परिक्षिद्वृत्तान्तप्रश्नः
Inquiry into Parīkṣit’s Conduct and the Beginnings of His Downfall
कस्त्वं बन्धुमिवास्माकमनुशोचसि सत्तम | श्रोतुमिच्छाम सर्वेषां को भवानिह तिष्ठति,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान् एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!
takṣaka uvāca | kastvaṁ bandhumivāsmākam anuśocasi sattama | śrotum icchāma sarveṣāṁ ko bhavān iha tiṣṭhati ||
قال تَكْشَكَ: «يا خيرَ الأخيار، من أنتَ حتى تحزن علينا كأنك من ذوي قربانا؟ إنّا جميعًا نودّ أن نسمع: من أنتَ، القائم هنا بيننا؟»
तक्षक उवाच
The verse highlights the ethical weight of compassion and kinship: genuine lament for another’s suffering implies relationship and responsibility, so the speaker asks for identity to understand the basis of that concern.
Takṣaka addresses a virtuous onlooker who appears to be grieving for the nāgas. Surprised by this sympathy, he asks who the person is and why he stands there as if a relative.