ययातिः शर्मिष्ठायाः ऋतुप्रार्थनां धर्मसंवादं च शृणोति
Yayāti and Śarmiṣṭhā: request in ṛtu and discourse on truth and dharma
स समावृतविद्यो मां भक्तां भजितुम्सि । गृहाण पार्णिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम्,“अब आप व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हैं। मैं आपसे प्रेम करती हूँ, आप मुझे स्वीकार करें; वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण कीजिये”
«ها أنت الآن قد أتممت نذورك ونلتَ العلم (vidyā) الذي ابتغيته. إني أحبك—فاقبلني؛ وأجرِ طقسَ أخذ اليد (pāṇigrahaṇa) على الوجه الشرعي، مُستفتحًا بتلاوة المانترا الفيدية.»
वैशम्पायन उवाच