथ बिजलियाँ भी चमक रही थीं
قال فايشَمبايانا: «عند الشفق، ظهرت أطواقٌ دائرية متعددة الألوان—حوافّها بيضاء وحمراء، ووسطها مظلم كعنقٍ أسود—تومض بالبرق، وكأنها تُطوِّق الشمسَ المتألقة وتصدّها.» وكان هذا الجوّ الموشّى بالنذر يشير إلى صدامٍ وشيك وإلى توترٍ أخلاقي مع اقتراب الحرب.
Verse 22
ज्वलितार्केन्दुनक्षत्र निर्विशेषदिनक्षपम् | अहोरात्र मया दृष्टं तद् भयाय भविष्यति,“मुझे दिन और रातका समय ऐसा दिखायी दिया है जिसमें सूर्य, चन्द्रमा और तारे जलते-से जान पड़ते थे। दिन और रातमें कोई विशेष अन्तर नहीं दिखायी देता था। यह लक्षण भय लानेवाला होगा
«رأيتُ الليلَ والنهارَ سواءً لا فرق بينهما: الشمسَ والقمرَ والنجومَ كأنها تتّقد احتراقًا. إن هذه العلامة ستجلب الفزع.»
Verse 23
अलक्ष्य: प्रभयाहीन: पौर्णमासीं च कार्तिकीम् । चन्द्रो5भूदग्निवर्णश्र॒ पद्मवर्णनभस्तले,“कार्तिककी पूर्णिमाको कमलके समान नीलवर्णके आकाशमें चन्द्रमा प्रभाहीन होनेके कारण दृष्टिगोचर नहीं हो पाता था तथा उसकी कान्ति भी अग्निके समान प्रतीत होती थी
قال فايشَمبايانا: «في ليلة البدر من شهر كارتِّيكا غدا القمر عسيرَ التبيّن، إذ سُلب ضياءه. وفي فسحة السماء ذات لون اللوتس بدا بلون النار.» وهو نذير شؤم في السرد، يدلّ على اضطراب النظام الطبيعي، إذ إن لا-برّ الحرب ودمارها المقبل يلقيان بظلالهما حتى على السماوات.
Verse 24
स्वप्स्यन्ति निहता वीरा भूमिमावृत्य पार्थिवा: । राजानो राजतपूुत्रा श्च शूरा: परिघबाहव:,“इसका फल यह है कि परिघके समान मोटी बाहुओंवाले बहुत-से शूरवीर नरेश तथा राजकुमार मारे जाकर पृथ्वीको आच्छादित करके रणभूमिमें शयन करेंगे
قال فايشَمبايانا: «سيُصرَع كثيرٌ من الملوك والأمراء الأبطال—محاربون عظام، أذرعهم غليظة قوية كالهراوات الحديدية—فيُطرَحون قتلى. وبأجسادهم الساقطة يغطّون وجه الأرض، ويضطجعون في ساحة القتال كأنهم نيام.»
Verse 25
अन्तरिक्षे वराहस्य वृषदंशस्य चो भयो: । प्रणादं युद्धयतो रात्रौ रौद्रं नित्यं प्रलक्षये,“सूअर और बिलाव दोनों आकाशमें उछल-उछलकर रातमें लड़ते और भयानक गर्जना करते हैं। यह बात मुझे प्रतिदिन दिखायी देती है
قال فايشَمبايانا: «في السماء أرى على الدوام، ليلة بعد ليلة، زئيرًا هائجًا لخنزيرٍ بريٍّ وـvṛṣadaṃśa وهما يقتتلان.»
Verse 26
देवताप्रतिमाश्चैव कम्पन्ति च हसन्ति च । वमन्ति रुधिरं चास्यै: खिद्यन्ति प्रपतन्ति च,“देवताओंकी मूर्तियाँ काँपती, हँसती, मुँहसे खून उगलती, खिन्न होती और गिर पड़ती हैं
قال فايشَمبايانا: «حتى تماثيل الآلهة تُبدي نُذُرًا مشؤومة—ترتجف وكأنها تضحك؛ وتتقيّأ دمًا، وتعتريها الكآبة، ثم تهوي ساقطة.»
Verse 27
अनाहता दुन्दुभय: प्रणदन्ति विशाम्पते । असुक्ताश्ष प्रवर्तन्ते क्षत्रियाणां महारथा:,“राजन! दुन्दुभियाँ बिना बजाये बज उठती हैं और क्षत्रियोंके बड़े-बड़े रथ बिना जोते ही चल पड़ते हैं
قال فايشَمبايانا: «يا سيّد الشعب، إن طبول الحرب تدوي وإن لم يضربها أحد؛ وإن عربات الكشاتريا العظمى تتحرك وإن لم تُشدّ إليها الدواب بعد.»
Verse 28
कोकिला: शतपत्राश्न चाषा भासा: शुकास्तथा । सारसाश्ष मयूराश्न वाचो मुज्चन्ति दारुणा:,“कोयल, शतपत्र, नीलकण्ठ, भास (चील्ह), शुक, सारस तथा मयूर भयंकर बोली बोलते हैं
قال فايشَمبايانا: «الوقواق، وطيور śatapatra، وـcāṣa، وـbhāsa، والببغاوات، وكذلك الكُرْكِيّ والطواويس—كلّها تُطلق أصواتًا قاسية مروّعة.»
Verse 29
गृहीतशस्त्रा: क्रोशन्ति चर्मिणो वाजिपृष्ठगा: । अरुणोदये प्रदृश्यन्ते शतश: शलभव्रजा:,'घोड़ेकी पीठपर बैठे हुए सवार हाथोंमें ढाल-तलवार लिये चीत्कार कर रहे हैं। अरुणोदयके समय टिड्डियोंके सैकड़ों दल सब ओर फैले दिखायी देते हैं
قال فايشَمبايَنا: إن الفرسان الحاملين للدروع، وقد قبضوا على أسلحتهم وهم على ظهور الخيل، يطلقون الصيحات العالية. وعند احمرار الفجر يُرَون منتشرِين في كل جهة بالمئات—كأسراب الجراد—في صورةٍ لموج الحرب الجارف، الواسع غير الشخصي، الذي يطغى على ضبط الفرد لنفسه ويختبر الدارما وسط هياج الجماعة.
Verse 30
उभे संध्ये प्रकाशेते दिशां दाहसमन्विते । पर्जन्य: पांसुवर्षी च मांसवर्षी च भारत,"दोनों संध्याएँ दिग्दाहसे युक्त दिखायी देती हैं। भारत! बादल धूल और मांसकी वर्षा करता है
قال فايشَمبايَنا: إن الشفقين كليهما يبدوان كأنهما متقدان بنار نذير، حتى لكأن الجهات نفسها تحترق. يا بهاراتا، إن السحب تمطر غبارًا—بل وتمطر لحمًا—وهي طوالع تدل على أن النظام الأخلاقي قد اختل اختلالًا شديدًا، وأن المعركة المقبلة ستُوسَم بدمار واسع.
Verse 31
या चैषा विश्रुता राजंस्त्रैलोक्ये साधुसम्मता । अरुन्धती तयाप्येष वसिष्ठ: पृष्ठत: कृत:,“राजन! जो अरुन्धती तीनों लोकोंमें पतिव्रताओंकी मुकुटमणिके रूपमें प्रसिद्ध हैं, उन्होंने वसिष्ठको अपने पीछे कर दिया है
قال فايشَمبايَنا: «أيها الملك، إن أَرُندَهَتِي—المشهورة في العوالم الثلاثة والمكرَّمة عند الصالحين—قد جعلت، بسموّ فضيلتها هي، فَسِشْتَه كأنه وراءها». وفي هذا إبراز لسلطان العفّة والوفاء الزوجي (پَتِفْرَتا): فالفضيلة الحقّة ترفع المقام حتى يبدو أعظم الموقَّرين كأنهم يسيرون في أثرها.
Verse 32
रोहिणीं पीडयन्नेष स्थितो राजज्शनैश्षर: । व्यावृत्तं लक्ष्म सोमस्य भविष्यति महद् भयम्,“महाराज! यह शनैश्वर नामक ग्रह रोहिणीको पीड़ा देता हुआ खड़ा है। चन्द्रमाका चिह्न मिट-सा गया है। इससे सूचित होता है कि भविष्यमें महान् भय प्राप्त होगा
قال فايشَمبايَنا: «أيها الملك، إن الكوكب شَنَيْشْچَرَ (زُحَل) قائمٌ يؤذي روهِني. وإن علامة سوما (القمر) وبريقه قد اضطربا واحتجبا. وهذا ينذر بخوف عظيم وبلاءٍ مقبل.»
Verse 33
अनभ्रे च महाघोर: स्तनित: श्रूयते स्वनः । वाहनानां च रुदतां निपतन्त्यश्रुबिन्दव:,“बिना बादलके ही आकाशमें अत्यन्त भयंकर गर्जना सुनायी देती है। रोते हुए वाहनोंकी आँखोंसे आँसुओंकी बूँदें गिर रही हैं"
قال فايشَمبايَنا: مع أن السماء صافية بلا سحاب، يُسمَع دويٌّ شديد الرهبة كأنه رعدٌ. ومن عيون الدوابّ التي تُركَب وهي تبكي تتساقط قطرات الدمع—طوالع تدل على أن المعركة المقبلة مشحونة بالفزع وبثقلٍ أخلاقي جسيم.
He rejects direct witnessing of kin-destruction while still seeking exhaustive knowledge of the war, revealing a conflict between familial attachment, moral discomfort, and the ruler’s need for situational awareness.
Vyāsa emphasizes kāla-paryāya (the turning of time) and the limits of control over unfolding events, advising composure and interpretive clarity rather than paralytic grief.
Yes: the boon specifies comprehensive, uninterrupted perception (including secret and mental matters) and physical immunity, establishing Sañjaya as a reliable witnessing instrument within the epic’s narrative transmission system.