Śṛṅgī’s Curse on King Parikṣit
Parikṣit–Śṛṅgī–Takṣaka Causal Link
यथा नष्ट पुरा देवा गुढमग्निं गुहागतम् । इसलिये आज हमें अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिये कि किस उपायसे हम सभी नाग कुशलपूर्वक रह सकते हैं। अब हमें व्यर्थ समय नहीं गँवाना चाहिये। हमलोगोंमें प्राय: सब नाग बुद्धिमान् और चतुर हैं। यदि हम मिल-जुलकर सलाह करें तो इस संकटसे छूटनेका कोई उपाय ढूँढ़ निकालेंगे; जैसे पूर्वकालमें देवताओंने गुफामें छिपे हुए अग्निको खोज निकाला था
śeṣa uvāca | yathā naṣṭāḥ purā devā gūḍham agniṁ guhāgatam |
قال شيشا: «كما أنّ الآلهة في الأزمنة السالفة استعادوا النارَ المخبّأة التي انحدرت إلى كهفٍ واستترت فيه، كذلك ينبغي لنا الآن أن نتشاور بتؤدةٍ ودقّة في الوسيلة التي بها تعيش جميعُ الناگا في أمان. لا يجوز أن نُضيّع الوقت سُدى. فأكثرُنا ذوو عقلٍ وحيلة؛ فإن اجتمع رأينا اهتدينا إلى مخرجٍ من هذه المحنة، كما اهتدى الآلهة قديمًا إلى النار المستترة في الكهف».
शेष उवाच
In a crisis, one should act promptly and thoughtfully, relying on collective deliberation and shared intelligence rather than wasting time or falling into panic.
Śeṣa addresses the Nāgas, urging them to consult together to find a practical means of safety, illustrating his point with an analogy: the Devas once found the concealed fire (Agni) hidden in a cave.