Adhyāya 9: Pratiśruta-Dāna
The Duty to Fulfill Promised Gifts
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ३०३ श्लोक हैं) भीस्न्म+ज (2) आसजमसना नवमो<्ध्याय: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा युधिछिर उवाच ब्राह्मणानां तु ये लोका: प्रतिश्रुत्य पितामह । न प्रयच्छन्ति मोहात् ते के भवन्ति महाद्युते,युधिष्ठिरने पूछा--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी पितामह! जो लोग ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर मोहवश नहीं देते जो दुरात्मा दानका संकल्प करके भी दान नहीं देते वे क्या होते हैं? यह धर्मका विषय मुझे यथार्थरूपसे बताइये
Yudhiṣṭhira uvāca | brāhmaṇānāṁ tu ye lokāḥ pratiśrutya pitāmaha | na prayacchanti mohāt te ke bhavanti mahādyute ||
قال يودهيشثيرا: «يا جدّي، ما مصير أولئك الذين يعدون البراهمة بعطية ثم لا يؤدّونها وقد أضلّهم الوهم؟ أيها المتلألئ عظيم البهاء، أخبرني صدقًا بعاقبة من يعزم على العطاء ثم لا يفي به.»
युधिछिर उवाच