Jaratkāru’s Conditional Marriage Vow and Vāsuki’s Offer (जरत्कारु-विवाह-नियमः)
ऋषि: परमधर्मात्मा दान्त: शान्तो महातपा: । तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्प: प्राणैर्वियोजित:,गौरमुख बोला--महाराज! आपके राज्यमें शमीक नामवाले एक परम धर्मात्मा महर्षि रहते हैं। वे जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले और महान् तपस्वी हैं। नरव्याप्र! आपने मौन व्रत धारण करनेवाले उन महात्माके कंधेपर धनुषकी नोकसे उठाकर एक मरा हुआ साँप रख दिया था। महर्षिने तो उसके लिये आपको क्षमा कर दिया था, किंतु उनके पुत्रको वह सहन नहीं हुआ
ṛṣiḥ paramadharmātmā dāntaḥ śānto mahātapāḥ | tasya tvayā naravyāghra sarpaḥ prāṇairviyojitaḥ ||
قال غوراموخ: «في مملكتك يقيم الحكيم شاميكا، بالغَ البرّ، عفيفَ النفس، هادئًا، شديدَ التقشّف. ومع ذلك، يا نمرَ الرجال، وضعتَ على ذلك الحكيم حيّةً ميتةً مفارقةً للحياة.»
गौरयुख उवाच