नच सम ते रुजं चक्रुः पितुस्तव जनेश्वर । स्मयमानस्तु गाजड़ेयस्तान् बाणाञज्जगृहे तदा,परंतु जनेश्वर! उसके चलाये हुए वे बाण आपके ताऊके शरीरमें कोई घाव या वेदना नहीं उत्पन्न कर पाते थे। गंगानन्दन भीष्म उस समय मुसकराते हुए उन बाणोंकी चोट सह रहे थे
na ca sama te rujaṃ cakruḥ pitus tava janeśvara | smayamānas tu gāṅgeyas tān bāṇān ajjagṛhe tadā ||
قال سنجيا: يا سيّدَ الرجال، إن تلك السهام لم تُحدِث في عمّك من جهة الأب جرحًا ولا ألمًا. وفي ذلك الحين كان بهيشما، ابنَ الغانغا، يبتسم ويتلقّى وقعَ تلك النبال في سكينة.
संजय उवाच