Ruru’s Lament and the Lifespan Exchange for Pramadvarā (रुरु–प्रमद्वरा आयुर्विभागः)
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत पौलोगपर्वमें प्रमद्वराके सर्पदेंशनसे सम्बन्ध रखनेवाला आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल २७३ “लोक हैं) नील + () आस नवमो<्ध्याय: रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्वराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोंको मारनेका निश्चय तथा रुरु- डुण्डुभ-सवाद सौतिर्वाच तेषु तत्रोपविष्टेषु ब्राह्मणेषु महात्मसु । रुरुश्लुक्रोश गहनं वन॑ं गत्वातिदुःखित:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! वे ब्राह्मण प्रमद्वराके चारों ओर वहाँ बैठे थे, उसी समय रुरु अत्यन्त दुःखित हो गहन वनमें जाकर जोर-जोरसे रुदन करने लगा। शोकसे पीड़ित होकर उसने बहुत करुणाजनक विलाप किया और अपनी प्रियतमा प्रमद्वराका स्मरण करके शोकमग्न हो इस प्रकार बोला--“हाय! वह कृशांगी बाला मेरा तथा समस्त बान्धवोंका शोक बढ़ाती हुई भूमिपर सो रही है; इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?
śaunaka uvāca — teṣu tatropaviṣṭeṣu brāhmaṇeṣu mahātmasu | ruruḥ śukrośa gahanaṁ vanaṁ gatvātiduḥkhitaḥ ||
قال شاونَكا: «وبينما كان أولئك البراهمة العظام النفوس جالسين هناك حول برامَدڤارا، انطلق رُرُو—وقد غمره الحزن—إلى غابة كثيفة، وأخذ ينوح بصوت عالٍ.»
शौनक उवाच
Grief is acknowledged as natural, yet the narrative sets up an ethical choice: whether suffering will mature into discernment and compassion or harden into indiscriminate anger (later expressed as hostility toward snakes).
After the brāhmaṇas sit around Pramadvarā, Ruru—stricken with sorrow—goes into a dense forest and wails loudly, beginning his lament over her condition.