अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
(अभिवादय राजानं पितरं ते दृढ्व्रतम् एवमुक््त्वा तु पुत्र सा लज्जानतमुखी स्थिता ।। स्तम्भमालिड्ग्य राजानं प्रसीदस्वेत्युवाच सा । शाकुन्तलो5पि राजानमभिवाद्य कृताञज्जलि: ।। हर्षेणोत्फुल्लनयनो राजानं चान्ववैक्षत । दुष्यन्तो धर्मबुद्धया तु चिन्तयन्नेव सो<ब्रवीत् ।। “बेटा! दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ये महाराज तुम्हारे पिता हैं; इन्हें प्रणाम करो।' पुत्रसे ऐसा कहकर शकुन्तला लज्जासे मुख नीचा किये एक खंभेका सहारा लेकर खड़ी हो गयी और महाराजसे बोली--*देव! प्रसन्न हों। शकुन्तलाका पुत्र भी हाथ जोड़कर राजाको प्रणाम करके उन्हींकी ओर देखने लगा। उसके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। राजा दुष्यन्तने उस समय धर्मबुद्धिसे कुछ विचार करते हुए ही कहा। दुष्यन्त उवाच किमागमनकार्य ते ब्रूहि त्वं वरवर्णिनि । करिष्यामि न संदेह: सपुत्राया विशेषतः ।। दुष्यन्त बोले--सुन्दरि! यहाँ तुम्हारे आगमनका क्या उद्देश्य है? बताओ। विशेषत: उस दशामें, जबकि तुम पुत्रके साथ आयी हो, मैं तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा; इसमें संदेह नहीं। शकुन्तलोवाच प्रसीदस्व महाराज वक्ष्यामि पुरुषोत्तम ।।) शकुन्तलाने कहा--महाराज! आप प्रसन्न हों। पुरुषोत्तम! मैं अपने आगमनका उद्देश्य बताती हूँ, सुनिये। अयं पुत्रस्त्वया राजन् यौवराज्येडभिषिच्यताम् । त्वया हायं सुतो राजन् मय्युत्पन्न: सुरोपम: । यथासमयमेतस्मिन् वर्तस्व पुरुषोत्तम,राजन्! यह आपका पुत्र है। इसे आप युवराज-पदपर अभिषिक्त कीजिये। महाराज! यह देवोषपम कुमार आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हुआ है। पुरुषोत्तम! इसके लिये आपने मेरे साथ जो शर्त कर रखी है, उसका पालन कीजिये
duṣyanta uvāca: kim āgamanakāryaṁ te brūhi tvaṁ varavarṇini | kariṣyāmi na saṁdehaḥ saputrāyā viśeṣataḥ ||
śakuntalovāca: prasīdasva mahārāja vakṣyāmi puruṣottama |
ayaṁ putras tvayā rājan yauvarājye 'bhiṣicyatām | tvayā hy ayaṁ suto rājan mayy utpannaḥ suropamaḥ | yathāsamayaṁ etasmin vartasva puruṣottama ||
قال دوشيانتا: «أيتها الحسناء، أخبريني—ما غاية مجيئك إلى هنا؟ سأقضي حاجتك بلا ريب، ولا سيما وقد جئتِ ومعكِ ابن.» فأجابت شاكونتالا: «تفضّل بالرضا أيها الملك العظيم، يا خير الرجال؛ سأبيّن مقصدي. هذا الغلام ابنُك أيها الملك—فليُمسَح ويُكرَّس وليًّا للعهد. فحقًّا أيها الملك، إن هذا الابن، شبيهَ الهيئة بالإله، قد وُلد فيّ منك. فاعمل في هذا الأمر بما يليق وفي أوانه، يا خير الرجال.»
दुष्यन्त उवाच
The passage frames kingship as a dharmic responsibility: the king must act rightly in matters of lineage and succession, recognizing and protecting rightful offspring and fulfilling prior obligations at the proper time. Ethical governance is shown as adherence to truth, duty, and social order rather than mere personal preference.
Duṣyanta asks Śakuntalā why she has come and promises to fulfill her request, especially since she has a son with her. Śakuntalā then states her purpose: the boy is the king’s son and should be anointed as heir-apparent; she urges the king to act appropriately and in due course regarding this claim.