अग्निशाप-प्रसंगः
Agni’s Curse and the Restoration of Ritual Order
सर्वभक्ष: कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम् “अमावास्याको पितरोंके लिये और पूर्णिमाको देवताओंके लिये मेरे मुखसे ही आहुति दी जाती है और उस आहुतिके रूपमें प्राप्त हुए हविष्यका वे देवता और पितर उपभोग करते हैं, सर्वभक्षी होनेपर मैं इन सबका मुँह कैसे हो सकता हूँ?”
«إن كنتُ سأصير آكِلَ كلِّ شيء، فكيف أكون “فمَهم”؟ ففي يوم الأَمَاوَاسْيَا تُقدَّم القرابين للآباء (Pitṛ)، وفي يوم البُورْنِمَا تُقدَّم للآلهة—وإنما تُسكَب تلك الأُضاحي من خلال فمي أنا، ثم تتمتع الآلهة والآباء بما نالوه من الهَفِس على هيئة قربان. فإذا كنتُ آكِلَ كلِّ شيء، فكيف أكون فمَهم جميعاً؟»
शौनक उवाच