अध्याय १५ (Āśramavāsika-parva): धृतराष्ट्रस्य वनवासानुज्ञायाचनम् — Dhṛtarāṣṭra’s renewed plea for consent to forest-dwelling
स राजा राजमार्गेण नूनारीसंकुलेन च | कथंचिन्निर्यया धीमान् वेपमान: कृताञज्जलि:,सारी सड़क पुरुषों और स्त्रियोंकी भीड़से भरी हुई थी। उसपर चलते हुए बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे। उनके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और शरीर काँप रहा था
وسار ذلك الملك في الطريق الملكي المكتظّ بالرجال والنساء. ولم يكد الحكيم يتقدّم إلا بمشقّة؛ ويداه مضمومتان في هيئة التضرّع، وجسده يرتجف.
वैशम्पायन उवाच