उपदेशदोषप्रसङ्गः (Upadeśa-doṣa-prasaṅgaḥ) — The Risk of Misapplied Counsel
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह । सूक्ष्मा गतिर्हिं धर्मस्य यत्र मुहान्ति मानवा:,युधिछिरने पूछा--पितामह! यदि कोई मित्रता या सौहार्दके सम्बन्धसे किसी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश देता है तो उस राजर्षिको दोष लगेगा या नहीं? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। आप इसका विशदरूपसे विवेचन करें; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है, जहाँ मनुष्य मोहमें पड़ जाते हैं
Yudhiṣṭhira uvāca: etad icchāmi tattvena vyākhyātuṃ vai pitāmaha | sūkṣmā gatir hi dharmasya yatra muhyanti mānavāḥ ||
قال يودهيشثيرا: «يا جدّي، أرجو أن تشرح لي هذا الأمر على وفق الحقيقة؛ فإن مسار الدارما دقيقٌ لطيف—دقيقٌ إلى حدٍّ يضلّ معه الناس ويقعون في الوهم بشأنه».
युधिछिर उवाच