Arjuna’s request to Krishna and the opening of the Kāśyapa–Brāhmaṇa mokṣa discourse (Āśvamedhika-parva 16)
उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथेयं सिद्धिरुत्तमा । इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुन:,द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मुझे यह उत्तम सिद्धि मिली है। इसके बाद मैं उत्तम लोकमें जाऊँगा। फिर उससे भी परम उत्कृष्ट सत्यलोकमें जा पहुँचूँगा और क्रमश: अव्यक्त ब्रह्मपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लूँगा। इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये। काम-क्रोध आदि शत्रुओंको संताप देनेवाले काश्यप! अब मैं पुनः इस मर्त्यलोकमें नहीं आऊँगा
upalabdhā dvijaśreṣṭha tatheyaṁ siddhir uttamā | itaḥ paraṁ gamiṣyāmi tataḥ parataraṁ punaḥ ||
قال السِّدها: «يا خيرَ البراهمة، هكذا نلتُ هذا الإنجاز الروحي الأسمى. ومن هنا سأمضي إلى عالمٍ أرفع، ثم إلى ما هو أرفع منه. فلا تشكّ: إذ قد أحرقتُ أعداء الباطن كالشهوة والغضب، فلن أعود إلى هذا العالم الفاني.»
सिद्ध उवाच