Ādi Parva, Adhyāya 90 — Pūror Vaṃśa, Kuru-Pravara, and the Janamejaya Line
Genealogical Recitation
ततः पुरी पुरुहृतस्य रम्यां सहस्रद्वारां शतयोजनायताम् । अध्यावसं वर्षसहसतमात्र ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेत:,वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया
ثم بلغتُ المدينة البهيّة لبُرُهُوتا (إندرا)، ذات الألف باب، الممتدّة مئة يوجَنة. هناك أقمتُ ألف سنة فحسب، ثم مضيتُ إلى عالمٍ أرفعَ منها.
अष्टक उवाच