धृतराष्ट्रस्य पश्चात्तापः तथा वनप्रस्थानानुज्ञा | Dhṛtarāṣṭra’s Remorse and Request for Forest-Retirement
न ते शक््या: समाधातुं कथंचिदिति मे मतिः । “गुप्त मन्त्रणाके दूसरोंपर प्रकट हो जानेसे राजाओंको जो संकट प्राप्त होते हैं, उनका किसी तरह समाधान नहीं किया जा सकता--ऐसा मेरा विश्वास है
na te śakyāḥ samādhātuṃ kathaṃcid iti me matiḥ |
قال فايشَمبايانا: «في تقديري، لا سبيل البتّة إلى تدارك تلك النوازل التي تصيب الملوك حين ينكشف التدبير السريّ لغير أهله.»
वैशम्पायन उवाच