
Raivataka-giri Mahotsava and the Counsel on Subhadrā’s Marriage (रैवतके महोत्सवः — सुभद्राविवाहोपायविचारः)
Upa-parva: Subhadrā-haraṇa (Raivataka Utsava Episode) — within Ādi Parva
Vaiśaṃpāyana narrates to Janamejaya a grand celebration of the Vṛṣṇi–Andhakas on Mount Raivataka: mass gifts to brāhmaṇas, jeweled mansions, illuminated trees, and continuous music and dance. Prominent figures—Balarāma with Revatī, King Ugrasena, and other Vṛṣṇi leaders—move through the festivities with attendants and performers. In this auspicious tumult, Kṛṣṇa and Arjuna arrive and notice Subhadrā, beautifully adorned among companions. Arjuna’s focused attention reveals attraction; Kṛṣṇa interprets it and identifies Subhadrā as his sister, offering to speak to their father if Arjuna’s intent is firm. Arjuna praises her qualities and asks for a practical means to obtain her hand. Kṛṣṇa outlines Kṣatriya marriage conventions—svayaṃvara as a standard form, yet uncertain in outcome, and forcible abduction as another praised option for valorous warriors—advising Arjuna accordingly. They then dispatch swift messengers to Dharmarāja Yudhiṣṭhira in Indraprastha; upon hearing, Yudhiṣṭhira grants consent, formalizing the plan within Pandava authority and inter-house protocol.
Chapter Arc: युन्दोपयुन्दोपाख्यान में दो अजेय भाइयों का उदय होता है—देव, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य और राक्षसों से वे रत्न छीनकर त्रिलोकी में अपनी धाक जमा लेते हैं। → जब उनके सामने कोई प्रतिषेधकर्ता नहीं बचता, वे निरुद्योग होकर इन्द्रलोक-सम वैभव में भोग-विलास करते हैं। दिव्य भोग, वरासन, स्त्रियों का संग और मदिरा—इन सबके बीच उनके भीतर बल, धन-रत्न और वरदान का मद बढ़ता जाता है। तभी देवताओं की ओर से संकट-निवारण हेतु तिलोत्तमा का प्रस्थापन होता है—एक ऐसी अप्सरा, जो सौन्दर्य से ही अहंकार और संयम दोनों की परीक्षा बन जाए। → मदिरापान से रक्तान्त नेत्रों वाले दोनों भाई तिलोत्तमा को देखते ही व्यथित और आसक्त हो उठते हैं। वरदान, बल और मद के उन्माद में वे उसी पर अधिकार के लिए परस्पर भिड़ जाते हैं—और उनका संघर्ष इतना प्रचण्ड होता है कि लोक भय और विषाद से काँप उठते हैं, मानो आकाश में दो सूर्य टकरा रहे हों। → देवगण और महर्षियों सहित पितामह (ब्रह्मा) प्रसंग में प्रकट होकर व्यवस्था करते हैं; इन्द्र का त्रिलोकी-धारण पुनः स्थिर होता है और ब्रह्मलोक-गमन/देव-व्यवस्था के संकेत के साथ यह उपाख्यान अपने निष्कर्ष की ओर बढ़ता है। जनमेजय को कथावाचक यह भी सूचित करता है कि जो कुछ उस समय घटित हुआ, वह क्रमशः यथावत कहा गया है। → नारद-चोदित पूर्व-समय/प्रतिज्ञा का स्मरण कराया जाता है—और संकेत मिलता है कि देव-योजना के पीछे नियति-प्रेरित अनुशासन है, जिससे आगे की कथा में अन्य पात्रों/उपाख्यान-श्रृंखला का द्वार खुलता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें युन्दोपयुन्दोपाख्यानके प्रसंगरें तिलोत्तमाप्रस्थापनविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २१० ॥/ ऑपन-- माल बछ। ्-ज:डि एकादशाधिकद्वधिशततमो<्ध्याय: तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्ति तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम- निर्धारण नारद उवाच जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ । कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ बभूवतु:
قال نارادا: «يا يودهيشثيرا! إنّ الدَّيْتَيَين سوندا وأوباسوندا، بعدما قهرا الأرض، صارا بلا مُنازع ولا كَدَر. ولما أخضعا العوالم الثلاثة من غير عائق، ظنّا أنّ غايتهما قد تمّت—وهكذا تتهيّأ الانعطافة الأخلاقية التالية، إذ يغدو السلطان غير المقيَّد والكِبْرُ بذرةَ الهلاك.»
Verse 2
देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् | आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतौ,देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य तथा राक्षसोंके सभी रत्नोंको छीनकर उन दोनों दैत्योंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ
قال نارادا: «ولمّا استوليا على جميع الجواهر النفيسة التي للآلهة، وللغندرفا، والياكشا، والناغا، وملوك البشر، والراكشسا، بلغ هذان الدَّيْتَيَان غاية السرور. تُبرز الآية نشوة الرضا التي يولّدها السلب والهيمنة، وتلمّح ضمناً إلى مقابلة ذلك بضبط النفس والسلوك القويم وفق الدارما.»
Verse 3
यदा न प्रतिषेद्धारस्तयो: सन््तीह केचन । निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजद्वातेडमराविव,जब त्रिलोकीमें उनका सामना करनेवाले कोई नहीं रह गये, तब वे देवताओंके समान अकर्मण्य होकर भोग-विलासमें लग गये
قال نارادا: «وحين لم يبقَ في هذا العالم أحدٌ يستطيع أن يصدّ هذين الاثنين، خَمَدا عن السعي المقصود، وصارا كأنهما من الآلهة في بطالةٍ ونعيم، منغمسَين في اللذّات. وتلمّح الآية إلى خطر السلطان الذي لا يلقى مقاومة: إذ يجرّ الحاكم من واجب الانضباط إلى رخاوة الترف وطلب المتعة.»
Verse 4
स्त्रीभिमल्यैश्व गन्धैश्व भक्ष्यभोज्यै: सुपुष्कलै: । पानैश्न विविधै््द्यै: परां प्रीतिमवापतु:
قال نارادا: «وقد أحاطت بهما النساء الحسان، والأكاليل، والطيب، وتمتّعا بألوان المآكل والمشارب الوافرة وبشتى الأشربة اللذيذة التي تسرّ النفس، فكانا يقضيان أيامهما في ذروة اللذة. تُصوّر الآية حياةً غارقةً في المتع الحسية، في مقابلةٍ ضمنية مع مقاصد الدارما الأثبت ومع ضبط النفس.»
Verse 5
अन्त:पुरवनोयद्याने पर्वतेषु वनेषु च । यथेप्सितेषु देशेषु विजह्ाातेडमराविव,अन्तःपुरके उपवन और उद्यानमें, पर्वतोंपर, वनोंमें तथा अन्य मनोवांछित प्रदेशोंमें भी वे देवताओंकी भाँति विहार करने लगे
قال نارادا: «وفي بساتين الحَرَمِ الداخلي وحدائق اللهو، وعلى الجبال، وفي الغابات، وفي سائر المواضع التي يشتهونها، كانوا يسيحون في المتعة—أحراراً مهيبين كأنهم الآلهة. وتؤكد الآية طوراً من الترف الملكي غير المقيَّد، حيث يتيح الامتياز بلوغ كل مكانٍ مُستحسن بلا عناء.»
Verse 6
ततः कदाचिद् विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले । पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतु:
ثم في إحدى المرات خرجا للتنزّه على هضبة صخرية مستوية من جبال فيندھيا، حيث كانت أشجار الشالا الشاهقة قائمةً وأغصانها العليا مزهرة.
Verse 7
दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ । वरासनेषु संहृष्टी सह स्त्रीभिर्निषीदतु:
ولمّا جُمِعَت أمامهما شتّى اللذّات السماوية وقدِّمت، جلس الأخوان—وقد غمرهما السرور—على مقاعد فاخرة في صحبة نساء جميلات.
Verse 8
ततो वादित्रनृत्या भ्यामुपातिष्ठ न्त तौ स्त्रिय: । गीतैश्व स्तुतिसंयुक्तै: प्रीत्या समुपजग्मिरे
ثم أقبلت نساء كثيرات إلى كليهما بفرحٍ مفعم بالمودّة، فخدمنهما بالموسيقى والرقص، وبالأغاني المقرونة بكلمات الثناء، يلتمسن إرضاءهما وإمتاعهما.
Verse 9
ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती । वेशं सा55क्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा
ثم جاءت تيلوتّما إلى ذلك الغاب وهي تقطف الأزهار. وقد تعمّدت هيئةً مثيرة، متلفّعة بثوبٍ أحمر واحد، في مظهرٍ صيغ ليُقلق عقول الرجال ويُسكرها.
Verse 10
नदीतीरेषु जातान् सा कर्णिकारान् प्रचिन्वती । शनैर्जगाम तं॑ देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ
وهي تجمع أزهار الكرنيكارا التي نبتت على ضفاف النهر، مضت ببطء نحو ذلك الموضع بعينه حيث كان ذانك الأسوران العظيمان جالسين.
Verse 11
तौ तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ । दृष्टवैव तां वरारोहां व्यथितौ सम्बभूवतु:
شرب الاثنان شرابًا مُسكِرًا نفيسًا، فاحمرّت أطراف أعينهما من أثر السُّكر. وما إن أبصرا تيلوتّما ذات الأعضاء الحسنة والوركين النبيلين حتى استولى على الديتيين اضطرابٌ وكربٌ مولودان من الشهوة.
Verse 12
तावुत्थायासन हित्वा जम्मतुर्यत्र सा स्थिता | उभौ च कामसममत्तावुभौ प्रार्थयतश्न ताम्
نهضا وتركَا مجلسيهما، ومضيا إلى الموضع الذي كانت تقف فيه. وكانا كليهما قد استبدّ بهما الهوى حتى الجنون، فأخذا يتضرعان إليها—وكلٌّ منهما يبتغي أن يتخذها زوجةً له.
Verse 13
दक्षिणे तां करे सुभ्रूं सुन्दो जग्राह पाणिना । उपसुन्दो5पि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम्,सुन्दने सुन्दर भौंहोंवाली तिलोत्तमाका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्दने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया
قال نارادا: أمسك سوندا بيده اليمنى يدَ تيلوتّما اليمنى، وهي ذات الحاجبين الحسنين؛ وأمسك أوباسوندا كذلك بيدها اليسرى.
Verse 14
वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च । धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च
قال نارادا: «كان الاثنان مخمورين: أحدهما بزهوّ نيل نعمةٍ نادرة، والآخر بغرور قوةٍ فطريةٍ موروثة. وفوق ذلك ازدادا جنونًا بفتنة المال، وبخيلاء الجواهر، وبسكر الخمر.»
Verse 15
सर्वरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ । (तौ कटाक्षेण दैत्येन्द्रावाकर्षति मुहुर्मुहु: । दक्षिणेन कटाक्षेण सुन्दं जग्राह कामिनी ।।
قال نارادا: وقد سكر الاثنان بكل صنوف الكِبر والهوى، عقدا حواجبهما أحدهما على الآخر في عداوةٍ متبادلة. وكانت تيلوتّما، بنظراتٍ جانبيةٍ متكررة، تجذب ملكَي الديتيين إليها مرةً بعد مرة. فبنظرةٍ من جانبها الأيمن استولت على انتباه سوندا، وبنظرةٍ من جانبها الأيسر سعت إلى أسر أوباسوندا. فبهت الاثنان في الحال بعطرها، وحُليّها، وجمالها، ووقعا في الوهم. وإذ غلبهما السكر والشهوة، قال أحدهما للآخر على هذا النحو—
Verse 16
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दो5भ्यभाषत । मम भार्या तव वधूरुपसुन्दो5भ्यभाषत
قال نارادا: أعلن سوندا: «إنها زوجتي؛ ولذلك فهي مُعلِّمتك (غورو) تُوقَّر كالأم». فردّ أوباسوندا: «إنها زوجتي؛ ولذلك فهي كنّتك». وهكذا حاول كلٌّ من الأخوين ادّعاء المرأة نفسها بإعادة تعريف الصلة وفق سلّم المكانة الاجتماعية والأخلاقية—كاشفَين كيف يمكن للشهوة أن تُحرّف الدارما، وأن تجعل القرابة نفسها سلاحًا في الجدل.
Verse 17
नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत् | तस्या रूपेण सम्मत्तौ विगतस्नेहसौहदी
قال نارادا: وبينما يكرّران: «ليست لك—إنها لي»، دخل الغضب إلى كليهما. وقد أذهلتهما فتنة تيلوتّما، فسكرا بالشهوة وتجردا من كل مودة وألفة بينهما.
Verse 18
तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृह्लीतावुभौ तदा । प्रगृह्ा च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ,उस सुन्दरीको पानेके लिये दोनों भाइयोंने उस समय हाथमें भयंकर गदाएँ ले लीं। दोनों ही उसके प्रति कामसे मोहित हो रहे थे
قال نارادا: من أجلها، في تلك اللحظة أمسك الاثنان بهراواتهما المهيبة. وإذ رفعا تلك العصيّ الرهيبة، كان الأخوان—وقد أضلّهما الهوى نحوها—مندفعين إلى الصدام.
Verse 19
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतु: । तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्थरणीतले
قال نارادا: وهما يصيحان: «أنا أولًا—بل أنا أولًا!»، أخذ كلٌّ منهما يضرب الآخر منافسةً. وقد سُحقا بضربات الهراوات، فسقط الكائنان المروّعان على أرض المعركة.
Verse 20
रुधिरेणावसिक्ताज्ै द्वाविवार्को नभश्न्युतौ । ततस्ता विद्रुता नार्य: स च दैत्यगणस्तथा
قال نارادا: وقد تلطخا بالدماء من كل جانب، بدا الاثنان كأنهما شمسـان سقطتا من السماء إلى الأرض. فلما قُتلا، فرت النساء من ذلك الموضع، وانسحب جمع الدانافا/الدايتيا بأسره—مرتجفًا من الحزن والخوف—إلى العوالم السفلى. ثم جاء الربّ براهما، طاهر السريرة، ومعه الآلهة والعظماء من الرِّشي، يثنون على تيلوتّما؛ وبصفته «جدّ العوالم» أرضاها بمنحها نعمةً (بونًا).
Verse 21
पातालमगमत् सर्वो विषादभयकम्पित: । ततः पितामहस्तत्र सह देवैर्महर्षिभि:
قال نارادا: إن ذلك الجمع بأسره، وقد اضطرب من الحزن والخوف، هبط إلى باتالا (العالم السفلي). ثم جاء هناك الجدّ الأكبر، براهما، ومعه الآلهة والريشيون العظام. وفي سياق الحكاية تُبرز هذه الصورة كيف أن عنفًا طاغيًا وهزيمةً خاطفة يبددان حتى ذوي الشوكة، بينما يدلّ مجيء براهما مع الحكماء ذوي السرائر الطاهرة على عودة النظام الكوني عبر الثناء والتمييز ومنح العطايا، لا عبر سفك دمٍ جديد.
Verse 22
आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्न तिलोत्तमाम् | वरेणच्छन्दयामास भगवान् प्रपितामह:
قال نارادا: ثم جاء الجدّ المبارك—براهما، طاهر السريرة—مكرّمًا تيلوتّما. ولما رضي عنها أرضاها بمنحها نعمةً (وعدًا) من عنده. وفي سياق الرواية تنهار سطوة الدايتيا العنيفة في الخوف والأسى، بينما لا يجيب الآلهة والريشيون بمزيد من القسوة، بل بإعلان استحقاق الفضل وإعادة النظام الأخلاقي عبر مكافأة موزونة رحيمة.
Verse 23
वरं दित्सु: स तत्रैनां प्रीत: प्राह पितामह: । आदित्यचरितॉल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि
ولمّا اشتاق الجدّ الأكبر براهما إلى منح العطية، قال لها هناك مسرورًا: «يا ذات الهوى المتّقد، ستجوبين على هواكِ جميع العوالم التي تبلغها مسيرة الشمس.» ثم إذ عهد بحراسة العوالم الثلاثة إلى إندرا، انصرف الربّ إلى عالم براهما. وتُبرز هذه الحادثة نظامًا أخلاقيًا: فالجمال والقوة الاستثنائيان عطايا تُنظَّم بسلطان كوني وتُدرج ضمن سلّم المسؤولية—براهما يمنح، وإندرا يدبّر، والمتلقّية مقيّدة بحدود الطريق الذي سنّته الشمس.
Verse 24
तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्नन । एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वतलोकपितामह:
قال نارادا: «وقد مُنِحتِ بهاءً متلألئًا وجمالًا يأسر الأبصار، فلن يستطيع أحد أن يتغافل عنكِ أو يعدّكِ حقيرة الشأن.» وهكذا، بعدما منحها هذا العطاء، أنهى جدّ العوالم كلّها (براهما) فعل الإنعام.
Verse 25
नारद उवाच एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ
قال نارادا: «هكذا، مع أنهما كانا متحدين ومتوافقين في العزم في كل شأن، فقد استشاطا غضبًا بسبب تيلوتّما، فانتهى بهما الأمر إلى أن قتل أحدهما الآخر. لذلك، يا أكرمَ من في سلالة بهاراتا، أقول هذا لكم جميعًا بدافع المودّة: إن كنتم تريدون ما هو عزيز عليّ، فضعوا بينكم قاعدةً لا تدع فرقةً تنشأ بينكم بسبب دروبدي. وليكن لكم الخير والرفاه.»
Verse 26
तिलोत्तमार्थ संक़्रुद्धावन्योन्यमभिजषध्नतु: । तस्माद् ब्रवीमि व: स्नेहात् सर्वान् भरतसत्तमा:
قال نارادا: «مع أنهم كانوا متحدين ويتصرفون على وفاق، فإن سوندا وأوباسوندا، وقد استبدّ بهما الغضب بسبب تيلوتّما، صرع أحدهما الآخر. لذلك، ومن باب المودّة، أقول هذا لكم جميعًا، يا خيرة آل بهاراتا: إن كنتم تقدّرون ما هو عزيز عليّ، فضعوا بينكم قاعدةً لئلا تنشأ فرقة بينكم بسبب دروبادي—ولتُصَنْ رفاهيتكم.»
Verse 27
यथा वो नात्र भेद: स्यात् सर्वेषां द्रौपदीकृते । तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत् प्रियमिच्छथ
قال نارادا: «رتّبوا الأمر بحيث لا تنشأ بينكم فرقة بسبب دروبادي. افعلوا ذلك لخيركم—إن كنتم تريدون ما يرضيني.»
Verse 28
वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा । समयं चक्रिरे राज॑स्ते5न्योन्यवशमागता: । समक्ष तस्य देवर्षेनारदस्थामितौजस:
قال فيشامبايانا: «أيها الملك (جاناميجايا)، لما قال الحكيم العظيم نارادا ذلك، عقد أولئك الباندافا ذوو النفوس السامية—وقد التزموا فيما بينهم بالكفّ والاحترام المتبادل—اتفاقًا في حضرة الرائي الإلهي نارادا، ذي البهاء الذي لا يُقاس.»
Verse 29
(एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद् वर्षमकल्मषा ।) द्रौपद्या न: सहासीनानन्योन्यं योडभिदर्शयेत् स नो द्वादश वर्षाणि ब्रह्मचारी वने वसेत्
«لتقم كريشنا (دروبادي) الطاهرة عامًا كاملًا في بيت كل واحدٍ منا بالتناوب. وإن رأى أحدُ الإخوة أخًا له وهو جالسٌ على انفرادٍ مع دروبادي، فعلى ذلك الذي رآهما أن يقيم في الغابة اثنتي عشرة سنةً ملتزمًا نذر البراهماتشاريا (العفّة).»
Verse 30
कृते तु समये तस्मिन् पाण्डवैर्धर्मचारिभि: । नारदो<प्यगमत् प्रीत इष्टं देशं महामुनि:
قال فيشامبايانا: «فلما أقرّ الباندافا السالكون طريق الدارما ذلك الشرط المتفق عليه، سُرَّ الحكيم العظيم نارادا لتمسّكهم بالاستقامة، ثم انصرف إلى الموضع الذي اختاره.»
Verse 31
भारत! इस प्रकार नारदजीकी प्रेरणासे पाण्डवोंने पहले ही नियम बना लिया था। इसीलिये वे सब आपसमें कभी एक-दूसरेके विरोधी नहीं हुए
يا بهاراتا! هكذا، وبإلهامٍ من نارادا، كان الباندافا قد وضعوا من قبلُ قاعدةً متَّفقًا عليها. لذلك لم يصبح أحدٌ منهم قطُّ خصمًا للآخر، وبقيت وحدتهم مصونةً بما بينهم من ضبطٍ للنفس والتزامٍ بالسلوك المقرَّر.
Verse 231
(एतद् विस्तरश: सर्वमाख्यातं ते नरेश्वर । काले च तस्मिन् सम्पन्नं यथावज्जनमेजय ।।
قال فَيْشَمْبَايَنَة: «أيها الملك، إن كلَّ ما وقع في ذلك الزمان، على وجهه كما وقع حقًّا، يا جاناميجايا، قد قصصتُه عليك مفصَّلًا كاملًا».
Verse 243
इन्द्रे त्रलोक्यमाधाय ब्रह्मलोक॑ गतः प्रभु: । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले--'भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है
قال نارادا: بعدما أسند الربّ (براهما) إلى إندرا عبءَ حماية العوالم الثلاثة، مضى إلى برهمالوك. وإذ كان متشوّقًا لمنح نعمة، تكلّم براهما برضا لطيف قائلاً: «يا بها ميني، أيتها المرأة المتّقدة الشغف! حيثما يبلغ مسار الشمس، في تلك العوالم كلّها ستجولين كما تشائين. وسيكون فيك من الإشراق ما لا يطيق أحدٌ أن يحدّق فيك بتمام بصره.» وهكذا، فإنّ براهما، جدَّ العوالم كلّها، بعدما منح تيلوتّاما هذه النعمة ووضع على إندرا عبءَ حراسة العوالم الثلاثة، عاد من جديد إلى برهمالوك.
Verse 331
एवं तै: समय: पूर्व कृतो नारदचोदितै: । न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत
وهكذا، بدافعٍ من نارادا، كانوا قد عقدوا من قبلُ عهدًا متبادلًا؛ ولم يَنقُضْه أحدٌ منهم في ذلك الحين، يا بهاراتا، ولم يُبدِ أحدٌ غدرًا تجاه الآخر.
The dilemma concerns aligning personal desire and political alliance with socially recognized dharma: whether to rely on svayaṃvara (procedurally orthodox yet uncertain) or to adopt a more forceful Kṣatriya method that is described as praised in certain warrior codes but ethically sensitive in broader social evaluation.
Even decisive action is framed as accountable action: the chapter models how intent is tested through counsel, norms, and authorization (notably by seeking Yudhiṣṭhira’s consent), emphasizing that dharma often operates as process and deliberation rather than mere outcome.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-structural—showing how alliances and legitimacy are constructed through recognized conventions and hierarchical consent, which later stabilizes political bonds within the epic’s broader causal chain.
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