Adhyāya 64: Dāna-prakāra—Suvarṇa, Pānīya-dāna, Ghṛta-dāna, and Upakaraṇa-dāna
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यो रक्षिभ्य: सम्प्रदाय राजा राष्ट्र विलुम्पति । यज्ञे राष्ट्रादू धनं तस्मादानयध्वमिति ब्रुवन्,जो राजा प्रजासे करके रूपमें प्राप्त हुए धनको कोषकी रक्षा करनेवाले कोषाध्यक्ष आदिको देकर खजानेमें रखवा लेता है और अपने कर्मचारियोंको यह आज्ञा देता है कि “तुम लोग यज्ञके लिये राज्यसे धन वसूलकर ले आओ', इस प्रकार यज्ञके नामपर जो राज्यकी प्रजाको लूटता है तथा उसकी आज्ञाके अनुसार लोगोंको डरा-धमकाकर निष्ठ॒रतापूर्वक लाये हुए धनको लेकर जो उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान करता है, उस राजाके ऐसे यज्ञकी श्रेष्ठ पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं
yo rakṣibhyaḥ sampradāya rājā rāṣṭraṃ vilumpati | yajñe rāṣṭrād dhanaṃ tasmād ānayadhvam iti bruvan |
قال بهيشما: إنّ الملك الذي يسلّم شؤون الحكم إلى الحرس والموظفين ثم ينهب مملكته، ويأمر خدمه قائلاً: «هاتوا المال من البلاد لأجل اليَجْنَة (yajña)»، إنما يسلب رعيته باسم القربان. فإذا أقام القربان بما جُبيَ بالخوف والقسر الشديد وبالترهيب وفق أمره، فإنّ أهل الصلاح والبصيرة لا يمدحون قربانه. إذ تتلطّخ الشعيرة أخلاقياً لأنها مُوِّلت بالظلم لا بالكسب المشروع وفق الدharma.
भीष्म उवाच