अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
योडन्यथा सन््तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । कि तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा,“(आपका स्वरूप तो कुछ और है” परंतु आप बन कुछ और रहे हैं।। जो अपने असली स्वरूपको छिपाकर अपनेको कुछ-का-कुछ दिखाता है, अपने आत्माका अपहरण करनेवाले उस चोरने कौन-सा पाप नहीं किया?
إن حقيقتك شيء، ولكنك تتقمّص شيئًا آخر. فأيُّ إثمٍ لم يرتكبه ذلك اللصّ الذي يسرق نفسه—يخفي صورته الحقيقية ويُظهر ذاته على غير ما هي؟
दुष्यन्त उवाच