Dāyavibhāga (Inheritance Apportionment) and Household Precedence — Dialogue of Yudhiṣṭhira and Bhīṣma
गृहीतपाणिरेका5<सीत् _प्राप्तशुल्का पराभवत् | कन्या गृहीता तत्रैव विसर्ज्या इति मे पिता,उनमेंसे एक कन्या अम्बा अपना हाथ शाल्वराजके हाथमें दे चुकी थी; अर्थात् मन-ही- मन उनको अपना पति मान चुकी थी। दूसरी (दो कन््याओं)-का काशिराजको शुल्क प्राप्त हो गया था। इसलिये मेरे पिता (चाचा) कुरुवंशी बाह्नीकने वहीं कहा कि “जो कन्या पाणिगृहीत हो चुकी है उसका त्याग कर दो और दूसरी कन्याका (जिनके लिये शुल्कमात्र लिया गया है) विवाह करो।' मुझे चाचाजीके इस कथनमें संदेह था, इसलिये मैंने दूसरोंसे भी इसके विषयमें पूछा
gṛhītapāṇir ekā āsīt prāptaśulkā parābhavat | kanyā gṛhītā tatraiva visarjyā iti me pitā |
قال بهيشما: «كانت إحدى الفتاتين قد أُخذت يدُها من قبل—وفي قلبها كانت قد قبلت شالڤا زوجًا. وأما الأخرى (أو الأخريات) فقد كان ملك كاشي قد تسلّم مهرَها. لذلك أعلن كبيرُ سلالتنا في الحال: “أطلقوا الفتاة التي أُخذت يدُها هنا والآن؛ وأما الأخرى (أو الأخريات) التي لم يُؤخذ فيها إلا المهر فلتُزوَّج.” غير أني ارتبتُ في هذا القول، فسألتُ غيره أيضًا عن الوجه الصحيح.»
भीष्य उवाच